इस सप्ताह श्री लंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे भारत आ रहे हैं। भारत सरकार श्री लंका में बहुत सारे प्रोजेक्ट्स को फंड कर रही है। अगर आप epostmortem से नए नए जुड़े हैं तो आपको भारत-श्रीलंका सम्बन्धों की पृष्ठभूमि बताना चाहूंगा। श्री लंका के उत्तरी भाग में भारतीय तमिल रहते हैं, जिनको भारत के राज्य तमिलनाडु का खुला समर्थन रहता है वहीं इन्ही लोगो के साथ पहले श्रीलंका में काफी भेदभाव किया गया था। उसके बाद LTTE बनाया गया जिसमें तमिलनाडु से काफी लोग जुड़ गए। धीरे धीरे ये संगठन आतंकी गतिविधियों में लिप्त हो गया, फलस्वरूप श्रीलंका को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मिलनी शुरू हो गई। यही से एक गलती की शुरुआत हुई हमारे प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जी द्वारा, उन्होंने तत्कालीन श्री लंका सरकार को अपना समर्थन दिया था। फलस्वरूप तमिलनाडु राज्य में तमिलों में भारत सरकार की इस नीति के प्रति रोष व्याप्त हो गया और अंत में जो दुखद घटना हुई वो हम सब जानते हैं।

LTTE ने राजीव गांधी जी को मारने की योजना बनाई, तमिल नेताओं ने इसमें सहयोग किया जिसकी वजह से ऐसी घटना को अंजाम दिया गया। आप दक्षिणपंथी हों या वामपंथी, अगर आप देशभक्त हैं तो अपने प्रधानमंत्री की हत्या पर रोष जरूर आएगा लेकिन इसमें आप कांग्रेस पार्टी का कायरता देखिए, राजीव गांधी के हत्यारे जब बरी किये गए तो न तो कांग्रेस पार्टी की तरफ से कोई विरोध आया न ही उनकी पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी जी की तरफ से। खैर यहां हम राजीव गांधी की हत्या पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।

आपको पता ही होगा कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। देश में घोटाले पर घोटाले तो हो ही रहे थे साथ ही साथ कांग्रेस सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मूर्खता की जो बानगी पेश की हैं, आइए जरा एक नजर उस पर डालते हैं। हमारे पड़ोस में पाकिस्तान में चीन से वन वेल्ट वन रोड के तहत प्रोजेक्ट शुरू किया जो पाक अधिकृत कश्मीर से होकर जा रहा था, जिसमें विवादित बलूचिस्तान की जमीन शामिल थी, चीन पाकिस्तान के पोर्ट का इस्तेमाल करके अरब सागर में सामरिक बढ़त बनाने वाला था तब हमारी सरकार आंखे बंद करके सो रही थी। बांग्लादेश के बंदरगाहों से होते हुए चीन का सामान नेपाल जाता है, लेकिन नेपाल पहुंचने से पहले ही भारत में अवैध रूप से सप्लाई हो जाता है। चीन ने बांग्लादेश में एक पोर्ट बना लिया था। मालद्वीप में चीन इन्वेस्ट करना शुरू कर चुका था और वहां के राजनैतिक हालात को बदलना शुरू कर चुका था। श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट को बना लिया था। हम चारों तरफ से अपनी बेवकूफ सरकार की बेवकूफी की वजह से घिर रहे थे। अगर आपने epostmortem पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आर्टिकल पढ़े होंगे तो ये सब जानकारी आपको मिल जाएगी। खैर, अभी बात करते हैं श्री लंका की।

सन 2004 श्री लंका में LTTE के खिलाफ अभियान चल रहा होता है कि ऐसे में ही सुनामी आ जाती हैं। श्री लंका को इससे काफी नुकसान होता है। अगर आप नक्शे में देखेंगे तो पाएंगे हम्बनटोटा श्रीलंका के दक्षिणी भाग में है, ये काफी अविकसित क्षेत्र है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं, यही पर श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री महिंद्रा राजपक्षे का जन्म हुआ था। शायद यही वजह थी कि श्री लंका के तुगलकी राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे इस क्षेत्र को विकसित देखना चाहते थे। चूंकि श्री लंका का अधिकतर व्यापार दूसरे बंदरगाहों खासकर कोलंबो से आराम से हो जाता है, ओवरलोड जैसी कोई स्थिति नहीं थी फिर भी श्री लंकाई राष्ट्रपति ने यहां पर एक पोर्ट बनाने का निर्णय क्यों लिया आइए जरा नजर डालते हैं।

Hambantota port

हम्बनटोटा अविकसित था, महिंद्रा राजपक्षे की जन्मभूमि था। इसलिए श्री लंका सरकार इस जगह को विकसित बनाने के लिए चीन के साथ 2007 में एक समझौता करती है जिसमें चीन के गाउँगजहॉ (Guangzhou) शहर और हम्बनटोटा को ट्विन सिटी जैसा बनाया जाएगा। हालांकि इस प्रकार की योजनाओं का मुख्य उद्देश्य केवल संस्कृति के आदान प्रदान ही होता है, इसलिए विकास कार्य लगभग न के बराबर ही रहा। इसके बाद 2009 में जब श्रीलंकाई सेना ने LTTE को खत्म करने के लिए अभियान चलाया, प्रभाकरण मारा गया जिसमें तमिलों को बेहद बुरी तरह कुचल दिया गया। भारत सरकार यहां तक आंखें बंद करके बैठी थी। इसके बाद आर्थिक रूप से कमजोर श्री लंका हम्बनटोटा को लेकर एक घोषणा करती है कि हमें इस जगह को विकसित करने के लिए लोन चाहिए। इसमें न तो IMF ने कोई रुचि दिखाई, न ही विश्व बैंक ने; कारण ये था पूरी जांच-पड़ताल के बाद इन दोनों संस्थानों ने पाया कि इधर निवेश करना मूर्खता होगी क्योंकि उधर से किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं हो सकता। भारत में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी, ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इन्हें घोटालों से ही फुर्सत नहीं थी देश के आसपास क्या चल रहा है उस पर ध्यान कौन देता। अब चूंकि चीन किसी भी प्रकार से भारत को घेरना चाहता था इसलिए उसने श्री लंका $307 मिलियन लोन एक्सिम बैंक से दिलवाया। उसके बाद ये तय किया गया कि चीन हंबनटोटा में एक बंदरगाह का निर्माण करेगा और उसके पास में ही एक मट्टाला हवाई अड्डा बनाया जाएगा। आपकी जानकारी के लिए इधर बता दूं मट्टाला नाम महिंद्रा राजपक्षे के नाम पर ही रखा गया था। इससे आपको अंदाजा हो गया होगा कि IMF और वर्ल्ड बैंक की तरह चीन ने भी अपने पैसों को निवेश करने से होने वाले नुकसान का अंदाजा लगा लिया होगा लेकिन फिर भी जानबूझकर निवेश किया ताकि भारत को घेरा जा सके। उसके बाद ये होता है कि हम्बनटोटा पोर्ट पूरी तरह से नुकसान में चला जाता है, दो साल में बमुश्किल एक दो जहाजों ने उधर डैक किया। वहीं मट्टाला एयरपोर्ट दुनियाँ के सबसे वीरान एयरपोर्ट्स में से एक है। दोनों के दोनों प्रोजेक्ट अपनी लागत का एक प्रतिशत भी वसूल नहीं कर पाए। इसके बाद उस नुकसान को कम करने के लिए श्रीलंकाई सरकार 99 सालों के लिए हम्बनटोटा पोर्ट को चीन को दे देती है। चीन भारत को चारों तरफ से घेरना चाहता है उसके इस नीति को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल कहते हैं, अगर आप संलग्न चित्र पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि उसने लगभग हमें घेर ही रखा है और तत्कालीन कांग्रेस शासित भारत सरकार की उदासीनता की पराकाष्ठा की इससे बड़ी बानगी नहीं हो सकती।

string of pearls map
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String of Pearls (Indian Ocean)

2014 के बाद से भारत-श्रीलंकाई रिश्ते : 2014 में नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं और भारत की कूटनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। अजीत डोभाल भारत के सुरक्षा सलाहकार के रूप में अपनी दमदार भूमिका कैसे निभाते हैं, इस पर चर्चा करते हैं। सन 2015, श्रीलंका में नई सरकार चुनने के लिए चुनाव होने वाले थे। चीन ये बात बहुत अच्छे से जानता था कि अगर महिंद्रा राजपक्षे फिर से राष्ट्रपति बनते हैं तो उसको फायदा होगा इसलिए चुनावों में चीन राजपक्षे के लिए कैम्पेन करना शुरू करता है। इधर भारत सरकार अब सकते में आती है और इस बात का फायदा उठाया जाता है कि LTTE के आंदोलनों में तमिलों को जिस बेरहमी से मारा गया, बेगुनाहों की हत्या हुई उसके लिए राजपक्षे ही जिम्मेदार हैं इसलिए राजपक्षे के विरोध में जाफ़ना से लेकर उत्तर श्रीलंका के तमिलों को विपक्षी पार्टियों के समर्थन में मना लिया जाता है। भारत यहां पर पर्दे के पीछे से विपक्ष को सपोर्ट करता है और आखिरकार जीत भी विपक्षी पार्टियों के गठबंधन की होती है और इंद्रधनुष सरकार बनाई जाती है। राष्ट्रपति बनते हैं सिरिसेना, जिनकी भारत का प्रबल पक्षधर समझा जाता था। अब मैं आपको बताता हूँ, कांग्रेस सरकार की बेवकूफी की वजह से हमें कितना बड़ा नुकसान हुआ।

भारत सरकार श्री लंका को ये मनाने में सफल हो जाती है कि हम श्रीलंका में निवेश करेंगे। LTTE अभियानों में बेघर हुए तमिलों के लिए घर बनवाएंगे और खासकर मट्टाला एयरपोर्ट में निवेश करेंगे। आपको याद ही होगा हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी श्री लंका यात्रा के दौरान इसी वर्ष तमिलों के लिए भारत सरकार द्वारा बनवाये गए घरों का उद्घाटन किया है। अब आपके दिमाग में ये सवाल आ रहा होगा कि जब मट्टाला हवाई अड्डा नुकसानदेह है तो फिर भारत क्यों निवेश कर रहा है। इसका जबाब ये है कि जब हम्बनटोटा में चीन 99 वर्ष तक रहेगा तो ये प्रबल संभावना है कि वो आपना नौसेना बेस भी बना सकता है और श्रीलंकाई सरकार ये दबाब में मान भी सकती है। इसके लिए भारत एक कूटनीतिक चाल चलता है, भारत श्री लंका को ये मनाने में सफल हो जाता है कि श्रीलंकाई नेवी अपना बेस हम्बनटोटा में बना ले और भारत को मट्टाला हवाई अड्डा विकसित करने के लिए दे दे इसके बदले में भारत सरकार हवाई अड्डे में चीन द्वारा निवेश का 75% तक धन श्रीलंका को देगा ताकि वो अपना कर्ज चुका सके। यानि कि सामरिक तौर पर भारत ने हम्बनटोटा पर नजर भी रखने की जुगाड़ कर ली है और साथ ही साथ हम्बनटोटा पोर्ट पर श्रीलंकाई नेवी का बेस भी बनवा दिया है। अब चीन हम्बनटोटा का इस्तेमाल केवल व्यापरिक तौर पर कर सकता है और अविकसित क्षेत्र होनी की वजह से उधर से व्यापार न के बराबर हो सकता है।

हालांकि श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने पूर्व में हुई गलतियों को सुधार तो लिया लेकिन इसके लिए हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और इसकी जिम्मेदार केवल और केवल भारत में तत्कालीन कांग्रेस सरकार का अंधा होना है।

भारत इसके अलावा श्री लंका में जाफ़ना पल्ली एयरपोर्ट, त्रिकोलामी में आयल फार्म, कोलंबो एयरपोर्ट का पूर्वी टर्मिनल, उत्तरी कोलंबो में LNG प्लांट पर काम कर रहा है। ये सारे प्रोजेक्ट्स श्रीलंकाई आंतरिक राजनीति के चलते लगभग रुके से पड़े है। इसी वजह से लगभग एक महीने पहले हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी और श्रीलंकाई विपक्ष के नेता पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे में मुलाकात हुई थी और इस सप्ताह उनके प्रधानमंत्री नई दिल्ली आ रहे हैं। उम्मीद है कि सारे रुके हुए प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू किया जाएगा और भारत सामरिक तौर पर नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चीन पर सामरिक बढ़ता बढाना जारी रखेगा। जय हिंद!!