21वीं शताब्दी को एशिया का युग कहा जाता है। एशिया में चीन और भारत दो बड़ी शक्तियां बनकर उभर रहे हैं। चीन और भारत दोनों ही हर स्तर पर प्रतिद्वंद्वी हैं, यही वजह है कि चीन अपने आसपास के देशों को धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। चीन की तरफ से भारत को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, भारत-चीन युद्ध में हम कैलाश मानसरोवर गंवा चुके हैं। लद्दाख क्षेत्र का अक्साई चिन चीन के पास चला गया है वहीं चीन आये दिन अरुणाचल प्रदेश में भी घुसपैठ करता रहता है। डोकलाम विवाद के बाद भारत के लिए चीन की तरफ से खतरा और बढ़ गया है। चलिए पहले एक बार समझ लेते हैं कि भारत को चीन की तरफ से सबसे बड़ा खतरा क्या है?

 

चिकन नेक यानि मुर्गे का गला – सबसे कमजोर भाग। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी यही क्षेत्र है, चीन की कोशिश रहती है कि इस क्षेत्र तक सड़क बना दी जाए ताकि भविष्य में कभी युध्द के हालात बने तो इस क्षेत्र पर कब्जा करके भारत को दो भागों में बांट दिया जाए। सन 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के कार्यकाल के दौरान सरकार ने दूरदर्शी सोच की बानगी पेश कर एक प्लान सोचा था जिसमें भारत म्यांमार से एक समझौता करता और वहां के किसी बन्दरगाह को सड़कमार्ग से भारत के उत्तरपूर्वी राज्य से जोड़ देता और जलमार्ग से कलकत्ता और म्यांमार जोड़ दिए जाते। इस प्रकार भारत के पास सिलीगुड़ी मार्ग का विकल्प भी मिल जाता और भारत करीब 1000 किलोमीटर की बचत भी कर लेता। युध्द के दौरान यदि सड़क मार्ग बंद भी हो जाता तब भी भारत के पास अपने उत्तरपूर्वी राज्यों तक पहुंचने का विकल्प होता। इसके बाद भारत-म्यांमार इस प्रोजेक्ट के एक फ्रेमवर्क पर सन 2008 में हस्ताक्षर करते हैं और ‘कलादान प्रोजेक्ट’ अस्तित्व में आता है। सन 2010 में इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है और हालांकि भारत को 2015 तक इसे समाप्त करना था लेकिन घोटालों के दौर में कमजोर भारतीय अर्थव्यवस्था और अदूरदर्शिता से भरी हुई UPA सरकार फंड न होने का बहाना लेकर इस प्रोजेक्ट से ध्यान हटा लेती है।

UPA सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए महज 400-500 करोड़ का बजट रखा था और वह भी वे देने में असमर्थ रहे। 2015 में NDA सरकार आई तो इस प्रोजेक्ट की महत्ता समझी गई और लगभग UPA सरकार से छः गुना फंड यानि तकरीबन 3000 करोड़ रुपये इसके लिए दिए गए। इरकॉन सर्विस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है और इसे 2019 आखिर तक समाप्त कर दिया जाएगा। इसके अलावा भारत म्यांमार में स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन भी बना रहा है।

क्या है कलादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट ?

भारत का प्लान है, कलकत्ता बन्दरगाह को म्यांमार के सितवे बन्दरगाह से जोड़ना और उसके बाद सितवे बन्दरगाह को पलेटवा से कलादान नदी मार्ग के माध्यम से जोड़ना। उसके बाद भारत अपनी सीमा से लगभग 129 किलोमीटर लम्बा हाइवे कलेतवा होते हुए पलेटवा से जोड़ देता। यानि कलकत्ता से कार्गो पहले सितवे पोर्ट तक आते, फिर कलादान नदी के रास्ते पलेटवा तक और उसके बाद सड़कमार्ग से भारत की सीमा में पहुंच जाते। करीब 539 किलोमीटर का समुद्री मार्ग, 158 किलोमीटर लम्बा नदी मार्ग और 129 किलोमीटर लम्बा हाइवे इस प्रोजेक्ट का हिस्सा है।

इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत सबसे पहले भारत म्यांमार के सितवे पोर्ट की क्षमता को 4000 से 7000 टन तक पहुंचाने के लिए इसका विकास करना था और भारत ने हाल ही में इसे पूरा भी कर लिया है और म्यांमार ने इसका संचालन भी भारत को ही सौंप दिया है। इसके बाद भारत पलेटवा में रिवर पोर्ट बनना है और फिर पलेटवा से मेकवा तक सड़क।

चीन भारत के इस प्रोजेक्ट की महत्वाकांक्षा समझता है इसलिए कम्युनिस्ट चीन ने अपनी चालें चलनी शुरू की। छद्म वामपंथी उदारवादी एक्टिविस्ट पर्यावरण का रोना रोकर इस प्रोजेक्ट का विरोध करने लगे। कलादान नदी को बचाने के लिए म्यांमार में ये लोग ‘कलादान आंदोलन’ भी चला रहे हैं ताकि कैसे भी करके ये प्रोजेक्ट रुक जाए।

UPA सरकार ने अगर इस प्रोजेक्ट पर ध्यान दिया होता और समय से काम खत्म कर दिया होता तो म्यांमार सरकार वो प्रोजेक्ट भी भारत को देती जो उसने चीन को दिए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत मे म्यांमार में महज $2 बिलियन का निवेश किया है जबकि चीन ने $14 बिलियन का, आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि हमने क्या खो दिया है।

पी वी नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान भारत ‘Look East’ की नीति पर काम करना शुरू किया था हालांकि बाद की सरकारें इसको आगे नहीं बढ़ा सकी। UPA सरकार ने इस नीति की सबसे ज्यादा दुर्गति की क्योंकि ये 10 वर्षों की मजबूत सरकार में भी इसे आगे नहीं बढ़ा सके। 2014 में सरकार बदली और मोदी सरकार की कूटनीति रही ‘ACT EAST’ की और यही वजह है कि इस प्रोजेक्ट पर त्वरित काम शुरू हुआ है। BIMSTEC पर जोर देना मौजूदा सरकार की इसी नीति का हिस्सा है। इस लेख के अगले भाग में हम विश्लेषण करेंगे कि इस प्रोजेक्ट का कितना भाग पूरा हुआ है और कितना शेष बचा है और भारत को अब कहाँ ध्यान देने की ज़रूरत है।

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