भारतीय शटलर पीवी सिंधु (PV Sindhu)
ने नोजोमी ओकुहारा को हराकर वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप 2019 (World Badminton Championships) का खिताब जीतकर गोल्ड मेडल हासिल किया है। भारतीय बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु ये खिताब जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी हैं।

पीवी सिंधु की जीत पर सारा देश खुश है और उत्सव मना रहा है। इस मौके पर तो फिर एक बार याद दिला दूँ की कभी-कभी सफल औरत के पीछे कोई पुरूष भी हो सकता है। पीवी सिंधु की इस सफलता के पीछे उनके कोच गोपीचंद पुलेला का बहुत बड़ा हाथ है।

कहानी, सफलता त्याग और डेडिकेशन की

कहते हैं कि हर सफल पुरुष के पीछे एक औरत होती है। लेकिन आज सिंधू की जीत के पीछे इस ‘कंप्लीट मैन’ की बात न हो तो सिंधू की जीत से अधिक उसकी स्पिरिट अधूरी रहेगी। सिंधू की जीत गोपीचंद के सालों उस अधूरे-बिखरी हसरतों के पूरा होने का दिन है जिसका वादा उसने खुद से, खुद के परिवार और देश से किया था।

गोपीचंद की जिंदगी की कहानी बिमल रॉय की फिल्म की स्क्रिप्ट सी लगती है

उधार के रैकेट से बैडमिंटन खरीद इस खेल को पुलेला गोपीचंद ने उस वक्त अपनी जिंदगी से जोड़ा जब दूर-दूर तक इसमें न पैसा था और ना ग्लैमर। पूरा परिवार गोपीचंद के लिए पैसे जुटाता था ताकि वह खेल सके। कहीं से कोई मदद नहीं थी। मिडिल क्लास फेमिली के लड़के को खेलने के लिए परिवार ने पहली बार अपने पैसे से विदेश भेजा। गोपीचंद के कारण पूरे परिवार ने तब तक त्याग किया जब तक उन्हें दीपिका पादुकोण के पापा प्रकाश पादुकोण ने अपनी शरण में नहीं लिया।

पुलेला गोपीचंद

हालांकि प्रकाश पादुकोणे की पहचान दीपिका से नहीं रही है लेकिन कड़वा सच है कि आज की पीढ़ी उन्हें इसी रूप में अधिक पहचानती है। प्रकाश के शागिर्द बनने के बाद शुरू हुआ कामयाबी का सिलसिला। दुनिया के हर प्लेयर को गोपीचंद ने हराया, लेकिन सपना ओलंपिक में मेडल जीतना का था। हालांकि 2000 सिडनी ओलंपिक में गोपीचंद बहुत नजदीक पहुंच कर नहीं जीत पाए।

तभी गोपीचंद ने खुद से और देश से वादा किया- वह मेडल दिलवाएंगे। जो खुद न कर पाए, वह अगली पीढ़ी से करवा देंगे। उन्होंने एक सपना देखा वर्ल्ड क्लास कोचिंग सेंटर खोलने का, लेकिन इतना पैसा नहीं था। पैसा क्यों नहीं था, इसके भी कारण थे।

गोपीचंद बाजार के हाथ नही बिके, गिरवी रखा घर

गोपीचंद जब सुपरस्टॉर थे तब कोकोकोला ने लाखों रुपये से खरीदना चाहा। लेकिन नहीं बिके। बोले, प्रोडक्ट को सिर्फ पैसे के लिए नहीं बेचेंगे। बाद में एक महान क्रिकेटर ने खट से कोकोकोला का ऑफर स्वीकार कर लिया। गोपीचंद बाजार के सामने भी नहीं बिके।

गोपीचंद ने अपने घर को गिरवी रखकर कोचिंग खोली। इसी कोचिंग सेंटर से गोपी को सब कुछ मिला जिसका उन्होंने ख्वाब देखा था। उनकी सीनियर स्टूडेंट साइना नेहवाल को लंदन ओलंपिक में कांस्य मिला, लेकिन गोपीचंद के कोचिंग सेंटर में तब भी कोई स्टॉर नहीं था। ओलंपिक में मेडल जीतने वाली साइना भी नहीं। उनके यहां जितनी अहमियत साइना की थी उतनी ही सिंधू या दूसरे खिलाड़ी की भी थी।

यह सिस्टम शायद स्टॉर बन चुकी साइना को अच्छा नहीं लगा। साइना को लगा कि गोपीचंद उन पर कम फोकस कर रहे हैं। जबकि वह सबसे अधिक फोकस में है। वह उनके प्रभाव से निकल गयी। साथ छूट गया। सिंधू गोपीचंद की उम्मीद बन गये थे। लेकिन साइना और गोपीचंद की यहां भी तारीफ इसलिए की दोनों ने हमेशा अपने विवाद की बात बेहद गरिमामय और मर्यादा में रखकर की।

आज गोपीचंद की दूसरी स्टूडेंट सिंधू उन्हें वह पल दे रही है जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी दे दी। यह जितनी सिंधू की जीत है उतनी ही गोपीचंद की भी।

यह लेख NBT में पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा ट्विटर वाल से लिखा गया है