हाल ही में भूटान में नई सरकार बनी हैं। अब हमें देखना ये है कि नई सरकार भारत के साथ कितने अच्छे सम्बन्ध रखना चाहती है।

आइए एक नजर डालते हैं भूटान की भौगोलिक स्थिति पर

भूटान का नक्शा

जैसा कि आप नक्शे में देख सकते हैं कि भूटान चारों तरफ से जमीन से घिरा एक देश हैं जिसके उत्तरी भाग में चीन शासित तिब्बत का भाग है और नीचे से भारत। चूंकि ऊपरी सीमा हिमालय की वजह से दुर्गम हो जाती है इसलिए भूटान विदेशी व्यापार के संदर्भ में काफी हद तक भारत पर निर्भर करता है। अगर भूटान की राजनैतिक स्थिति के बात की जाए तो भूटान में एक संवैधानिक राजशाही है यानि कि भूटान में राजा तो होगा लेकिन उसकी शक्तियों को संविधान से सीमित कर दिया जायेगा। इस वक्त भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामगेल वांगचुक हैं। भूटान में इन्हें ‘ड्रैगन किंग’ भी पुकारा जाता है। श्री वांगचुक भूटान के पांचवे नरेश(राजा) हैं।

आपकी जानकारी के लिए मैं इधर बताना चाहूंगा कि भूटान नरेश ने ‘Gross National Happiness’ यानि सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता का सिद्धांत दुनियाँ को दिया है और इसी वजह से मैं व्यक्तिगत तौर पर उनका मुरीद हूँ। उनकी इसी सिद्धांत पर ही दुनियाँ में विभिन्न देशों ने लोगों की खुशहाली पर काम करना शुरू किया है। आपमें से बहुत कम लोग जानते होंगे जब श्री नरेन्द्र मोदी भारत ने नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने श्री वांगचुक के सिद्धांत पर काम करते हुए ही जन धन खाते खुलवाए थे। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने सर्वप्रथम भारत में खुशहाली के लिए अलग मंत्रालय भी बनाया था। यहां मैं ये सब इसलिए बता रहा हूँ, कि भूटान नरेश को इतना बड़ा पद केवल इसलिए नहीं मिला कि वो पूर्ववर्ती नरेश की संतान थे बल्कि उन्होंने इसके काबिल बनने के लिए योग्यता भी अर्जित की। वे चाहते तो बिना मेहनत किये हुए ही नरेश बन सकते थे जैसा कि हमारे देश में कांग्रेस अध्यक्ष चाहते हैं।

भूटान SAARC, BIMSTEC आदि का सदस्य है। अगर बात करें भूटान के पार्लियामेंट की तो भूटान के पार्लियामेंट को ची शोग कहा जाता है। इसके उच्च सदन को नेशनल कॉउंसिल और निचले सदन को नेशनल असेम्बली कहा जाता है। दौनों के सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। नेशनल कॉउंसिल में 25 सदस्य होते हैं इसमें से 20 तो चुनाव के माध्यम से चुनकर आते हैं जबकि 5 को नरेश मनोनीत करते हैं। वही निचले सदन में 47 सदस्य होते हैं।

भूटान में मुख्य तीन पार्टी हैं। पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का ही शासन तोबगे के नेतृत्व में अब तक भूटान में चल रहा था। अगर इस पार्टी की बात करें तो इसे भारत की ओर झुकाव रखने वाली पार्टी कहा जाता है। लेकिन इस चुनाव में इस पार्टी की बुरी तरफ हार हुई। इसके बाद दूसरी पार्टी है DPT जोकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के अलावा भी दूसरे देशों पर निर्भरता चाहते हैं यानि कि परोक्ष रूप से चीन के साथ भी सम्बन्धों को बढ़ाना चाहते थे। भारत के लिए खुशखबरी ये रही कि ये पार्टी भी हार गई। अब भूटान में सेंटर-लेफ्ट विचारधारा की पार्टी DNT की जीत होती है और 47 में से 30 सीटें जीतकर ये अपनी सरकार बनती है। इस पार्टी ने अपने चुनावी वायदों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का जिक्र नहीं किया तो भारत के लिए कोई बुरी खबर नहीं है फिलहाल। अभी भूटान के नए प्रधानमंत्री श्री लोटे शेरिंग हैं जोकि DNT पार्टी के अध्यक्ष भी है।

79 दिनों के डोकलाम गतिरोध के बाद भारत और चीन दौनों के लिए भूटान बेहद अहम हो गया था। उस समय भूटान सरकार भारत की प्रबल पक्षधर थी। इसलिए भारत ये चाहता था कि नेपाल की तरह भूटान में चीन समर्थित सरकार न बन जाये। फिलहाल नवनिर्वाचित भूटान के प्रधानमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ये कहा है कि उनकी सरकार पहले से चली आ रही विदेशनीति को नहीं बदलेगी और भूटान नरेश ही विदेशनीति की दिशा तय करेंगे। भारत के लिए ये बेहद खुशी की बात है। लेकिन आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दूँ कि 50 के दशक में भारत-भूटान के समझौते के अनुसार भारत ही भूटान की विदेशनीति तय करता था वो 2007 में बदला जा चुका है। कांग्रेस शासित भारत सरकार की मूर्खता थी कि भूटान जैसे देश ने तक विश्वास करना छोड़ दिया था।

खैर, अब बात करते हैं कि अगर भारत चाहता है कि भूटान भारत के सम्बंध मधुर बने रहें तो जो हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट भारत भूटान को लोन देकर बना रहा है, उसमें तेजी लाये। दरअसल भूटान ने भारत को अपनी जगह दी थी जिसमें कि भारत हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट इंस्टाल कर सके, बिजली भूटान को तो मिलती ही साथ ही साथ भारत भी भूटान से बिजली खरीदता और इसी से भारत का लोन चुकाया जाता। चूंकि ये प्रोजेक्ट बहुत ही धीमी गति से चल रहे है इसलिए भारत सरकार को इन पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। इन्ही प्रोजेक्ट्स पर भविष्य के भारत-भूटान सम्बन्ध निर्भर करते है।