जैसा कि हम सब जानते हैं, नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी भूकंप से जर्जर राज्य को पुनः खड़ा करना। इसी क्रम में उनका एक दूरदर्शी कदम था : “वाइब्रेंट गुजरात” शिखर सम्मेलन। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी निवेश को राज्य में लाना था क्योंकि गैर-कांग्रेसी राज्य था गुजरात इसलिए केंद्र से उतना पैसा नहीं आ पाता था। 2003 से शुरू हुए वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन का इस बार 9वां संस्करण था और इस बार की थीम थी : ‘शेपिंग ऑफ़ ए न्यू इंडिया‘। इस बार के वाईब्रेंट गुजरात – 2019 के पार्टनर देश हैं : ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चेक रिपब्लिक, डेनमार्क, फ्रांस, जापान, मोरक्को, नॉर्वे, पौलेंड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, नीदरलैंड, यूएई, उज्बेकिस्तान है। इनमें से पांच देशों यानि उज़्बेकिस्तान, रवांडा, चेक रिपब्लिक, माल्टा और डेनमार्क के प्रमुख भारत आये थे।

इसी दौरान उज़्बेकिस्तान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति शावकात मिर्ज़ियाएव और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक बीच द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

हमने उज़्बेकिस्तान-भारत के बीच कूटनीतिक सम्बन्धों पर एक विस्तृत आर्टिकल लिख रखा है : उज़्बेकिस्तान क्यों हैं भारत के लिए कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण? उज़्बेकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, भारत क्यों निवेश करना चाहता है, चीन-पाकिस्तान के सम्बन्धों पर क्या असर रहेगा जैसे कई सवालों पर हमने विस्तार से लिखा है; जरूर पढिये।

हाल ही में भारत-उज़्बेकिस्तान के बीच दो समझौते हुए हैं :
1. भारत उज़्बेकिस्तान को $200 मिलियन का लाइन ऑफ क्रेडिट (लोन) देगा और उज़्बेकिस्तान इस पैसे का उपयोग अपने लोगों की भलाई के प्रोजेक्ट्स (जैसे सोशल एंड हाउसिंग) पर ही कर सकता है।
2. उज़्बेकिस्तान भारत को यूरेनियम का निर्यात करेगा। ये समझौता परमाणु ऊर्जा विभाग भारत और उज़्बेकिस्तान की Novoi Minerals and Metallurgical Company के बीच हुआ है। दरअसल उज़्बेकिस्तान भारत को यूरेनियम अयस्क की लंबे समय तक आपूर्ति करता रहेगा।

जो लोग विज्ञान का कम ज्ञान रखते हैं उनके लिए बता दूं कि अयस्क से धातु का निष्कर्षण अलग अलग विधियों से किया जाता है। वहीं भारत यूरेनियम अयस्क इसलिए ले रहा है क्योंकि हमारे पास इसके निष्कर्षण के दो प्लांट पहले से हैं और ये सस्ते भी पड़ते हैं। मुंबई का ट्राम्बे और मैसूर का रेयर मैटेरियल प्लांट, यूरेनियम को इसके अयस्क से अलग करेंगे।

आतंक की फैक्ट्री यानि पाकिस्तान जैसे देश भारत पर आरोप लगाते रहे हैं कि भारत अपने परमाणु आयुधों में बृद्धि कर रहा है। इसलिए ये सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भारत इस यूरेनियम का करेगा क्या? बहुत से ऐसे सवाल कथित बुद्धिजीवी और वामपंथी पूछेंगे : इसलिए इसके जबाब ऐसे दीजिये –
1. डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के अनुसार 15000 टन यूरेनियम की अवश्यता है।
2. भारत ने पेरिस पर्यावरण समझौते पर भारत में कार्बन उत्सर्जन को 2022 तक कम करने का करार कर रखा है ऐसे में देश की 70% विद्युत आपूर्ति करने वाले थर्मल पावर प्लांट की जगह नाभिकीय संयंत्रों से विद्युत आपूर्ति करवानी पड़ेगी जिसके लिए यूरेनियम की अवश्यता पड़ेगी।
3. हालाँकि भारत में भी यूरेनियम की खदानें हैं लेकिन यदि हम स्वयं इसके अयस्क को खदान से निकालकर निष्कर्षण करेंगे तो इसकी लागत किसी और देश से मंगवाए यूरेनियम से ज्यादा आएगी।
4. भारत के 22 में से 8 नाभिकीय संयंत्र स्वदेशी यूरेनियम से चल रहे हैं जिनकी क्षमता 2400MW है जबकि 4380MW क्षमता के 14 नाभिकीय संयंत्र विदेशी यूरेनियम पर आश्रित हैं। इसलिए हमें हमारे देश में विद्युत आपूर्ति को बनाये रखने के लिए यूरेनियम की अवश्यता है।