मेरी पैदाइश एक दरमियानी हैसियत के खानदान में हुई। अब्बा मजहबी इंसान थे और हमारे घर का पूरा माहौल भी ऐसा ही था। उनकी मजहबी उसूलों की पाबंदी और रसम अदायगी की वजह से कस्बे के लोग उन्हें बेहद इज्जत देते थे। ज्यादातर लोग अब्बा का नाम नहीं लेते थे बल्कि उनको जनाब कहके ही बोलते। वे कारोबारी इन्सान थे और अपने काम धन्धे के बाद नमाजो-मस्जिद ही उनकी जिंदगी का अकेला जुनून था। हम सब जानते थे कि अब्बा हमेशा दुकान या मस्जिद, दोनों में एक जगह ही मिलेंगे। मेरे घर की सुबह भी नमाज और कुरान की तिलावत से शुरू होती।

 

मैं काफी छोटी थी, तभी से हमारे पड़ोसी काजी साहब की बड़ी बेटी मुझे कुरान रटवाने लगी। उसी ने मेरी बड़ी बहन को भी कुरान पढ़ना सिखाया था। हमें फिल्म देखने की इजाजत नहीं थी। हमारे घर का अंदरूनी हिस्सा बावर्चीखाने से आती मसालों की तीखी बू से महकता रहता। भाई बहनों में दिन भर खूब झगड़े होते। बावर्चीखाने में सालन का मसाला पीसती अम्मी हमें कोसती रहतीं। अब्बा यूँ तो बड़ी ही मुश्किल और तहजीब भरी उड़डू में बोला करते पर जब कभी अम्मी पर बिगड़ते तो गालियों की ऐसी बौछार उनके मुंह से निकलती कि सुन कर हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती। बाद में तो हम बच्चे इन बातों के आदी हो गये। यह था उस घर का माहौल, जिसमें मैंने परवरिश पायी।

किस्मत से हमारे अब्बा में एक बात बड़ी अच्छी थी कि वे तालीम के बड़े हिमायती थे। तालीम का जिक्र छिड़ने पर वे बड़ी अकीदत से सर सैय्यद का नाम बारहा लिया करते। पढ़ने की उमर होते ही उन्होंने मेरा नाम शहर के मिशन स्कूल में लिखा दिया था। कौम के कई घरों की लड़कियां भी उस स्कूल में पढ़ती थीं। जब मैंने पांचवें दर्जा पास कर लिया तो आगे की तालीम के लिए मिशन कॉलेज में भेज दिया गया। इस कॉलेज में सिर्फ लड़कियों को तालीम दी जाती थी। यहीं से मेरी जिंदगी में हलचल शुरू हुई। कॉलेज में मेरी कई सहेलियां खाते पीते हिन्दू घरों की थीं। घर वालों की सख्ती के बावजूद में कभी कभी उनके घर भी चली जाती।

वहां मेरा एक नयी ही दुनिया से सामना हुआ। पूजा की खुशबू उनके घरों में तैरती रहती। सहेलियों की माँओं का आत्मसम्मान से भरा व्यक्तित्व मुझे आकर्षित करता। अनजाने ही मैं अपनी अम्मी को उनसे तोलने लगती। कभी किसी काम से उनके पिता घर में आते तो हमें देखते ही स्नेह से कहते, फलानी की अम्मा! इन बच्चियों को कुछ खाने पीने को भी दिया या नहीं? सहेली की माँ बड़े मान भरे लहजे में जवाब देतीं, ‘सारी चिन्ता तुम्ही को है, मुझे तो जैसे बच्चों की कोई परवा है ही नहीं।’

मैंने अपने घर में ऐसा मीठा माहौल कभी नहीं देखा था। पांचवीं पास करने के बाद तो मुझे औरों के सामने आने की इजाजत ही न थी। कभी आयी भी तो मेहमानों की जिस्म भेदती नजर देख कर अपने में सिमट जाती। उनकी नजरों में वही होता, जो मैं अपने चचाजान के पोलियोग्रस्त बेटे की भूखी आंखों में देखती थी। रिश्ते के भाइयों से दूर रहने की मेरी आदत वहीं से परवान चढ़ी।

धीरे धीरे मुझे दोनों दुनियाओं का फर्क नजर आने लगा। झूठ नहीं बोलूँगी, एक दो सहेलियों के भाइयों के लिए मन में कुछ महसूस भी हुआ लेकिन या तो वे बेहद दब्बू थे, या फिर मजहबी दीवार की ऊंचाई ज्यादा तवील थी। मेरे लिए परिवार-समाज से टक्कर लेने की उनमें हिम्मत ही न थी। उन दिनों मुझे समझ में आने लगा कि यह फर्क मिट नहीं सकता। दोस्ती अलग चीज है लेकिन मैं चाह कर भी उनकी दुनिया में दाखिल नहीं हो सकती। हिन्दू मुझे अपने घर मे किसी कीमत पर कबूल नहीं करेंगे। यहीं से मेरे दिल में एक तकलीफदेह हीन भावना ने घर कर लिया। जिस माहौल पर मैं इस कदर लट्टू थी, उसी के लिए मेरे दिल में हिंसक खयाल पैदा होने लगे। अपने घर में अम्मी की हैसियत और सहेलियों की माँ का रुतबा मेरे अन्दर भीतर ही भीतर नफरत भरने लगा था।

तालीम काफी मान कर घर वालों को अब मेरी शादी की फिक्र शुरू हो गईं। घर में रोज लड़के वालों के पैगाम आने लगे। ऐसे वक्त में बड़ी आपा मेरे लिए फरिश्ता बन कर सामने आयीं। जमाना बदल रहा था। अम्मी ने जिंदगी भर जो सहा, आपा नहीं सह पाती थीं। बदले में उन्हें ससुराल में बड़ी जिल्लतें झेलनी पड़ती थीं। मैं पढ़ने में बड़ी तेज थी, आपा ने लड़ झगड़ कर मुझे आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ भिजवा ही दिया। आपा के हालात देख कर परेशान अब्बा भी उनकी बात न टाल सके और मेरे अलीगढ़ जाने का रास्ता साफ हुआ।
अलीगढ़ पहुंच कर तो उड़ने के लिए पूरा आसमान मेरे सामने था। पढ़ाई बरायनाम और स्टूडेंट यूनियन, इन्कलाबी नारे मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गये। लेकिन सवाल था, इन्कलाब कहाँ, किससे? सोवियत ब्लॉक ढहने के बाद कम्युनिस्ट आंदोलन कटी पतंग हो रहा था। क्रांतिकारी को एक अदद दुश्मन तो चाहिए, जिससे संघर्ष किया जा सके। हालांकि बाबरी मस्जिद की सहादत ने पार्टी को हिन्दू साम्प्रदायिकता का हॉट केक थमा दिया लेकिन उसकी सारी फसल सोशलिस्ट पार्टियों ने काट ली।

कम्युनिज्म का मकसद अब वर्ग संघर्ष-फंघर्ष को भूल कर हिन्दू मानसिकता के खिलाफ हवा में तलवार भांजना ही रह गया था। एक बात जरूर थी, मीडिया, ज्यूडिशियरी और नौकरशाही, गरज ये कि पूरे सिस्टम पर अंदरखाने हमारे ही लोगों का कब्जा था। यहां मुझे अपनी किशोरावस्था में पैदा हुई नफरत को उजागर करने का सुनहरा मौका मिला। मुझे लगा कि मेरी ईर्ष्या को खत्म करने का एक ही रास्ता है कि हिन्दुओं की विशिष्टता को खत्म किया जाय। खुशी की बात ये थी कि इस पाक मकसद में बहुतेरे हिन्दू स्टूडेंट भी बढ़ चढ़ कर हमारा साथ दे रहे थे। धीरे धीरे मैं अपने इसी मकसद में गर्क होती चली गयी।

मेरे एक्टिविज्म की खबरें घर तक पहुंचने लगीं। घर वाले बेहद नाराज थे। फौरन पढ़ाई छुड़ा कर वे मेरी शादी कर देना चाहते थे। लेकिन अब मैं उनकी पकड़ से बड़ी दूर जा चुकी थी। कस्बाई नेचर के शौहर और उसके लिए आधा दर्जन बच्चे जनने के खयाल से ही मुझे उबकाई आती। हमारे एक दो उच्च शिक्षित रिश्तेदारों ने मेरे घर वालों को समझाया कि मैं एक बड़े मकसद पर काम कर रही हूं जो सबकी किस्मत में नहीं होता। लिहाज मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया जाय।आखिकार घर वालों ने भी बेमन से ही सही, सब्र कर लिया।

मेरी पोस्ट ग्रेजुएशन तो जैसे तैसे पूरी हो गयी लेकिन इन्कलाब के लिए यूनिवर्सिटी की आड़ में रहना जरूरी था। अपने ग्रुप की मदद से मुझे जनेवि में पीएचडी के लिए दाखला मिल गया। वहां खाने-खर्चे की कोई फिकर है नहीं। अब मैं वैल सैटल्ड हूँ। पार्टी हिमायती जर्नलिस्ट हमें सिर आंखों पर रखते हैं। पार्टी के टॉप लीडर एक आवाज पर हमारी नुक्कड़ सभाओं में आ खड़े होते हैं। हमें जरा सी तकलीफ हो तो पार्टी संसद को हिला डालती है। हर दिन सेमिनार, हर शाम प्रोग्राम और हर रात…। सारे आलम में अपने ताल्लुकात का नेटवर्क!

कहानी के लेखक सुभाष शर्मा है