गत 19 फरवरी पश्चिम बंगाल कैडर के 1986 बैच के आईपीएस अधिकारी गौरव चंद्र दत्त ने अपने घर में हाथ की नस काटकर खुदकुशी कर ली। आईपीएस अधिकारी को गंभीर हालत में साल्टलेक स्थित एएमआरआई अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके घर से एक सुसाइड नोट भी बरामद किया गया है। पुलिस सूत्रों ने बुधवार (20 फरवरी) को इस बात की जानकारी दी।

आईपीएस अधिकारी ने एक सुसाइड नोट लिखा है, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तानाशाही ने वहां की मीडिया को भी इतना डरा दिया है कि इसकी चर्चा बाहर नहीं हुई। लेकिन सच छिपाए नहीं छिपता। आईपीएस अधिकारी ने मुख्यमंत्री के खिलाफ सुसाइड नोट लिखकर उन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

क्या लिखा है सुसाइड नोट में?

सुसाइड नोट में गौरव चंद्र दत्त ने ममता बनर्जी पर संगीन आरोप लगाते हुए लिखा है, “आदरणीय मैडम मुख्यमंत्री, मुझे उम्मीद है मेरे इस कदम से आप का काला दिल बदलेगा।” इसके साथ ही आईपीएस गौरव ने अपने सुसाइड नोट में ममता बनर्जी सरकार की पोल खोलकर रख दी है। नोट में उन्होंने प्रदेश के अन्य पुलिस अधिकारियों के लिए भी एक साफ संदेश लिखते हुए उन्हें सावधान किया है। उन्होंने आगे लिखा है, “जितने भी आईपीएस अधिकारी काम कर रहे हैं, जो सत्तारूढ़ पार्टी को संतुष्ट करने के लिए काम कर रहे हैं, जो कानून के दायरे में रहकर काम नहीं कर रहे हैं, उन सभी के लिए मैं कहना चाहता हूं कि आप हमेशा याद रखिए कि वर्तमान सरकार के लिए आप केवल ‘यूज एंड थ्रो’ करने वाले एक मोहरा मात्र हैं। आज नहीं तो कल आपको जरूर इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाएगा। भले आज आप सत्ता के करीब हैं लेकिन कल जरूर आपको दूर फेंक‌ दिया जाएगा।”

सेक्यूलर बुध्दिजीवी और लिबरल गैंग के पत्रकार खामोश क्यों हैं?

अब सवाल यह है कि पुलिस विभाग के अधिकारी ने आत्महत्या कर ली और इसके पहले उन्होंने राज्य की मुखिया पर संगीन इल्जाम भी लगाए। फिर भी सारी सेक्युलर ब्रिगेड खामोश क्यों है? कल्पना कीजिए कि अगर ये घटना बीजेपी शासित किसी राज्य में हुई होती तो पूरे देश में ऐसा माहौल बनाया जाता जैसे पूरी जनता ही त्रस्त है और सभी दुखी हैं। संविधान खतरे में गया होता, सड़कों पर ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नाम से रैली निकाली जातीं, ‘भारत बंद’ किया जाता। बहरहाल, हमें ये तो समझ में आता है कि संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले सबसे बड़े पाखंडी हैं। लेकिन मीडिया का कुछ वर्ग क्यों खामोश है? खुद को सबसे बड़ा निष्पक्ष और सभी के लिए समान भाव से आवाज उठाने का दंभ भरने वाले पत्रकार महोदय कहां हैं? अब कहां गयी निष्पक्षता?

जाति/धर्म और राज्य सरकारों के आधार पर विरोध क्यों?

इस देश में पिछले पांच सालों में एक ऐसा माहौल बनाया गया है कि किसी मुद्दे का विरोध करना होता है, तो सबसे पहले राज्य में किस पार्टी की सरकार है, ये देखा जाता है, उसके बाद पीड़ित/पीड़िता और आरोपी का जाति-धर्म। अगर सब कुछ इन बुध्दिजीवियों के अनुसार रहा, तो देखते ही देखते एक ही रात में पूरे देश का माहौल कुछ दिनों के लिए बदल दिया जाता है। सुबह से लेकर शाम तक टीवी चैनलौं, अखबारों, आदि हर जगह वही खबर छाई रहती है, लेकिन अगर इसका उलट हो, तो उसकी भनक उस राज्य के कुछ हिस्सों को भी नहीं होगी।

ये लोग कहते हैं कि हम लोगों के लिऐ लड़ते हैं, उनके अधिकारों के लिऐ लड़ते हैं। ये कैसी लड़ाई है, जिसकी आवाज एक राज्य में जंगल की आग की तरह फैलती है, जबकि दूसरे राज्य में इसका धुंआ भी नहीं उठता? आखिर ये सलेक्टिविज्म क्यों? आम आदमी के जान की कोई कीमत तो नहीं है, चलिए ठीक है। लेकिन क्या एक आईपीएस अफसर के जान की भी कोई कीमत नहीं है? आखिर ऐसा क्यों और कब तक? याद रखिए, आज जैसा आप लोग दूसरों के साथ कर रहे हैं, भगवान न करें, क्या पता आपके साथ भी ऐसा हो सकता है और कोई आवाज उठाने वाला ना मिले। देश की जनता को भी चुनिंदा विरोधों से बाहर आकर हर गलत कार्य का विरोध करना होगा और उसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी। तभी हम एक समृद्ध भारत की कल्पना कर सकते हैं।

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