“No country is facing the kind of grave threat that India is confronted with. Our neighbours are not sitting idle. China is modernising its air force significantly. Intentions of our adversaries can change overnight. We need to match force level of our adversaries,”

ये बयान इस सप्ताह हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भारतीय वायु सेनाध्यक्ष धनोआ ने दिया था इसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार है -“कोई भी देश भारत की तरह खतरे का सामना नहीं कर रहा है। हमारे पड़ोसी हाथ पर हाथ धरे खाली नहीं बैठेंगे। चीन अपनी अपनी वायुसेना को आधुनिक बना रहा है। हमारे दुश्मनों की नीयत रातोंरात बदल सकती है। हमें जरूरत है कि हम अपने प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए पर्याप्त ताकत जुटाकर रखें।”और ये महज एक आशंका नहीं है। भारत पाकिस्तान और चीन से ऐसे खतरे का सामना कर रहा है ये दो देश अगर एक साथ भारत पर दोनो तरफ से हमला करते हैं तो भारत काफी कमजोर हो सकता है। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूंगा कि पाकिस्तान के पास अभी अपग्रेडेड F-16 लड़ाकू विमान तो हैं ही साथ साथ चीन ने उसे J-17 और दे दिए हैं। चीन की सामरिक क्षमता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि चीन के पास 1700 लड़ाकू विमान हैं जिनमें से लगभग 800 चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान है। वही अगर भारत की बात की जाए तो हमारे पास 242 सुखोई, 69 MIG-29(बाज), 120 MIG-21, 85 MIG-27(बहादुर), 123 तेजस, 139 जगुआर (शमशेर) और करीब 60 डेसाल्ट मिराज 2000 हैं। ये सभी के सभी पुरानी तकनीकी पर ही आधारित हैं। हालांकि इनको समय समय पर अपग्रेड किया जाता रहा है। फिर भी अगर चीन से तुलना की जाए तो हम बेहद कमजोर से नजर आते हैं।

हमारी वायुसेना की क्षमता पिछले 10 साल की कांग्रेस सरकार के दौरान प्रभावित हुई है।

इसी क्षमता को बढ़ाने के लिए राफेल डील की गई है।जिससे कि वायुसेना को जल्द से जल्द नए विमानों की खेप मिल सके। आपको शायद याद होगा कि चीन ने रूस से S-400 की 6 बैटरी खरीदी हैं और इसी खरीद की वजह से चीनी मिलिट्री अमेरिका के प्रतिबन्धों का सामना कर रही है। पिछले साल डोकलाम विवाद के बाद भारत ने अपनी ब्रम्होस मिसाइल को उत्तरपूर्व राज्य अरूणाचल में तैनात कर दिया था। जिसकी काट में चीन ने S-400 रक्षा प्रणाली के रूप में निकाली है। इसके अलावा चीन अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल भी टेस्ट कर चुका है। इस लिहाज से भारत को अपनी रक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने का बहुत बड़ा दबाब था। इसका एक ही समाधान था भारत भी S-400 रक्षा प्रणाली से अपने रक्षा तंत्र को मजबूत कर ले।

वैसे बात करें S-400 रक्षा प्रणाली की तो लगभग आज के दौर में हर कोई देश इसे लेना चाहता है। चीन ने इसकी 6 बैटरी रूस से खरीदी हैं, इसके अलावा भारत, तुर्की, सऊदी अरब, कतर भी इसको लेना चाहते हैं। वैसे तो अमेरिका और इजरायल का मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी अच्छा है लेकिन उन दोनों में ही ज्यादा दूरी की मिसाइल लगी हुई हैं जबकि S-400 में तीन टाइप की मिसाइल हैं, पहली है 400 किलोमीटर से अधिक दूरी की, दूसरी 200-250 किलोमीटर तक की दूरी की और तीसरी और भी कम दूरी की। रूस ने पहली दोनो टाइप के सफल परीक्षण किए हैं। इसी वजह से ये रक्षा प्रणाली कम दूरी से भी दागी गई मिसाइलों को भांपकर उनको नष्ट कर सकती हैं। यही खूबी इसको अमेरिका और इजरायल के मिसाइल डिफेंस सिस्टम से अच्छा बनाती हैं। अब अमेरिका NATO देशों का सदस्य है और चूंकि उसके पास भी दूसरे देशों को बेचने लायक मिसाइल डिफेंस सिस्टम है तो वो नहीं चाहता कि कोई देश इस प्रणाली को रूस से खरीदे। यही वजह है कि भारत को रूस से खरीद पर चेतावनी देते हुए अमेरिका ने S-400 तकनीकी का विशेष रूप से जिक्र किया है। वैसे देखा जाए तो S-400 प्रणाली रूस की S-300 प्रणाली का अपग्रेड वर्जन है। ये तकनीकी किसी भी बैलेस्टिक या क्रूस मिसाइल, मानवरहित ड्रोन, एयरक्राफ्ट को हवा में ही नष्ट कर सकती है। भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये सिस्टम पाकिस्तान के F-16 और अमेरिका के F-35 विमानों को भी हवा में ही भांपकर नष्ट कर सकता है। इसके अलावा रूसी निर्माता कंपनी ने ये भी दावा किया था कि अगर इसकी पर्याप्त बैटरी इंस्टॉल की जाएं तो ये स्टील्थ एयरक्राफ्ट को भी हवा में नष्ट करने की क्षमता रखती हैं। यही वजह है अमेरिका को आशंका है कि अगर भारत को ये डिफेंस सिस्टम मिल जाता है तो उसे अमेरिकी विमानों की कमज़ोरियों का पता चल जाएगा और वो ये जानकारी रूस जैसे देशों को दे सकता है जो अमेरिका के खिलाफ हैं। इस मिसाइल सिस्टम में बस एक ही खामी है और वो ये है कि ये अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल को निरस्त्र नहीं कर सकता।

अब अगर बात करें S-400 truimf a mobile की तो इसे रूस की अलमज़ अंते कम्पनी ने बनाया है। ये एक MLR SAM यानि मॉडर्न लोंग रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल (लंबी दूरी की जमीन से हवा में मार करने वाली आधुनिक मिसाइल) है। NATO देश इसे SA-21 growler के नाम से बुलाते हैं जबकि इसका असली नाम S-400 ही है। भारत और रूस आज लगभग $10 बिलियन की डील पर हस्ताक्षर करेंगे जिसमें लगभग $5 बिलियन (₹40,000) में S-400 की पांच बैटरी खरीदी जा रही हैं। इसके अलावा 4 स्टील्थ फ्रिगेट और रूस द्वारा भारत में AK-103 असाल्ट राइफल का निर्माण की डील भी शामिल है। हमारे ये डील करने के 24 महीने बाद हमें S-400 रक्षा प्रणाली मिलेगी; ऐसा हमारे वायु सेनाध्यक्ष श्री धनुआ ने बताया है। जहां तक मेरा अंदाजा है, इसकी पहली बैटरी राजनैतिक राजधानी नई दिल्ली में तैनात की जाएगी, दूसरी भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई में, तीसरी चीन सीमा पर उत्तर पूर्व राज्यों में, चौथी पंजाब -राजस्थान बॉर्डर पर कहीं पर तैनात होगी। ऐसा करने से हम लगभग पाकिस्तान की तरफ से किसी भी हवाई हमले को निरस्त्र कर पाएंगें। भारत द्वारा खरीदे जा रहे एस-400 की अहमियत का अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है। सीरिया युद्ध के दौरान तुर्की के लड़ाकू विमानों ने हमला बोल रखा था। वे खुलेआम सीरियाई हवाई क्षेत्र में घुसपैठ कर रहे थे। इन विमानों ने वहां तैनात रूस के फाइटर जेट एसयू-24 को भी मार गिराया था। रूस द्वारा कई बार चेताने का बाद भी नहीं माने। आखिरकार रूस ने सीरिया बॉर्डर पर एस-400 को तैनात कर दिया। इसके तुरंत बाद नाटो समर्थित तुर्की के एफ-16 लड़ाकू विमान सीरिया की हवाई सीमा से कई मील दूर चले गए थे।

अमेरिका में ट्रम्प सरकार ने CAATSA(Countering America’s Adversaries through Sactions Act) एक्ट पास किया है जिसके तहत अगर कोई देश उत्तर कोरिया, रूस और ईरान से किसी भी प्रकार के व्यापरिक सम्बन्ध रखता है तो वो देश उस डील में अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कर पायेगा और उस देश पर खुद-ब-खुद अमेरिकी प्रतिबंध इस कानून के मुताबिक लग जाएंगे। इसी कानून को देखते हुए भारत-रूस डील से पहले अमेरिका की तरफ से अधिकारिक ये बयान आया -“We urge all of our allies and partners to forgo transactions with Russia that would trigger sanctions under CAATSA. The Administration has indicated that a focus area for the implementation of CAATSA Section 231 is new or qualitative upgrades in capability – including the S-400 air and missile defense system,” the official said.

अर्थात -हम अपने सहयोगियों से ये गुजारिश करते हैं कि वे रूस के साथ ऐसे कोई व्यापारिक लेनदेन न करें जिससे कि वे CAATSA कानून के दायरे में आ जाएं। इसी के साथ एडमिनिस्ट्रेशन के तरफ से इस कानून के 231 सेक्शन के अंतर्गत फोकस एरिया S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम तक भी बढ़ा दिया गया है। बहरहाल इस बयान से अमेरिका का सीधा इशारा भारत-रूस डील की तरफ था और इशारों इशारों में भारत को चेतावनी दी गई थी। इसके बाद भी भारत अमेरिका की तरफ से प्रतिबन्धों में छूट की आशा कर रहा था लेकिन उस पर भी अमेरिका की तरफ से आधिकारिक दूसरा बयान आया -It is a public law [CAATSA]. What triggers sanctions is the transfer of funding and not when the deal is signed. India is optimistic of a waiver and they can be optimistic once, but it cannot be a free ticket,” a U.S. diplomatic source said

अर्थात -ये एक पब्लिक कानून है जो तब प्रतिबन्धों निर्धारित नहीं करता जब ऐसे लेन देन करने के लिए केवल डील पर ही हस्ताक्षर किए गए हों। भारत इसमें छूट के किये आशान्वित है और वो इसे केवल एक बार कर सकते हैं लेकिन ये फ्री टिकट नहीं हो सकता।इसके बाद ये तय हो गया कि अगर भारत ये डील करेगा तो प्रतिबन्धों का सामना जरूर करना पड़ेगा लेकिन ये प्रतिबंध हाल में नहीं लगाए जाएंगे; इस पूरी प्रक्रिया में एक-दो साल भी लग सकते हैं।चूंकि चीन ने भी रूस से S-400 की 6 बैटरी और Su-35 फाइटर जेट लिए हैं। जिसकी वजह से अमेरिका ने चीनी मिलिट्री पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। अगर भारत रूस से साथ कोई व्यापारिक डील करता है तो ऐसा ही करने की धमकी अमेरिका ने हमें भी दी है। बहरहाल आपके दिमाग में ये आ रहा होगा कि हम तो अपनी जरूरतों के मुताबिक ये डील करेंगे ही तो क्या अमेरिका हमारे ऊपर भी ऐसे प्रतिबंध लगा सकता है। इसका उत्तर है, हां! लेकिन ऐसे प्रतिबंध एकाएक नहीं लगते, इसमें समय लगता है। उदाहरण के तौर पर चीन-रूस डील काफी पहले हुई थी और लगभग दो साल बाद चीन पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसलिए इस बात की बहुत ज्यादा संभावना है कि डोनाल्ड ट्रम्प अपने कार्यकाल के दौरान ये शायद ही करेंगे या करें भी तो शायद दौनों देशों में तब तक सरकारें बदल जाएं। अब बात करते है क्या भारत सरकार ने अमेरिकी प्रतिबन्धों से बचने के लिए कोई कदम उठाए हैं, इसका जबाब है – हाँ! भारत-रूस डील होने से लगभग एक महीने पहले ही भारत ने अमेरिका के साथ 2+2 बार्ता की थी और COMCASA (communication compatibility and security agreement) जैसे समझौते पर हस्ताक्षर भी किये हैं। भारत अमेरिका से भी बहुत सारे रक्षा उपकरण खरीदने वाला है तो इसका सीधा सा मतलब है कि अगर अमेरिका CAATSA(Countering America’s Adversaries through Sactions Act) के तहत भारत पर अनुचित प्रतिबंध लगाता भी है तो जो डील भारत अमेरिका के साथ करने वाला था वो सब की सब बदल करती हैं यानि अमेरिकी कम्पनियों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ सकती है। चूंकि ये प्रतिबंध रूस-उत्तर कोरिया और ईरान से व्यापार करने पर लगते हैं तो प्रतिबन्धों के बाद भारत का व्यापार ईरान और रूस के साथ और बढ़ ही जायेगा।इतना सब पढ़कर आपको अंदाजा लग गया होगा कि भारत सरकार की प्राथमिकता इस समय अपनी रक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना है और इसके लिए हम अमेरिकी प्रतिबन्धों का भी सामना करने को तैयार हैं। हालांकि भारत सरकार ने इससे बचने के लिए पहले से ही हरसंभव प्रयास कर रखा है और यदि भारत-रूस डील के बाद भी भारत पर अमेरिका किसी भी प्रकार के कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है तो इसे भारत की कूटनीतिक जीत कहा जायेगा।