यूं तो मन भर गुटखा भसक लेने के बाद दिमाग कुंडलियां कोने में सरक जाती हैं लेकिन जटाप्रसाद जी ठहरे स्वयं को बुद्धिजीवी समझने वाले इंसान; वो ये मानते ही नहीं थे कि दिमाग में कटहल जैसे तन्तु हैं। वे अपने आपको निकोला टेस्ला से कम नहीं समझते थे, जब मन होता एकाध मेशराम टाइप प्राणी की डीवीडी टीवी पर देखते और पेट के कर्वेचर को उत्तर लेंस की भांति बनाकर लकड़ी की कुर्सी पर बैठकर ध्यान से सुनते। हाल में उन्होंने एक वीडियो देखा जिसमें बताया गया कि पुष्यमित्र शुंग ही राम हैं, ये जानकारी प्राप्त करने के बाद तो उनके शरीर का कैपेसिटर मानो फ्यूज होने की कगार पर पहुंच गया, अपने होठों में उन्होंने इस कदर मोड़ा मानों डोनाल्ड डक की चोंच हो और उनके बीच खैनी दबा ली ततपश्चात बड़े ही चिंतित लहजे में विचार करने लगे।

मन ही मन बड़बड़ा रहे थे तभी महोदय की जीवनसंगिनी आ गई जो कथित तौर पर समाज के कुलीन वर्ग से थीं और जाति से ब्राम्हण थीं लेकिन जटाप्रसाद की जटाओं के जादू और डोनाल्ड डक जैसे रूप पर मुग्ध होकर अपना दिल दे बैठी थी। जटाप्रसाद जी ने उनके दिल को इस प्रकार रखा था जैसे महाजन किसी चीज को गिरवी रखता है और समय समय पर व्यक्ति को ताने भी देते रहता है कि यदि समय पर उधार न चुकाया तो तुम्हारे दिल का जूस निकालकर पी जाएंगे। दरअसल जटाप्रसाद जी के अनुसार उनकी जीवनसंगिनी के पूर्वज ब्राम्हण पुरोहितों ने उनके पर पर पर पुरखों पर करोड़ों अत्याचार किये थे जिसका हिसाब चुकाने के लिए देवी जी जटाप्रसाद से परिणय सूत्र में बंध गईं और हिसाब है कि चुक ही नहीं रहा।

जब से मेशराम के वीडियो में उन्होंने सुना कि पुष्यमित्र शुंग ने समस्त बौद्धों को मरवा दिया और अयोध्या में खुदाई में भी बुद्ध धर्म के अवशेष निकल रहे हैं; जटाप्रसाद जी ने जो सबेरे कटहल खाई थी वो भी नहीं पची। परसों की परवल आंतों में ब्राउनियन मोशन करने लगी और जटाप्रसाद जी को डर था कि आज जो भिंडी बन रही है उसमें भी कहीं बौद्धों को खत्म करने के लिए उनकी जीवन संगिनी ब्राम्हण का षड्यंत्र न हो। जटाप्रसाद जी की जीवनसंगिनी का नाम था मगरिका चटर्जी, बंगाली ब्राम्हण फैमिली से थी और उनके पिताश्री एक वामपंथी इतिहासकार थे। इतिहास के साथ कार इसलिए जोड़ा क्योंकि जटाप्रसाद जी को उन्होंने शादी के समय अपने पूर्वजों के कुकर्मों के हर्जाने में एक कार जटाप्रसाद को भेंट की थी। जटाप्रसाद जी ने खिड़की से अपनी मारुति कार को देखा और उसके व्हील को ध्यान से देखा तो उनके पेट की कटहल गर्दन में फंस गईं। ये पहिया तो चक्र है, आइला यहां भी हिंदुओं ने षड्यंत्र किया है उन लोगों के साथ और पवनदेव के नाम पर कार का नाम मारुति रख दिया। झनझनाहट में उन्होंने टीवी खोली तो बरगद के पेड़ के फायदों के बारे में खेती किसानी आ रहा था दूरदर्शन पर, उसमें एक वनस्पति शास्त्री इसका सम्बन्ध आयुर्वेद से बना रहा था जोकि एक उपवेद है; महाराज फिर झनझना गए और बोले यहां भी षड्यंत्र ब्राम्हणों का कि बोधिसत्व के बरगद को अपना बना लिया।

तभी भिंडी की सब्जी डिनर की टेबल पर लगकर तैयार हो गई और जटाप्रसाद भिंडी खाते जा रहे और देवी जी गालियां; लेकिन सन्तुष्ट दौनों थे। घर में एक बड़े फ्रेम में बाबा साहेब और महात्मा बुद्ध टँगे थे; टँगे शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि जो लोग महापुरुषों का अनुसरण करते हैं वो उनके विचारों को भी अपने में लाते हैं बाकी लोगों के लिए महापुरुष होते हैं ढाल ताकि उनके पीछे वो अपना स्वार्थ सिद्ध कर सकें। भोजन करके जटाप्रसाद खटिया पर पसर गए और तोंद के कर्व को परवलय के आकार में ढाल दिया। मगरिका गाली खाकर ही संतुष्ट थी परंतु फिर भी उन्हें लग रहा था कि उनके पूर्वज जिनका उन्हें नाम भी पता नहीं था, उन्होंने जटाप्रसाद जी के पूर्वजों पर बहुत अत्याचार किये होंगे; अगर उन्हें गर्म तवे पर भी भुना जाए तो ये भी कम होगा।

टीवी पर फिर से मेशराम का वीडियो प्ले होता है और इस कार्यक्रम का टॉपिक होता है, ब्राम्हण या विदेशी आर्य जिन्होंने मूलनिवासियों के साथ छल किया। किचिन से टीवी की आवाज़ सुनते हुए मगरिका पश्चाताप की अग्नि को और प्रज्वलित कर देती हैं। इति

 

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