कश्मीर से Article 370 समाप्त होने के बाद लेफ्ट लिबरल गिरोह के बुद्धिजीवियो और पत्रकार के घड़ियाली आँसू थमने का नाम नही ले रहे है। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर कुतर्को के जरिये अपनी भड़ास निकाल रहे इस गैंग के सदस्य तर्कपूर्ण सवालों की भी लगातार अनदेखी कर रहे हैं। कश्मीर पर तीन किलोमीटर लंबे पोस्ट लिखने के बाद भी रवीश कुमार जैसे पत्रकार यदि 19 जनवरी 1990 के कश्मीर दंगों का उल्लेख करना भूल जाएं तो आप स्वयं अंदाज लगाइए वे क्या हैं, और ऐसे लोगो का मकसद क्या है?

लिबरल बुद्धिजीवी और पत्रकारों के कुतर्क

राणा अयूब और सवा नकबी कश्मीरी लोगों के बारे में बोल रहे हैं कि उनकी आवाज़ दबाई जा रही है यदि ऐसा होता तो शेहला राशिद जैसे लोग ट्वीट कैसे कर रहे होते। महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला तब तक ट्वीट करते रहे, ऐसे कैसे? क्या इन लोगों की नजरों में कश्मीरी पंडितों का मत मायने नहीं करता? क्या कश्मीर पर उनका हक नहीं है? आज तक इन पत्रकारों ने कभी 19 जनवरी को कश्मीरी पंडितों के लिए सहानुभूति में दो शब्द नहीं लिखे।

एक गंवार पत्रकार कल ट्वीट कर रहा था कि अब UN पीस कीपिंग फोर्स भारत पर कब्जा कर लेगी। पत्रकार महोदय को यही नहीं पता कि UN पीस कीपिंग फोर्स में भारतीय सेना का कितना प्रतिनिधित्व है, सच तो ये है कि अरबों रुपये का भुगतान UN ने भारतीय सेना को उसकी सेवा के लिए अब तक नहीं किया है। अफ्रीका में UN की पीस कीपिंग फोर्स में सबसे ज्यादा भारतीय सैनिकों की है। पता नहीं ऐसे गंवार, कैसे पत्रकार बन जाते हैं।

Article 370 भी असंवैधानिक तरीके से जोड़ा गया था

प्रशांत भूषण हमेशा की तरह आजाद कश्मीर के समर्थक रहे हैं। आज सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन फ़ाइल करेंगे इनका मानना है कि अनुच्छेद 370 असंवैधानिक तरीके से हटाया गया है। श्रीमान जी ये भूल जाते हैं कि ये जोड़ा ही असंवैधानिक तरीके से गया था, न किसी ने संसद में इसकी चर्चा की, न तत्कालीन गृहमंत्री पटेल से इसकी (तब अनुच्छेद 306) राय ली गई। उसके बाद नेहरू जब इसे UN में लेकर गए तब भी किसी नेता से इसकी राय नहीं ली गई।

 

कश्मीर पर तो शुरू से ही असंवैधानिक होता आया है। इसे जबर्दस्ती ही हटाया जा सकता था और इसीलिए  2019 में दोबारा पूर्ण बहुमत दिया गया। आप पिटीशन फ़ाइल करते रहिए, यदि सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक मानेगी तब भी राज्य विधानसभा से इसे पारित कराना पड़ेगा और तब राज्य विधानसभा जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश की होगी जिसमें से सम्भवतः मुख्यमंत्री जम्मू से निर्वाचित होकर आएगा और आसानी से ये बिल पास हो जाएगा। मतलब प्रशांत भूषण जी आप फिर से मुंह की खाएंगे।

रामचन्द गुहा भी रोते देखे गए हैं, इन्हें भी ये असंवैधानिक लग रहा था जबकि इन्होंने ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में नेहरू की न तो कश्मीर नीति को असंवैधानिक बताया न ही इंदिरा गांधी के किसी कारनामे को, ये गुलामी से आगे बढ़कर देखना ही नहीं चाहते।

क्या कश्मीरी पंडितों का कश्मीर नही है

दिलचस्प बात यह है कि कश्मीरी पत्थरबाजों के हक की बात करने वाले पत्रकार और छद्म उदारवादी कश्मीरी पंडितों को भूल जाते हैं उन्हें ये कश्मीरी ही नही समझते है। क्या सिर्फ पत्थरबाजों का कश्मीर हैं, महर्षि कश्यप की जमीन पर पनपे कश्मीरी पंडितों का नही हैं। 1990 तक कश्मीर की जनसांख्यिकी क्या थी, कश्मीरी पंडित क्या अपनी मातृभूमि के लिए संवेदना नहीं रखते क्या उनको हक नहीं है अपने घर वापस लौटने का? लेकिन इन सवालों की फिक्र किसे हैं उन्हें तो सिर्फ पत्थरबाज दिखाई देते हैं।

ये पत्रकार भूल जाते हैं कि किस प्रकार शेख अब्दुल्ला ने पंडित जवाहर लाल नेहरू और राजा हरिसिंह दोनो को धोखा दिया था। ये पत्रकार भूल जाते हैं कि 21 जनवरी, 1990 को कितने कश्मीरी पंडित अपने घरों से भगा दिए गए, कितनी महिलाओं की आबरू लूटी गई। ये पत्रकार भूल जाते हैं कश्मीर के चक्कर में कितने जवान शहीद हो गए? ये पत्रकार भूल जाते हैं कि कश्मीर की वजह से भारत कितना पैसा फालतू में खर्च कर देता है। ये पत्रकार भूल जाते हैं कि 2018 में मारे गए आतंकवादियों में से 80% कश्मीरी क्यों थे?

ये पत्रकार कश्मीरी युवाओं से सहानुभूति रखते हैं, आतंकी बुरहान वानी मरता है तो दुख जताते हैं लेकिन जब हवलदार औरंगजेब शहीद होता है तब इनकी सारी सहानभूति गायब हो जाती है। इन जैसे दोमुंहे पत्रकारों और छद्म उदारवादियों की वजह से FBI द्वारा घोषित आतंकी सईद गुलाम नबी फाई जैसे लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कॉन्फ्रेंस आयोजित करते थे जिसमें अरुंधति रॉय जैसे लोग, और चुनिंदा पत्रकार आजाद कश्मीर के लिए जाते थे। आज दर्द इसलिए हो रहा होगा इन्हें।

कश्मीर पर सरकार की पॉलिसी

अब बात करें यदि सरकार की, तो पिछले दो साल से कश्मीर में बहुत पैसा दे रही थी, AIIMS से लेकर हॉस्पिटल तक की कल्याणकारी योजनाएं इसी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को दी थी। पत्थरबाजों पर चलने वाले मुकदमें वापस लिए, कश्मीर और लदाख के लिए अलग से बड़े बड़े पैकेज जब यही सरकार दे रही थी तब तो महबूबा मुफ़्ती तारीफ करते नहीं थकती थीं क्योंकि रोकड़ा मिल रहा था। उसके बाद क्या मिला भारत को, पत्थरबाजी, उड़ी और गुरदासपुर जैसे आतंकी हमले। आपको क्या लगता है ये सब बिना स्थानीय लोगों के समर्थन के सम्भव होगा? नहीं। ये नकली पत्रकार फिर से ये बातें भूल जाते हैं कि देश पहले होता है। ये बात आप अमेरिकी मीडिया से सीखिए बोइंग का जब तीसरा जहाज लापता हुए तब जाकर दुनिया जान पाई कि समस्या सॉफ्टवेयर में है, लेकिन अमेरिकी मीडिया ने बोइंग का बचाव आखिर तक किया।

लिबरल बुद्धिजीवी और पत्रकारों का डबल स्टैण्डर्ड

पत्रकारिता का स्तर तब गिरा था जब JNU में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं’, ‘हर घर से अफजल निकलेगा’ जैसे नारे लग रहे थे और NDTV ने विरोध में ‘ये अंधेरा ही आज के समाज की तस्वीर है’ टैगलाइन लगाकर काली स्क्रीन कर ली थी। रवीश कुमार से तो ये उम्मीद ही की जा रही थी कि वे कश्मीर मुद्दे पर ऐसा ही स्टैंड लेंगे। सरकार की आलोचना आप कीजिये, लेकिन देश की अखंडता की बात हो तो समर्थन आपेक्षित है आपसे। यदि बरखा दत्त आतंकी अफजल गुरु के बेटे के वीजा के लिए अभियान चला सकती हैं तो घाटी में बेरोजगार युवाओं के आतंकी बनने के खिलाफ भी अभियान चलाना चाहिए।

कश्मीर घाटी में बहुत से लोग हैं जो तरक्की करना चाहते हैं, अलगाववादियों ने उनके बच्चों में जहर भर दिया ताकि आतंकी बन जाएं। अगर ऐसा न होता तो सेना के भर्ती कैम्प में कश्मीरी युवा नहीं आते न ही इंडियन आर्मी जॉइन करना चाहते। छद्म उदारवादियों को दुःख इसलिए है क्योंकि अब कश्मीर के नाम पर इन्हें विदेशी मदद मिलनी बन्द हो जाएगी।

राजनैतिक दलों का आत्मघाती तुष्टिकरण

कांग्रेस का 370 पर सरकार का साथ न देना तो समझ में आता है, पहले से उम्मीद थी। लेकिन अखिलेश यादव और नीतीश कुमार ने उड़ता तीर क्यों ले लिया? क्या इन्हें पता नहीं है कि देश की जनता का क्या मत है? मैंने तो कश्मीर के अलावा किसी भी आम नागरिक को रोते नहीं सुना चाहे वो किसी धर्म का हो। हां! वामपंथी छद्म उदारवादी और स्वघोषित बुद्दिजीवी जरूर टेसुएँ बहा रहे हैं, ये तो हमेशा से बहाते आये हैं।

बात इतनी सी है तथ्य और तर्क पर बात करेंगे तो इतिहास ही काफी है ये बताने के लिए कि कश्मीर मुद्दे पर क्या स्टैंड होना चाहिए। महर्षि कश्यप, कनिष्क से लेकर राजा हरि सिंह तक का इतिहास देखिए। 90 के दशक के आतंकवाद देखिए, 19 जनवरी 1990 के कश्मीरी पंडितो का नरसंहार देखिए … तमाम घटनाएँ ये बताने के लिए कि ये कश्मीर मुद्दे की खाज खत्म करनी क्यों जरूरी थी। मुद्दा इधर ही खत्म।

कौन है वह 61 सांसद जिन्होंने विरोध किया

अब मुद्दा ये बचता है कि वे 61 सांसद कौन हैं जिन्होंने इसके विरोध में वोट किया है? समर्थन देने और विरोध करने वाली पार्टीयों की लिस्ट आ चुकी है, एक बार नजर मारकर देख लीजिए कि 2019 में आपका वोट सही जगह गया था या गलत। धन्यवाद!!