स्वरा भास्कर जो अपनी फिल्मों के बजाय सोशल मीडिया पर किये अपने ट्वीट की वजह से चर्चा में रहती हैं। स्वरा एक बार फिर इन्हीं वजहों से चर्चा में हैं। झारखंड में एक युवक को चोरी के शाक में पीट पीट कर मार देने के वाकये के बाद इस पर बहुत सारे लोगों ने ट्विटर पर अपनी राय दी। ऐसे में स्वरा इस मुद्दे को कैसे छोड़ सकती थीं? तो उन्होंने भी इस पर एक ट्वीट कर दिया। हालांकि ये ट्वीट करने में स्वरा थोड़ा लेट हो गयीं। जिसकी वजह से सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल भी किया गया।

दरअसल, 27 जून को स्वरा ने सुबह 3 बजे के करीब इस मुद्दे पर एक ट्वीट किया। अपने ट्वीट में भारत को लीनचिस्तान (Lynchistaan) बताया। इसके साथ उन्होंने अपने ट्वीट में कैंडल मार्च के लिए लोगों का आह्वान भी किया। पर यहीं पर स्वरा गलती कर गई, स्वरा ने कैंडल मार्च के लिए जो डेट बताई वो 26 जून की थी। और 26 जून की डेट तो बीत चुकी थी। ऐसे में लोगों का इन्हें ट्रोल करना तो बनता भी था।

इस ट्वीट पर एक शख़्स ने स्वरा से कहा की “सस्ता नशा करना छोड़ दो।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “ये ट्वीट 25 जून को शेड्यूल्ड था, लेकिन मैडम दो दिन लेट हो गईंं। इस ट्वीट के पैसे नहीं मिलने वाले।”

एकबारगी स्वरा की इस ट्वीट को देख कर ऐसा लगता है की ये ट्वीट इन्हें किसी ने करने को कहा था पर स्वरा ने उसका मैसेज देर से देखा और बिना कुछ सोचे समझे इस ट्वीट को कॉपी पेस्ट कर दिया।

ख़ैर ट्रोलर्स का तो काम ही है ट्रोल करना लेकिन हम स्वरा भास्कर या उनके जैसे लोगों की नीयत पर बात करना चाहते हैं।

हिंसा गलत है, जब भीड़ क़ानून अपने हाथ में लेकर किसी निहत्थे को घेर कर मारती है तो ये बहुत ही बर्बर और गलत है। ये एक नयी और गलत परंपरा की शुरुआत है। इसका विरोध होना चाहिए लेकिन सेलेक्टिव विरोध क्यों?

तबरेज को भीड़ ने इतना मारा कि वो हॉस्पिटल में मर गया। चाहे यहाँ उसके मजहब के कारण उसे मारा गया हो या उसके चोर होने के कारण। किसी भी सूरत में यह हत्या उचित नहीं है। ऐसी हर घटना पर हमारी और आपकी एक समान, संवेदनशील और समझदारी वाली प्रतिक्रिया होनी चाहिए कि हमारे समाज में भीड़ को किसी भी कारण से, चाहे वो गाय चुरा कर भाग रहा हो, गोमांस खा रहा हो, चोरी कर रहा हो, राह चलते अपना काम कर रहा हो, भाजपा के झंडे लगा रहा हो। उस व्यक्ति की जान लेना तो छोड़िए, उस पर एक थप्पड़ उठाने की भी इजाज़त नहीं होनी चाहिए। अगर आपको तबरेज की हत्या पर समाज में दोष दिखता है, तो आपको विनय की भी हत्या पर विचलित होना पड़ेगा। अगर आपको किसी चोर की भीड़ हत्या पर संवेदनशील होने का मन करता है तो आपको जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन के बाहर मुसलमानों द्वारा लिंच किए गए ई-रिक्शा चालक की भी मौत का गम करना चाहिए।

चूंकि इस देश में वोटबैंक मुस्लिम है, हिन्दू नहीं। इसलिए मुस्लिमों के खिलाफ मॉब लिंचिंग कि घटना राजनीतिक दलों व बुद्धिजीवियों के ध्यान में तुरंत आती है और उसके खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक आवाज उठाई जाती है। वो एक राष्ट्रीय डिबेट का मुद्दा बन जाता है, लेकिन जब मॉब लिंचिंग का शिकार हिन्दू होता है तो ये घटना बस राइट विंग द्वारा सोशल मीडिया पर एक दिन का आउटरेज बन कर रह जाता है। मॉब लिंचिंग के शिकार मुसलमानों के नाम पूछिए तो नेताओं/वामपंथियों व मीडिया/बुद्धिजीवियों तक को उनके नाम जुबानी याद होंगे, लेकिन मॉब लिंचिंग के शिकार किसी हिन्दू का नाम पूछिए तो सब अगल बगल झाँकने लगेंगे।

अंकित सक्सेना (जिसकी हत्या मुस्लिम लड़की से प्यार करने के कारण लड़की के परिवार वालों ने बीच सड़क पर कर दी), डॉ पंकज नारंग ( जिसकी हत्या उन्ही के घर के सामने समुदाय विशेष की भीड़ ने कर दी), ध्रुव त्यागी (जिसकी हत्या समुदाय विशेष के लोगों ने इसलिए कर दी क्योंकि वो अपनी बेटी को छेड़छाड़ से बचा रहे थे), चंदन गुप्ता (जिसकी हत्या तिरंगा यात्रा के दौरान कर दी गई), रामलिंगम (जिसकी हत्या धर्मान्तरण का विरोध करने के कारण कर दी गई), सावन राठौड़ (समुदाय विशेष के लोगों ने जला कर मार डाला), गंगाराम, आदि…।

क्या इनमें से किसी एक के लिए भी स्वरा भास्कर ने आवाज़ उठायी? नहीं, ना!

लिंचिंग में तबरेज़ की मौत पर पूरे देश को लिंचिंस्तान घोषित करने वाली स्वरा भास्कर तब क्यों चुप हो जाती हैं, जब लिंचिंग में मरने वालों के धर्म बदल जाते हैं? जब लिंचिंग में किसी हिन्दू की मौत होती है, तब कहा जाता है उसे धार्मिक रंग ना दिया जाए लेकिन जब लिंचिंग में किसी मुसलमान की मौत होती है तो इसे धार्मिक रंग क्यों दिया जाता है? लिंचिंग गलत है और इसका विरोध होना चाहिए, सबको इसका विरोध करना चाहिए लेकिन इसका सलेक्टिव विरोध नहीं होना चाहिए।