वंदे मातरम मित्रों! मिलिट्री एंड इंटेलिजेंस सीरीज के पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा कि कैसे हमारे जवानों ने सियाचिन ग्लेशियर पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। जहां भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत सफलतापूर्वक पूर्ण किया वहीं पाकिस्तान को ऑपरेशन अबाबील में मुंह की खानी पड़ी।

सलटोरों श्रृंखला की लगभग सभी पहाड़ियों पर भारतीय सेना तैनात थी वहीं इसके पश्चिमी किनारे की तलहटी में पाकिस्तान का कब्जा था। पाकिस्तान ने 1984 के बाद कई बार भारतीय सेना की इन पोस्ट्स पर हमला किया जिससे कि इन पर कब्जा किया जा सके लेकिन हर बार पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा। भारत ने पूरे सियाचिन क्षेत्र में तकरीबन 3000 जवान तैनात कर रखे थे। जैसा कि मैंने ऑपरेशन मेघदूत पर लिखी पिछली पोस्ट में बताया था कि तत्कालीन ब्रिगेडियर जनरल परवेज मुशर्रफ के नेतृत्व में पाकिस्तान ने हमारी कुछ पोस्ट पर हमला करके जीत हासिल कर ली थी उन्हीं में से एक जीती हुई पोस्ट का नाम मोहम्मद अली जिन्ना के नाम ‘कायदे-आजम’ पर ‘कायद‘ रखा गया।

18 अप्रैल 1987, पाकिस्तान की “कायद” (Quaid) पोस्ट से नीचे भारत की ‘सोनम‘ पोस्ट पर मशीनगन से फायरिंग की गई और इस पोस्ट पर रसद सप्लाई ले जाने वाले हैलीकॉप्टर पर भी फायरिंग की गई। ब्रिगेडियर नौज्ञान ने कर्नल ए पी राय के साथ मीटिंग की और उसमें ये निर्णय लिया गया कि भारत पाकिस्तान की कायदे पोस्ट पर लेफ्टिनेंट राजीव पांडे के नेतृत्व में 10 जवानों की एक निरीक्षण यूनिट भेजेंगे। जैसे ही भारत के जवान सोनम पोस्ट से नीचे उतरकर कायद पोस्ट की तरफ चढ़ाई करते हुए बढ़ने लगे, पाकिस्तान की तरफ से अंधाधुंध फायरिंग होने लगी और हमारे दस जवान शहीद हो गए। इसके बाद भारतीय सेना ये निर्णय लिया कि अब तो पाकिस्तान की कायदे पोस्ट पर अधिकार करना ही होगा और इसी क्रम में बहादुर लेफ्टिनेंट राजीव पांडे के नाम पर ‘ऑपरेशन राजीव‘ शुरु किया गया। राजीव पांडे और उनकी यूनिट के बहादुरी के किस्से पूरे कैम्प में फैल गए, आलम ये था कि लगभग हर सैनिक इस अभियान का हिस्सा बनना चाहता था।

21,153 फीट की सीधी खड़ी ऊंचाई और 120 किमी/घण्टा की तेज हवा की चुनौतियों के बीच कायदे पोस्ट पर पहुंचना बहुत मुश्किल काम था। इस मिशन के लिए 50 जवानों की एक कम्पनी चुनी गई, जिसमें मेजर वीरेंद्र सिंह को कमांडर और कैप्टन अनिल शर्मा को सेकंड इन कमांड बनाया गया। बाद में नायब सूबेदार बाना सिंह के विशेष अनुभव और योग्यता को देखते हुए उनको भी इसका सदस्य बनाया गया। ऑपरेशन के आखिरी चरण का नेतृत्व बाना सिंह करने वाले थे। 90° की सीधी खड़ी ऊंचाई पर होने के कारण पाकिस्तानी सेना आश्वस्त थी कि भारतीय सेना कभी ऊपर चढ़ नहीं पाएगी। भारतीय सेना ने पहले भी दो बार इस पोस्ट को हथियाने की कोशिश की थी लेकिन असफलता ही हाथ लगी थी इसी बात से पाकिस्तानी भी बेखबर हो गये थे। जब भारतीय जवान आगे बढ़ रहे थे तब न भारत की तरफ से फायरिंग हुई न ही पाकिस्तान की तरफ से, इसका कारण था कि दौनों ही तरफ सीमित संख्या में गोला-बारूद थी और अगली खेप को उन तक पहुंचने में करीब 5 घण्टे लगते।

भारतीय सेना की ये यूनिट सीधी चढ़ाई पर चढ़ती है और कायदे पोस्ट पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों पर धावा बोलती हैं। पाकिस्तानी सैनिक चूंकि पहले से ऊंचाई पर मौजूद थे इसलिए उनकी शारिरिक हालत और भी बुरी थी, दौनों सेनाओं के बीच हाथापाई में घायल होने का मतलब था उस अंग को काटकर फेंका जाना क्योंकि इतनी सर्दी में अगर पैर से जूता भी निकल जाए तो पैर काटना पड़ जाता है। भारतीय सेना के हमले में छः पाकिस्तानी सैनिक मारे गए जबकि कुछ सैनिक चोटी से घाटी में कूद कर भाग गए और ढलान पर मौजूद पाकिस्तानी पोस्ट्स को भारत के हमले की सूचना दे दी लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। भारतीय सेना ने अपना आधिपत्य इस पोस्ट पर कर लिया था, नायब सूबेदार बाना सिंह की अद्भुत वीरता को देखते हुए उनके नाम पर ही इस पोस्ट का नाम ‘बाना पोस्ट‘ कर दिया गया। बाद में अद्भुद शौर्य और वीरता के लिए सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सूबेदार बाना सिंह को सम्मानित किया गया। बाना पोस्ट दुनियाँ का सबसे ऊंचा युध्द क्षेत्र मानी जाती है।

नायब सूबेदार बाना सिंह
नायब सूबेदार बाना सिंह

“ऑपरेशन राजीव के दौरान भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी जरूर थे लेकिन ये ऑपरेशन उनके नाम पर नहीं था। मैंने कुछ अल्पज्ञ कांग्रेसियों को ये कहते हुए सुना है कि भारतीय सेना ने ये ऑपरेशन राजीव गांधी के सम्मान में चलाया था जोकि महज एक कोरी कल्पना है।”

ऑपरेशन ‘मेघदूत’ भारतीय सेना के सबसे लंबे चलने वाले अभियानों में सबसे पहले स्थान पर है। इस ऑपरेशन के अंर्तगत ‘ऑपरेशन राजीव’ जैसे कई छोटे छोटे अभियान चलाए गए। आज भी हमारे जवान इतनी ऊंचाई पर दुश्मनों से हमारी रक्षा कर रहे हैं ताकि हम देश में चैन से सो सकें लेकिन जब देश के अंदर से ही ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ की आवाजें सुनाई देती हैं तो सबसे ज्यादा मनोबल हमारे जवानों का ही टूटता है। ये छिपे हुए गद्दार विदेशी चँदो से अपना NGO चलाते हैं तो कभी नागरिकों के टैक्स मनी से चलने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति पर नाममात्र के पढ़ते हैं और इसी देश के खिलाफ प्रोपेगैंडा चलाते हैं। अगर आप इनके सामने ‘भारत माता की जय’ कहेंगे तो ये छद्म बुद्धिजीवी उदारवादी आपको फासिस्ट कहकर आपका ही मनोबल गिराने में कसर नहीं छोड़ेंगे। मित्रों! यदि हमारे देश के जवान हमें बाहरी दुश्मनों से सुरक्षित रखे हैं तो हमारा भी कर्तव्य है कि इन छिपे हुए देशद्रोहियों को वैचारिक और बौद्धिक स्तर पर उचित जबाब देकर देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाएं। जय हिंद ????

मिलिटी इंटलीजेंस सीरीज के पिछले अंक यहाँ पढ़े :

1. भारत की आंख ‘रॉ’ के बारे में आप कितना जानते हैं? जाने कैसे हुआ रॉ का जन्म

2. ऑपरेशन कहूटा: मोरारजी देसाई की वजह से पाकिस्तान के पास आज है परमाणु बम

3. इंदिरा गांधी की कैबिनेट में कौन था सीआईए एजेंट जिसने की देश के साथ गद्दारी?

4. कौन है कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रचने वाला ISI एजेंट सईद गुलाम नबी फाई?

5. ऑपरेशन कैक्टस : जब मालदीव में भारतीय सेना ने तख्तपलट की साजिश कर दी थी नाकाम

6. ऑपरेशन खुकरी : क्या हुआ जब विदेशी जमीन पर आतंकियो से घिर गई भारतीय सैन्य टुकड़ी?

7. ऑपरेशन मेघदूत : जब पाकिस्तान को मात देकर सियाचिन पर भारत ने किया कब्जा