पिछले कुछ सालों में बहुत तरह के लोगों की विचारधारा देखी सुनी होगी। इतिहासकार, फिल्मकार, विचारक, आदि की अलग अलग विचारधारा से रूबरू हुए होंगे। इस बीच आपने कई पत्रकारों की अलग अलग पत्रकारिता भी देखी होगी। इसमे भी दो धड़ा है। एक वो धड़ा सिर्फ मोदी विरोध के नाम पर किसी भी हद तक जा सकता है, दूसरा गलत को गलत और सही सही कहने वाला। खैर, लोकतंत्र में सबको एक दूसरे की विचारधारा, उनकी नीतियों की आलोचना का पूर्ण अधिकार है।

लेकिन आज के समय में कुछ लोग मोदी विरोध के नाम पर इस कदर गिर चुके हैं कि वे देशद्रोहियों और देशभक्तों में अंतर भी नहीं करते। प्रधानमंत्री जिस जिस राज्य में अपनी रैली करते हैं, उस राज्य के पारंपरिक परिधान को महत्व देते हैं और वही धारण करके रैली को संबोधित करते हैं। हाल ही में ऐसा ही कुछ हुआ।

गत 9 फरवरी को अरूणाचल प्रदेश में पीएम मोदी की रैली थी। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश की जनता को ‘निशि जनजाति’ का पारम्परिक पहनावा पहनकर सम्बोधित किया। पीएम का यह पहनावा स्वघोषित सेक्यूलरवादियों को नहीं भाया। कांग्रेस पार्टी से संचालित होने अखबार ‘नेशनल हेराल्ड’ की संपादक एवं प्रख्यात साहित्यकार मृणाल पांडे ने एक ट्विटर ट्रोलर आशीष मिश्रा के ट्वीट का सहारा लेकर राज्य की ‘निशि जनजाति’ को ‘मोर’ बता दिया और उन पर नस्लीय टिप्पणी भी किया।

सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में आशीष ने निशि जनजाति को ‘मोर’ बताते हुए प्रधानमंत्री की फोटो ट्वीट की और लिखा, “आज दुग्गल साहब मोर हैं”, जिसे स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकारों द्वारा खूब रीट्वीट भी किया गया। बाद में जब आशीष मिश्रा के ट्वीट पर कुछ लोगों ने जमकर हमला बोला, तो उन्होंने डरकर अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। लेकिन जबतक वो डिलीट करते, बहुत देर हो चुकी थी और निशि जनजाति का मजाक बनाया जा चुका था।

मृणालपांडे ने जब इस ट्वीट के जवाब में जो लिखा, वो और तुच्छ था। उसमें मोदी की तरफ इशारा करते हुए एक मुर्गे को कोट पहनाया हुआ दिखाया गया है।

उनके इस अशोभनीय कृत्य पर अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी आड़े हाथ लिया। ट्विटर पर निशि जनजाति पर बन रहे इस मज़ाक से आहत अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने अपने अपने ट्विटर हैंडल से लिखा, “ईटानगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो भाषण के दौरान पहना हुआ है, वह अरुणाचल प्रदेश की निशि जनजाति का ‘हेडगेयर’ है। घृणा या असहिष्णुता को अपने विवेक पर हावी न होने दें।”

गौरतलब है कि पीएम ने रैली के दौरान एक पारंपरिक टोपी पहनी थी, जिसे ‘ब्योपा’ कहते हैं। अरुणाचल के सरकारी कार्यक्रमों में ब्योपा को मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथियों को उपहार स्वरूप भेंट करने का चलन है।

मृणाल पांडे इससे पहले भी पीएम पर व्यक्तिगत टिप्पणी कर अपनी निचली मानसिकता का परिचय दे चुकी हैं। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2017 में नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के दिन को ‘जुमला दिवस’ कहा था। आपको बता दें कि मृणाल पांडे प्रख्यात हिंदी साहित्यकार दिवंगत शिवानी पांडे की पुत्री हैं। शिवानी हिंदी का चमकता हुआ सितारा थीं।

जनजातियों और छोटे व्यापारियों का मजाक बनाना यह कांग्रेस और मीडिया का यह गिरोह अकेला नहीं है। इससे पहले कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने नागाओं का मजाक बनाया था। वर्ष 2018 में पीएम ने एक साक्षात्कार के दौरान पकौडे बेचने को रोजगार बताया था, जिसके बाद कांग्रेस सहित कई पत्रकारों ने पकौड़े वालों का मजाक बनाया था, जिसमे दूसरे क्षेत्रों से बुद्धिजीवी वर्ग भी शामिल था।