जैसा कि हम सबको पता है चीन पाकिस्तान में वन बेल्ट वन रॉड के तहत CPEC प्रोजेक्ट चला रहा है और इसी क्रम में चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का निर्माण भी कर रहा है। चीन ने विकास के नाम पर दुनियाँ के काफी सारे देशों में निवेश कर रखा है, उसके बाद वे देश चीन के कर्ज को चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं। इसका फायदा चीन को मिलता है और उस देश में चीन किसी बन्दरगाह के विकास का प्रोजेक्ट चलाने का प्रस्ताव देता है, कर्ज में दबे हुए उस देश को चीन की बात माननी ही पड़ती है और चीन इस देश में बन्दरगाह के साथ साथ अपनी वॉरशिप को भी लाने लगता है। हिन्द महासागर क्षेत्र में खासकर चीन की इस नीति को ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल‘ के नाम से जाना जाता है। भारत को घेरने के लिए चीन ने म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव, पाकिस्तान और मॉरीशस जैसे देशों में निवेश कर रखा है। पाकिस्तान का ग्वादर, श्रीलंका का हम्बनटोटा और बंगलादेश का चिट्टागोंग इसी का हिस्सा रहे हैं। बंगलादेश के चिट्टागोंग बन्दरगाह पर भारत ने कूटनीति से अपना प्रभुत्व वापस प्राप्त कर लिया है। श्रीलंका में हम्बनटोटा प्रोजेक्ट असफ़ल हो चुका है, भारत ने चीन का कर्ज चुकाने के लिए श्रीलंका को कर्ज दिया है और हम्बनटोटा के पास माटाला एयरपोर्ट का निर्माण भारत कर रहा है ताकि हम्बनटोटा में चीन की गतिबिधियों पर नजर रखी जा सके। मालदीव में सरकार बदलने के साथ साथ भारत से सम्बन्ध फिर से सुधर रहे हैं जनवरी 2019 में मालदीव ने भारत के पक्ष में बयान दिया है। भारत ने $1.4 बिलियन की सहायता राशि मालदीव को दिसम्बर 2018 में देने की इसलिए घोषणा की थी ताकि मालदीव चीन का कर्ज चुका सके और भविष्य के प्रोजेक्ट भारत के साथ शुरू कर सके। ये सारे बदलाव 2014 में भारत की सरकार बदलने के बाद से देखने को मिल रहे हैं।

चीन की पाकिस्तान के ग्वादर में चल रही गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत ने ईरान के साथ एक समझौता किया था जिसके अंतर्गत भारत ईरान के चाबहार बन्दरगाह का निर्माण करेगा। सामरिक दृष्टि से ये बन्दरगाह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि ये पाकिस्तान के ग्वादर से महज 72 किलोमीटर दूर है। ग्वादर पाकिस्तान ने चीन को 40 वर्षों की लीज पर दे रखा है इसलिए भारत के लिए चाबहार बहुत महत्वपूर्ण जो जाता है क्योंकि अरब तेल क्षेत्रों से तेल के जहाज इसी क्षेत्र के होकर गुजरते हैं। भारत से चीन के युद्ध समय, यदि ग्वादर पर चीन के नियंत्रण रहा तो वो भारत की तेल सप्लाई को बंद कर सकता था इसलिए भारत ने ईरान के चाबहार में निवेश करने का निर्णय लिया। यही वजह है भारत ने ईरान से तेल खरीदना तब भी बंद नहीं किया जब अमेरिकी प्रतिबंधों के सबसे ज्यादा सम्भावनाएं चल रही हैं।

इसके अलावा चाबहार पोर्ट के जरिये भारत अपना व्यापार मध्य एशिया के सेंट्रल एशियन रिपब्लिकन देशों तक बढाना चाहता है। हाल में ये मात्र $1.5 बिलियन है जो भारत के कुल व्यापार का 0.11% है। जब चाबहार को मल्टीमॉडल इंटरनेशनल नार्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से जुड़ जाएगा तो ये यूरेशिया तक भारत व्यापार बढा लेगा और इसकी सम्भावना $170 बिलियन तक पहुंचने की है जिसमें से $60.6 बिलियन निर्यात और $107.4 बिलियन आयात रहेगा।

आइये एक नजर डालते हैं कि शहीद बेहस्ति पोर्ट, चाबहार पर निर्माण कार्य कहाँ तक पहुंचा :
1. भारत को ये बन्दरगाह पांच फेज में पूरा करना था जिसमें इसकी क्षमता 82 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष तक करना है।
2. प्रथम 18 महीने के लिए इसके ऑपेरशन का जिम्मा भारत की कम्पनी इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड को दिया गया है। इसके बाद इसके काम को देखते हुए इसे 10 वर्ष की लीज तक भी किया जा सकता है।
3. भारत ने $85.21 मिलियन की लागत और $22.95 बिलियन का सालाना खर्च इसके पहले फेज पर खर्च किये हैं। इसमें चाबहार से जाहेडन तक रेलवे लाइन ईरान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा तक बनाई जाएगी।
4. भारत की निजी और सरकारी पेट्रोकेमिकल एवं फर्टीलाइजर कम्पनी $20 बिलियन चाबहार के फ्री ट्रेड ज़ोन में निवेश करने की योजना बना रही हैं।
5. चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल करके ईरान UAE पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम कर लेगा।
6. अफ़ग़ानिस्तान चारों तरफ से भूमि से  घिरा देश है इसलिए इसकी व्यापारिक निर्भरता दूसरी देशो पर रहती है। चूंकि ईरान और अफगानिस्तान दोनों देश के भारत के मित्र देश हैं इसलिए चाबहार अफ़ग़ानिस्तान के लिए भी फायदेमंद है।

समस्याएं क्या-क्या हैं?
1. ईरान पर प्रतिबंध : चूंकि ईरान पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने प्रतिबंध लगा रखे हैं ऐसे में यदि भारत ईरान से तेल खरीदना जारी रखता है तो ये प्रतिबंध भारत के ऊपर भी आ सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो इस प्रोजेक्ट में लगा भारत का पैसा फंस सकता है या फिर प्रोजेक्ट पूरा होने में और समय लग सकता है।
2. चीनी दखल : चूंकि ईरान को रूस का खुला समर्थन है एवं रूस-चीन के सम्बंध बेहद अच्छे हैं। ईरान-रूस और चीन तीनों पर ही अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैं इसलिए यदि चीन भी ईरान में निवेश कर सकता है इसकी संभावना बनती है।
3. ईरान के निजी हित : ईरान ने कई बार इशारों में ये बात कही है कि वह और भी देशों को ईरान में निवेश के लिए आमंत्रित करना चाहता है। इसलिए यदि चाबहार पर चीनी निवेश हुआ तो ये भारत के लिए खतरे की घण्टी हो सकती है।
4. प्रोजेक्ट पूरा करने में देरी : भारत की कम्पनियां तय समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने में असमर्थ रहती हैं। ईरान का चाबहार और म्यांमार का कलादान प्रोजेक्ट इस बात का उदाहरण है, जब ये देश भारत के अलावा दूसरे देशों की ओर रुख करने की सोचते हैं। इसलिए भारत सरकार को इस बार पर विशेष गौर करना चाहिए।

देखते हैं वर्ष 2019 में भारत-ईरान सम्बन्ध कहाँ तक जाते हैं और भारत क्या नई कूटनीतिक योजनाएं बनाता है।