Triple Talaq Bill passed in Rajya Sabha: तीन तलाक को अपराध करार देने वाला विधेयक आखिरकार राज्यसभा से भी पास हो गया है और राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद यह कानून की शक्ल ले लेगा। इस बिल को पास होने के बाद इसे मुस्लिम महिलाओं और मोदी सरकार दोनों के लिए एतिहासिक बताया जा रहा है। आइये जानते है की ट्रिपल तलाक बिल ऐतिहासिक क्यो है?

ट्रिपल तलाक को खत्म करने की राजीव गांधी नही जुटा पाए हिम्मत

ट्रिपल तलाक को खत्म करके मोदी सरकार ने बहुत बड़ी हिम्मत का काम किया हैं, बता दें ट्रिपल तलाक को छेड़ने की हिम्मत आज तक देश का कोई नेता नही जुटा पाया था। पूर्ण बहुमत वाली राजीव गांधी की सरकार भी मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने झुक गयी थी और सुप्रीम कोर्ट का बहुचर्चित शाहबानों केस में फैसला संसद मे पलट दिया था।

कौन थी शाहबानों?

शाहबानो मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थीं। उनके पति ने जब उन्हें तलाक दिया तब उनकी उम्र 62वर्ष की थी। अपने पांच बच्चों के साथ पति से अलग हुईं शाहबानो के पास कमाई का जरिया नहीं था। लिहाजा उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के अंतर्गत अपने पति से भरण पोषण भत्ते की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया।

मुस्लिमों के दबाव में राजीव गांधी ने पलटा फैसला

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो के पक्ष में आए न्यायालय के फैसले के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। देश के तमाम मुस्लिम संगठन इस फैसले का विरोध करने लगे। उनका कहना था कि न्यायालय उनके पारिवारिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करके उनके अधिकारों का हनन कर रहा है। देश के अलग-अलग हिस्से में विरोध प्रदर्शन होने लगे। केंद्र की सत्ता में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी, राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर दिया। इस अधिनियम के जरिये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया गया।

क्या है ट्रिपल तलाक

तीन तलाक जिस तरह से आज मुस्लिम समुदाय में चलन में है, इसका कोई भी जिक्र कुरान और हदीस में नहीं मिलता, फिर भी समाज में लंबे वक्त से चलते आने के कारण ये एक बड़ा ही पेचीदा मसला बन गया है। तीन तलाक का अभी मौजूदा रूप भारत में हैं कि एक साथ तीन बार तलाक तलाक कहकर औरत से फुर्सत पा ली जाती हैं। यह इतना गलत हैं कि दुनिया के कई इस्लामिक देशों में भी बैन हैं। बहरहाल इसको अच्छे से समझने के लिए आपको सबसे पहले निकाह हलाला जैसी इस्लामिक प्रथाओं को समझना बेहद जरूरी है।

इद्दत और हलाला के मतलब?

तलाक के बाद लड़की अपने मायके वापस आती है और इद्दत के चार महीने 10 दिन बिना किसी पराए आदमी के सामने आए पूरा करती है, ताकि अगर लड़की प्रेग्नेंट हो तो ये बात सभी के सामने आ जाए, जिससे उस औरत के ‘चरित्र’ पर कोई उंगली न उठा सके।

शरिया के मुताबिक, अगर एक पुरुष ने औरत को तलाक दे दिया है तो ऐसे में अगर मर्द फिर से अपनी तलाकशुदा बीवी को पाना चाहें तो तब तक नहीं पा सकता, जब तक उस औरत ने फॉर्मल तरीके से दूसरे मर्द से शादी (मानिए सेक्स) न की हो और उसके बाद उससे तलाक न ले लिया हो। औरत की दूसरी शादी को ‘निकाह हलाला’ कहते हैं।

इसके बेहद बचकाना कारण दिए जाते हैं जो आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी के शायद ही गले उतरें। कहा जाता है कि औरत के दूसरे मर्द से शादी करने और शारीरिक संबंध बनाने से उसके पहले पति को दुख पहुंचता है और उसे अपनी गलती का अहसास होता है।

हालांकि इस प्रथा की आड़ में कई बार औरत की जबरदस्ती दूसरी शादी कर उसके साथ बलात्कार करवा दिया जाता है, ताकि उस औरत से फिर से पहला पति शादी कर सके। ऐसे कई मामले पिछले कुछ समय में सामने आए हैं।

बता दें कि इसके पीछे कारण ये है कि जिस सोच के साथ ये कानून बनाए गए थे, उनमें इस्लामिक समाज में औरत मर्द की संपत्ति होती है, इसलिए जरूरी है कि मर्द को उसे खोने का अहसास दिलाया जाए, इसलिए एक मर्द को सजा देने के लिए औरत का नए मर्द के साथ सेक्स करना जरूरी हो जाता है, यही होता है ‘हलाला’।

अभी लड़ाई बाकी है

ट्रिपल तलाक बिल के राज्यसभा में पेश हो जाने के बाद निश्चित रूप से तीन तलाक के मामले अब खत्म होंगे, लेकिन अभी भी आधुनिक समाज के नियम कायदे के मुताबिक चलने के लिए उन्हें लम्बा रास्ता तय करना हैं। तीन तलाक खत्म होने के बाद अब मुस्लिम महिलाएं को निकाह हलाला और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं के भी खिलाफ लड़ना है।

बता दें, मोदी सरकार इन दो कुप्रथाओं को लेकर भी गंभीर है। चुनाव से पहले अपने संकल्प पत्र में तीन तलाक, निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए कानून पारित करने का संकल्प व्यक्त किया था। ऐसे मे  अब उसके पास तीन तलाक पर रोक लगाने के बाद उसकी निगाह निकाह हलाला और बहुविवाह पर होगी।