आज हम आपको एक ऐसे हिंदू सम्राट के बारे में बताएंगे, जिन्हें मृत्यु स्वीकार थी, लेकिन इस्लाम नहीं, जिन्हें सिर कटवाना स्वीकार था, लेकिन कलमा पढना नहीं। जो शेरशाह सूरी के दरबार में तो रहे थे, लेकिन व्यवहार, तेज में हिंदुत्व विद्यमान था।

आपको पुस्तक में यह पढ़ाया होगा कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान थे। लेकिन आपको किसी भी पुस्तक में यह ठीक से नहीं बताया गया होगा कि शेरशाह सूरी और अकबर के मध्य पूरे हिंदू रीति रिवाज से उसी दिल्ली के सिंहासन पर एक हिंदू सम्राट आसीन हुए, जिन्होंने 350 साल के इस्लामी शासन को उखाड़कर फेंक दिया। इन पुस्तकों में यह भी नहीं बताया गया होगा कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने के बाद इस हिंदू शासक ने “विक्रमादित्य” की उपाधि धारण की। अपने नाम के सिक्के जारी किए और गौहत्या के लिए मृत्युदंड का नियम बनाया।

जी हां! हम बात कर रहे हैं महान हिंदू सम्राट “हेमचंद्र विक्रमादित्य” के बारे में। इन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 24 युद्ध लड़े, जिनमे से 22 युद्ध में विजयी हुए।

 

कौन थे राजा हेमचंद्र विक्रमादित्य ‘हेमू’?

‘हेमू’ का जन्म सन् 1501 में राजस्थान के अलवर जिले के मछेरी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम रायपूर्ण दास था। पिताजी एक गरीब ब्राह्मण थे और पुरोहिताई का कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। लेकिन इस्लामी आक्रांताओं के अत्याचार के कारण पिताजी हरियाणा के रेवाड़ी आ गये और यहां व्यापार करने लगे। इस तरह से कर्म के आधार पर वह एक वैश्य हो गए। हालांकि, कुछ लोग इन्हें ब्राह्मण मानने से इंकार करते हैं।

 

संस्कृत और हिंदू के साथ घुड़सवारी में महारथ

हेमू को संस्कृत, हिंदी और फारसी के साथ साथ गणित का भी ज्ञान था। इतना ही नहीं, इस पराक्रमी राजा को घुड़सवारी में भी महारथ  प्राप्त थी। समय बीतता गया और हेमू ने शेरशाह सूरी के राज्य में अपने पिता के कार्य में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। उनके पिता सूरी के राज्य में अनाज और गन पाउडर के प्रबंधन का कार्य देखते थे।

शेरशाह ने इस बालक की शक्ति और तेज को पहचाना और अपनी सेना में शामिल कर लिया। 1540 में शेरशाह ने हुमायूँ को दूसरी बार बुरी तरह हराकर भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। इसके बाद 15 साल तक हुमायूँ छिपकर जीवन व्यतीत करने लगा। 1540 से 1545 तक शासन करने के बाद शेरशाह की मृत्यु हो गई। 1540 में ही शेरशाह की जीत के बाद हेमू ने हथियार बनाना शुरू किया। शेरशाह की मृत्यु तक हेमू ने युद्ध का अच्छा खासा ज्ञान हासिल कर लिया था।

बन गए राज्य के सर्वेसर्वा

शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इस्लाम शाह गद्दी पर आसीन हुआ। हेमू के कार्य से प्रभावित होकर इस्लाम शाह ने उसे अपने राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। इस्लाम शाह एक आलसी शहंशाह था। वह अपना सारा काम हेमू के भरोसे छोड़ देता था या यूं कहें कि इस्लाम शाह के सभी प्रमुख कार्य हेमू ही करते थे। इसका उन्हें अत्यधिक लाभ हुआ और उन्होंने युद्ध और राज्य पर शासन करने में गहन विद्या हासिल कर ली।

सन् 1553 में हेमू के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद आदिलशाह दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ। आदिलशाह एक भोग विलासी और शराबी शासक था। अपने विरुद्ध उठ रहे विद्रोहियों की आवाज दबाने के लिए उसे हेमू जैसे कुशल प्रशासक की आवश्यकता थी। इसलिए उसने हेमू को अपने ग्वालियर किले के प्रधानमंत्री के अलावा अफगान फौज़ का मुखिया भी नियुक्त कर दिया। इस तरह हेमू राज्य के सर्वेसर्वा बन गए। पदभार ग्रहण करते ही हेमू ने कर ना चुकाने वाले अफगान सामंतों को बुरी तरह कुचल डाला। इसके बाद उन्होंने इब्राहिम खान, सुल्तान अहमद खान जैसे बड़े और प्रबल विद्रोहियों को परास्त कर मौत के घाट उतार दिया।

दिल्ली पर विजय प्राप्त कर स्थापित किया हिंदू राज

हेमू के पराक्रम को देखकर आदिलशाह अपना मानसिक संतुलन खो बैठा। जब वह बंगाल में विद्रोहियों को कुचल रहे थे तो हुमायूँ ने अवसर देख पंजाब और आगरा पर पुनः अधिकार कर लिया। हेमू को हिंदू तथा अफगान सैनिकों का समर्थन प्राप्त था। पंजाब और आगरा पर अधिकार करने के सिर्फ 6 महीने बाद ही हुमायूँ की पुस्तकालय की सीढियों से गिरकर मृत्यु हो गई। इसके बाद इसका पुत्र अकबर गद्दी पर बैठा। इस समय परिस्थितियां हेमू के अनुकूल थीं। इसका लाभ उठाकर उन्होंने दिल्ली पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने का स्वर्णिम अवसर अवसर देखा।

अपनी विशाल सेना के साथ वह बंगाल से वर्तमान बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, आदि को रौंदते हुए दिल्ली की तरफ चल पड़े। उनकी वीरता से भयभीत होकर मुगल कमांडरों में भगदड़ मच गई। आगरा का मुगल कमांडर सिकन्दर खान बिना लड़े ही भाग खड़ा हुआ। हेमू ने बड़ी आसानी से इटावा, कालपी, बयाना, आदि जगहों को अपने अधीन कर लिया। इसके बाद दिल्ली की बारी थी। दिल्ली विजय करने के लिए उन्होंने तुगलकाबाद के पास मुगल फौजों को मात्र एक दिन में परास्त कर दिल्ली पर विजय पा ली। इसके बाद पूरे धार्मिक विधि विधान से हेमू का राज्याभिषेक हुआ। इस प्रकार हेमू ने सदियों से मुस्लिमों की गुलामी में जकड़े भारत को मुक्त करा हेमू ने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। उन्होंने अपने चित्रों वाले सिक्के जारी किए, राज्य में हिंदू अधिकारियों की नियुक्ति की। अपने कौशल तथा पराक्रम के बलबूते ‘हेमचंद्र विक्रमादित्य’ अब देश के सर्वोच्च शिखर पर आसीन थे।

5 नवंबर, 1556 को जब पानीपत के युद्ध क्षेत्र में दोनों सेनाएं आमने सामने थीं। अकबर के तत्कालीन सेनापति बैरम खां ने इस दिन युद्ध में भाग नहीं लिया था। दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध चल रहा था। हेमू की प्रारंभिक सफलताओं से ऐसा प्रतीत हुआ कि जल्दी ही मुगल डरकर भाग जाएंगे। लेकिन 6 नवंबर, 1556 का दिन उनके जीवन में एक काल बनकर आया। दुर्भाग्यवश हाथी पर सवार होकर मुगल सेना को मौत के घाट उतार रहे हेमू की आंख में एक तीर आकर लग गया। इसके बाद हेमू बुरी तरह घायल हो गए। इसका फायदा उठाकर बैरम खां ने हेमू को पकड़ लिया और बेरहमी से इस महान हिंदू योद्धा का सिर धड़ से अलग कर दिया। इतना ही नहीं, इन दरिंदों ने अपनी कायरता दिखाते हुए हिंदू सम्राट का सिर काबुल के एक किले पर लटका दिया गया और धड़ दिल्ली के एक किले के बाहर लटका दिया गया।

कहते हैं कि इस्लामी आक्रामणकारी अपनों के नहीं होते, तो दूसरों के क्या होंगे। उनके अंदर सिर्फ ‘मैं’ की भावना होती है। इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं। ठीक इसी तरह हेमू की हत्या के बाद मुस्लिम अत्याचारियों ने उनके 80 वर्षीय वृद्ध पिता का कत्ल कर दिया। कत्ल करने से पहले बैरम खां ने हेमू का कटा हुआ सिर पिता के पास भेजा और कहा कि वो या तो इस्लाम स्वीकार कर लें या अपनी जान द दें। इस पर इस हिंदू सम्राट के पिता ने जवाब दिया, ‘जिन देवों की 80 वर्ष तक पूजा की है, उन्हें कुछ वर्ष और जीने के लोभ में नहीं त्याग सकता।’

अकबर ने दिल्ली में कराया हजारों हिंदूओं का नरसंहार

वामपंथी इतिहासकारों ने जिस अकबर को महान बताया, उस अकबर के बारे में ये नहीं बताया गया कि हेमू की हत्या के बाद अकबर ने दिल्ली पहुंचकर सैकडों-हजारों हिंदूओं का कत्लेआम करवाया और जगह जगह कटे हुए सिरों को लटका दिया, ताकि फिर दुबारा किसी हिंदू की आवाज उठाने की हिम्मत ना हो। पानीपत के युद्ध संग्रहालय में हिंदूओं की दुर्दशा के रूप में आज भी एक स्मारक मौजूद है, किंतु हिंदूओं का हाल ये है कि जहां अकबर द्वारा बनवाए गए किलों-मीनारों को सरकारी सुरक्षा मिली है, वहीं इस महान हिंदू सम्राट को योग्य सम्मान नहीं मिला।