जैसा कि हमारे पिछले लेख ‘कलादान प्रोजेक्ट’ में हमने इसके सामरिक और आर्थिक महत्व के बारे में बताया था। कलादान प्रोजेक्ट के अंतर्गत ही हाल ही में म्यांमार का सितवे का निर्माण कार्य समाप्त हुआ है और ये अब कार्य के लिए एकदम तैयार है।

सितवे पोर्ट के निर्माण और सितवे-पलेटवा पर वॉटर टर्मिनल बनाने के लिए करीब 517 करोड़ रुपये भारत से आबंटित किये गए थे। पलेटवा से मिज़ोरम को सड़कमार्ग से जोड़ने के लिए 1600 करोड़ रुपये भारत से आबंटित हुए हैं। सितवे बन्दरगाह का ऑपरेशन अभी भारतीय कम्पनियों के सुपुर्द है जिसको इनके काम को देखते हुए बढ़ाया भी जा सकता है।

2017-18 वित्त वर्ष के दौरान भारत का ASEAN देशो के साथ व्यापार $81.33 बिलियन था जोकि भारत के कुल व्यापार का लगभग 10.57% है। इसमें से निर्यात $34.20 बिलियन और आयात $47.13 बिलियन था। जबकि चीन का 2017 में ASEAN देशों को निर्यात $279.1 बिलियन और आयात $235.7 बिलियन था। यदि ये कलादान प्रोजेक्ट पूरी तरह बनकर काम करने लगता है तो भारत की व्यापारिक पहुंच दक्षिणी एशिया के बाकी देशों तक हो जाएगी और व्यापार में काफी उछाल देखने को भी मिल सकता है।

इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में बहुत अड़चनें है :
1. वामपंथी कथित उदारवादी हर देश की समस्या बनते जा रहे हैं जिन्हें हर विकासकार्य को बाधित करने का बहाना भर चाहिए होता है। ऐसे ही कलादान प्रोजेक्ट को बाधित करने के पीछे इन उदारवादी लोगों का तर्क है कि जब कलादान नदी में ट्रांसपोर्ट शुरू हो जाएगा तो यहां के पर्यावरण पर बहुत फर्क पड़ेगा जबकि इस बात का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है। इन लोगों को उन देशों से पैसा भी मिल रहा हो सकता है जो भारत-म्यांमार के इन प्रोजेक्ट के खिलाफ हैं।
2. कलादान क्षेत्र में रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं और इसका एक मिलिटेंट ग्रुप है : Arakan Rohingya Salvation Army (ARSA ) और ये ग्रुप इस प्रोजेक्ट के लिए बहुत खतरा है। ये निर्माण कार्य से लेकर ऑपेरशन तक आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। पाकिस्तानी लशगर द्वारा बनवाये गए इस आतंकी समूह के सम्बंध इंडियन मुजाहिदीन, बंगलादेश के मुजाहिद्दीन और जमातुल ए तैयबा से भी हैं इसलिए ये भारत के लिए और खतरा सिद्ध हो सकता है।

जिन लोगों को कलादान प्रोजेक्ट के बारे में नहीं पता वो हमारे पूर्वप्रकाशित विस्तृत लेख को एक बार अवश्य पढ़ें। ये प्रोजेक्ट कलकत्ता से मिजोरम जाने के लिए करीब 1000 किलोमीटर की यात्रा और सामान पहुंचने में लगने वाले दिनों में से 34 दिन कम कर देगा। भारत की योजना है कि इस प्रोजेक्ट का विस्तार करके म्यांमार को थाईलैंड से जोड़कर भारत के व्यापारिक रास्तो को बढाया जाए। देखते हैं निकट भविष्य में भारत इसमें कितना सफल होगा।