भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न का ऐलान कर दिया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समेत सामाजिक कार्यकर्ता नानाजी देशमुख और महान संगीतकार भूपेन हजारिका को देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। बहरहाल यहां पढ़ें कौन थे नानाजी देशमुख और क्या था देश की राजनीति और समाज में उनका योगदान।

नानाजी का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभानी जिले के छोटे से गांव कडोली में हुआ था। नानाजी देशमुख का पूरा नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख था। नाना जी का प्रारंभिक जीवन बेहद अभाव में गुजरा इसके बावजूद उन्होंने पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपनी शिक्षाप्राप्ति के लिए उन्हें सब्जी तक बेचनी पड़ी थी।

नानाजी देशमुख लोकमान्य तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हैडगेवार की राष्ट्र निष्ठा ने उन्हें संघ से जोड़ा। 1940 में उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया तथा आगरा से संघ प्रचारक के रूप में अपना समाज जीवन आरंभ किया। शिक्षा की दुर्दशा को देखते हुए 1950 में गोरखपुर में ही उन्होंने पहला सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय खुलवाया। संस्कारवान व राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बनाने वाले ऐसे 50000 से अधिक विद्यालय आज देश के कोने- कोने में चल रहे हैं। आचार्य विनोभा भावे के द्वारा शुरू किये गये भूदान आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। इसके साथ ही उन्होंने जयप्रकाश नारायण के पूर्ण क्रांतिकारी आंदोलन को भी अपना पूरा समर्थन दिया था। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान पटना में अपने ऊपर लाठियां खाकर श्री जयप्रकाश नारायण को बचाया। आपातकाल में जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी के उपरांत वे प्रथम सत्याग्रही बने और देश भर के कार्यकर्ताओं का नेतृत्व करते रहे। नानाजी देशमुख प्रख्यात समाजसेवी के साथ भारतीय जनसंघ के नेता भी रहे हैं। इसके अलावा मोरारजी देसाई की सरकार में वो मंत्री भी चुने गए थे, लेकिन उन्होंने ये कहकर मंत्री पद ठुकरा दिया कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग सरकार से बाहर रहकर समाजसेवा का काम करें।

1980 में 60 साल की आयु के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर पूर्णकालिक समाजसेवा का कार्य उत्तरप्रदेश के चित्रकूट और गोंडा जिले को कार्यबिन्दु बनाकर शुरू किया। प्रचार से दूर रहने वाले निष्काम कर्मयोगी द्वारा केवल गांवों की दशा सुधार का उन्हें अपने बलबूते पर खड़कर आत्मनिर्भर बनाने के लिए जो कार्यक्रम प्रारंभ किये गये उन्होंने भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ दी। 2005 में प्रारंभ किये गये चित्रकूट ग्रामोदय प्रकल्प ने चित्रकूट के आसपास 500 से अधिक ग्रामों को स्वाबलंबी बना दिया। उन्होंने चित्रकूट में चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे इसके पहले कुलाधिपति थे। वे ग्राम विकास के सच्चे पुरोधा थे। सफल ग्रामोत्थान के इन्ही प्रयोगों के लिए उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से विभूषित कर राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया। दीनदयाल शोध संस्थान नानाजी की कल्पना का ही एक साकार रूप है।

लगभग एक शतक लंबी राष्ट्र को समर्पित आयु के अंतिम पड़ाव से पूर्व ही उन्होंने तय कर लिया था कि जब तक जीवित हैं तब तक स्वयं तथा मृत्यु के बाद उनकी देह राष्ट्र के काम आये। दिल्ली की दधीचि देहदान समिति को अपने देहदान संबंधी शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए नाना जी ने कहा था कि मैंने जीवन भर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में होने वाली दैनिक प्रार्थना में बोला है -‘पतत्वेष कायो, नमस्ते-नमस्ते’ अर्थात् हे भारत माता मैं अपनी यह काया हंसते हंसते तेरे ऊपर अर्पण कर दूं। अतः मृत्योपरांत उन्होंने न सिर्फ अपना देह दान कर चिकित्सा-शास्त्र पढ़ने वाले युवकों के अध्यापन हेतु अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को समर्पित करने का संकल्प किया बल्कि दस हजार रुपये की अग्रिम राशि भी समिति को दी जिससे देश के किसी भी भाग से उनका शांत शरीर इस कार्य हेतु उचित स्थान पर लाया जा सके।