NDTV के जाने माने पत्रकार रवीश कुमार जी आजकल लोगों से मात्र ढाई महीने TV पर न्यूज़ न देखने की अपील कर रहे हैं। मैं उनकी इस बात से सहमत हूँ कि आजकल मीडिया का स्तर बेहद गिर चुका है; पर पत्रकार महोदय के तर्क काफी हद तक पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। इसी वजह से न चाहते हुए भी हमें इसका विश्लेषण करना पड़ रहा है –

“अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। चैनल आपकी नागरिकता पर हमला कर रहे हैं। लोकतंत्र में नागरिक हवा में नहीं बनता है। सिर्फ किसी भौगोलिक प्रदेश में पैदा हो जाने से आप नागरिक नहीं होते। सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए ज़रूरी है। इन न्यूज़ चैनलों के पास दोनों नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारिता के इस पतन के अभिभावक हैं। संरक्षक हैं। उनकी भक्ति में चैनलों ने ख़ुद को भांड बना दिया है। वे पहले भी भांड थे मगर अब वे आपको भांड बना रहे हैं। आपका भांड बन जाना लोकतंत्र का मिट जाना होगा।”

— ये तो पढ़कर ही अचंभित करने वाला है कि यदि किसी ने न्यूज़ चैनल देखने बन्द नहीं किये तो वो भारत का नागरिक ही नहीं रहेगा। लोकतंत्र में नागरिक कैसे बनते हैं ये जानने के लिए आपको भारत का संविधान पढ़ना पड़ेगा जिसमें नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद जन्मा व्यक्ति भारत गणतंत्र का नागरिक होगा। यदि कोई व्यक्ति 1 जुलाई 1947 से पूर्व जन्मा है उसकी नागरिकता उसके माता-पिता की नागरिकता के हिसाब से रहेगी। भारतीय संविधान के अनुसार आजादी के बाद भारत के भौगोलिक क्षेत्र में पैदा हो जाने भर से ही कोई भी भारत का नागरिक बन सकता है, इधर रवीश कुमार जी शायद ‘जिम्मेदार नागरिक’ बनने की तरफ इशारा कर रहे होंगे। एक जिम्मेदार नागरिक देश की साफ-सफाई का ध्यान स्वयं रखता है उसके लिए किसी प्रधानमंत्री को स्वच्छ भारत अभियान चलाने की जरूरत न पड़ती न ही पत्रकार महोदय को ये बताने की ज़रूरत पड़ती कि इधर अभी गन्दगी बची हुई है। भारतीय संविधान अपने हर नागरिक और पत्रकार को सूचना का अधिकार देता है, भारत सरकार हर तथ्य और आकंड़े अपने डिजिटल पोर्टल्स पर नागरिकों की जानकारी के लिए उपलब्ध कराती है; यदि कुछ जागरूक पत्रकार वो जानकारी जनता के समक्ष रखते हैं या उस पर विवेचना करते हैं तो उन्हें भांड कहा जायेगा? वेशक उन्हें सरकार की आलोचना भी करनी चाहिए लेकिन क्या पत्रकार महोदय की तरफ ही केवल आलोचना करके जनता तक कुछ अच्छे कामों तक भी नहीं पहुंचने देना चाहिए? दोनों ही तर्कों के आधार पर बाकी पत्रकारों के साथ साथ रवीश कुमार को भी इन्ही सवालों के दायरे में लाया जा सकता है क्योंकि जनता तक सही जानकारी ये भी उपलब्ध नहीं कराते, ये केवल सवाल करते है और कुछ पत्रकार केवल तारीफ। जनता दौनो तरफ से मूर्ख बन रही है, रवीश कुमार स्वयं पाक साफ नहीं हैं।

अभिभावक वो होता है जो वयस्क होने तक बच्चे की जिम्मेदारी का वहन करता है। यदि कोई पत्रकार नरेंद्र मोदी की योजनाओं का तारीफ कर रहा है या रवीश कुमार जैसे सवाल खड़े कर रहा है तो इसका मतलब वो पर्याप्त ज्ञान रखता है उसे किसी के निर्देशन की जरूरत नहीं है। इसमें नरेंद्र मोदी के अभिभावक होने का तर्क तो एकदम बेहूदा है, यदि कोई नरेंद्र मोदी का समर्थक है तो इसका मतलब ये नहीं कि नरेंद्र मोदी उसके अभिभावक बन उसकी हर प्रतिक्रिया के जिम्मेदार होंगे। लोकतंत्र में आवाज़ उठाने का अधिकार सबका है और विचार सबके आमंत्रित होते हैं, यदि पत्रकारिता के सकारात्मक विचार लोकतंत्र को भांड बना रहे हैं तो नकारात्मक विचार भी यही कर रहे हैं। किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित होना आपको भांड ही बनाएगा रवीश कुमार जी, आप स्वयं किसी भी सरकारी योजना का बिना पूर्वाग्रह के विश्लेषण नहीं करते। जो सत्य जानकारी है पहले जनता तक वो तो उपलब्ध करवाना सीखिए।

“अगर आप लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका निभाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप अपने बच्चों को सांप्रदायिकता से बचाना से बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें।”

— सहमत हूँ कि न्यूज़ चैनलों का स्तर गिर गया है, इसको दुरुस्त करने की ज़रूरत है। “आंखें बंद करने से वास्तविकता नहीं मिट जाती”; इसके लिए आपने समाधान की बजाय आंखें बंद करने को प्राथमिकता दी। बेहद ही बचकाना हल।

“अगर आप भारत में पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। न्यूज़ चैनलों को देखना ख़ुद के पतन को देखना है। मैं आपसे अपील करता हूं कि आप कोई भी न्यूज़ चैनल न देखें। न टीवी सेट पर देखें और न ही मोबाइल पर। अपनी दिनचर्या से चैनलों को देखना हटा दीजिए। बेशक मुझे भी न देखें लेकिन न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कीजिए।”

— ये बात तो समझ से परे है कि मात्र ढाई महीने न्यूज़ चैनल न देखने से पत्रकारिता बच जाएगी। यदि ऐसे पत्रकारिता बच रही है तो आधी-अधूरी क्यों बचा रहे हैं? लोगों से अपील करें कि आजीवन न्यूज़ चैनल न देखें और पत्रकारिता के शरीर में जीवन रक्षक पेटी बांध दें। गजब तर्क हैं पत्रकार महोदय के!!

“जब पाकिस्तान से तनाव नहीं होता है तब ये चैनल मंदिर को लेकर तनाव पैदा करते हैं, जब मंदिर का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल पद्मावति फिल्म को लेकर तनाव पैदा करते हैं जब फिल्म का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल कैराना के झूठ को लेकर हिन्दू-मुसलमान में तनाव में पैदा करते हैं।”

— पत्रकार महोदय का आरोप है कि भारत के न्यूज़ चैनल्स LOC पर पाकिस्तान या भारत की तरफ से सीजफायर का उलंघन करते होंगे तभी शायद पाकिस्तान से तनाव होता होगा। याद कीजिये, पाकिस्तान भी भारतीय मीडिया पर ऐसे आरोप लगाता आया है, उदाहरण आप विंग कमांडर अभिनंदन के पाकिस्तान द्वारा जारी 30 कट वाले प्रोपगंडा वीडियो में देख चुके होंगे। पद्मावती पर विवाद तो फ़िल्म बनाने वालों ने किया था जब खिलजी-पद्मावती पर अश्लील चुंबन सीन फिल्माए जा रहे थे तब करणी सेना ने विरोध किया। सालों से हिंदुओं को विलेन बनाकर रखने वाली मीडिया में यदि कुछ पत्रकार ऐसे आ गए जो इन मुद्दों पर डिबेट कराने लगे तो रवीश कुमार जैसे पत्रकारों का ज़मीर जाग गया? क्या हिन्दू और मुसलमान दौनो ही बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद का हल नहीं चाहते? क्या ये राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है, यदि है तो राष्ट्र को इन मुद्दों से आंखें नहीं फेरनी चाहिए। यदि पत्रकार सही तरीके से नहीं दिखा रहे हैं तो पत्रकारिता में खामी है उसे दुरुस्त कीजिये नाकि लोगों से अपील कीजिये ये मुद्दों पर ध्यान ही न दें। जब आपके नरेटिव औंधे मुंह गिर पड़ें और आपके चैनल की TRP डूबने लगे तब मेहनत करने की बजाय आप बाकी सब चैनल्स को बंद कराने पर ध्यान देंगे। वाह! क्या सोच है पत्रकार महोदय!

इसके आगे रवीश कुमार जी नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार, बीजेपी और पत्रकारिता के विलय पर लिखते हैं। न्यूज़ चैनलों की फर्जी और कलात्मक खबरों पर लिखते हैं और ये सब उनकी स्वयं की पत्रकारिता का हिस्सा है। उनके अनुभव को ध्यान में रखकर मेरे जैसे तमाम लोगों को उनसे अपेक्षा थी कि वे पत्रकारिता की खामियों को दूर करने का प्रयास करते नाकि हम लोगों से आंखें बंद करने की अपील करते क्योंकि हम लोग ढाई महीने यदि न्यूज़ चैनल देखना बन्द भी कर देंगे तब भी ये स्थिति नहीं मिटने वाली। जिस प्रकार रवीश कुमार ने भाजपा समर्थकों से अपील की है कि वे सही जानकारी प्राप्त करते रहे उसी प्रकार भाजपा समर्थक भी चाहेंगे कि यदि एक भी भाजपा सरकार की अच्छी योजना है तो उसे रवीश कुमार जी जनता तक अवश्य पहुंचाएं। चूंकि उनकी तरफ से ये सम्भव नहीं इसलिए वे लोगों को भी सलाह देने का हक़ खो देते हैं। लोग आपकी बात तभी मानेंगे जब आप अपना पूर्वाग्रह छोड़ेंगे।

बात सिर्फ ढाई महीने की नहीं है, बात है सच्चाई की। “भारत तेरे टुकड़े होंगे”, “अफजल हम शर्मिंदा हैं” जैसे नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार, उम्र खालिद जैसे देशद्रोही तत्वों के समर्थन में जब रवीश कुमार की NDTV ने अंधेरा करके लिखा था ‘ये अंधेरा ही आज की तस्वीर है’ तब कहाँ गई थी आपकी पत्रकारिता ? JNU की जांच कमेटी ने इन्हें दोषी करार दिया है और कोर्ट भी जल्द इन पर फैसला करेगा तब क्या जनता को आपसे ये सवाल पूछने का हक़ नहीं है कि आपने क्यों इनका साथ दिया था तब? और जब यही सवाल जनता आपसे पूछने लगती है तो आप उन लोगों पर ‘भक्त’ होने का ठप्पा लगा देते हैं। सवाल पहले अपने आप से पूछिए पत्रकार महोदय, क्या आप वाकई में सच्ची पत्रकारिता में यकीन रखते भी हैं? पहलू खान की मौत पर आप घण्टों न्यूज़ चलाते हैं लेकिन चन्दन गुप्ता की उन्ही परिस्थितियों में हुई हत्या पर मौन धारण कर लेते हैं। कैराना की घटना आपको झूठ लगती है और मालदा जैसी घटनाएं आपने जिस प्रकार आँखें बंद करके नजरअंदाज कर दी आप चाहते हैं वे सभी तथ्य लोग भी ऐसे ही नजरअंदाज कर दें।

आंखें खोलिए रवीश कुमार जी! देश बदल रहा है, न्यूज़ चैनल देखना बन्द कर देने से समस्याओं का समाधान नहीं हो जाएगा। लोगों के तर्क आपके आत्मसम्मान के साथ हों या खिलाफ, उन्हें सुना जाना चाहिए, यही लोकतंत्र है जिसकी समझ शायद आप मद में चूर होकर भूल चुके हैं। उम्मीद है, आप एक बार इन सब पर विचार अवश्य करेंगे।

सन्दर्भ : पत्रकार महोदय का फेसबुक पोस्ट इधर है :
क्या आप इन ढाई महीने के लिए चैनल देखना बंद नहीं कर सकते? कर दीजिए : रवीश कुमार

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