नमस्कार मित्रों! आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताएंगे, जिनके योगदान को एक सच्चा भारतीय कभी नहीं भुलाना चाहेगा। आपने ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ का नाम सुना होगा। आप यह भी जानते होंगे कि इसका नाम ‘भाभा’ क्यों और किसकी याद में रखा गया। जी हां! हम यहां बात कर रहे हैं भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक, ‘डॉ. होमी जहांगीर भाभा’ की।

कौने थे होमी भाभा?

भारतीय परमाणु कार्यक्रम के पितामह ‘डॉ. होमी जहांगीर भाभा’ का जन्म 30 अक्टूबर, 1909 को मुंबई (तत्कालीन बांबे रियासत)  में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा मुंबई के ही कैथड्रल और जॉन केनन स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से स्नातक पूरा किया। सन् 1927 में इंग्लैंड चले गए और वहां उन्होंने सन् 1934 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

डॉ. भाभा जब छोटे थे, तो रात में उन्हें घंटों नींद नहीं आती थी। वे एकटक लगाए आकाश में चांद-तारों को निहारते रहते थे। इसकी वजह कोई बीमारी नहीं थी, बल्कि उनके दिमाग में विचारों की तीव्रता के कारण ऐसा होता था। मात्र 15 वर्ष की किशोर आयु में ही उन्होंने आइंस्टीन के सापेक्षता के सिध्दांत (Theory of Relativity) को जान लिया था।

डॉ. भाभा की उपलब्धियां

डॉ. भाभा को भारत के परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम की नींव जिस मजबूती से रखी थी, उसी के वजह से भारत आज विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है।

परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की शुरूआत भाभा ने मात्र कुछ वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में की। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान में कार्य तब आरम्भ किया जब नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को मानने को कोई तैयार नहीं था। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे चाहते तो ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और अमेरिका जैसे देशों को भी अपनी सेवाएं दे सकते थे। बकायदा इसके लिए उनके पास इन देशों से प्रस्ताव भी आए थे। लेकिन उन्होंने अपनी मातृभूमि को परमाणु ऊर्जा से संपन्न करने की ठान रखी थी।

उन्होंने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की और वर्ष 1945 में इसके निदेशक बने। देश के आजाद होने के बाद उन्होंने दुनिया भर में रह रहे भारतीय वैज्ञानिकों भारत लौटने की अपील की। उनका मानना था कि एक राष्ट्र खुशहाल और शांत तभी रह सकता है, जब उसके पास परमाणु शक्ति हो। ज्ञात हो कि उस समय अमेरिका और रूस जैसे देशों ने परमाणु बम बना लिया था। 60 के दशक में विकसित देशों का तर्क था कि परमाणु ऊर्जा संपन्न होने से पहले विकासशील देशों को दूसरे पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। डॉक्टर भाभा ने इसका मजबूती से खंडन किया और कहा कि विकास कार्यों में परमाणु ऊर्जा के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

उन्होंने परमाणु वैज्ञानिक राजा रामन्ना से कहा था, “हमें परमाणु क्षमता रखनी चाहिए। पहले हमें खुद को साबित करना चाहिए, उसके बाद अहिंसा और परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व के बारे में बात करनी चाहिए।”

सादगी से थे परिपूर्ण

बता दें कि भाभा वर्ष 1950 से 1966 तक भारतीय परमाणु ऊर्जा के सचिव थे। कहते हैं कि उनकी सादगी ऐसी थी कि वे अपना ब्रीफकेस अपने किसी चपरासी से नहीं उठवाते थे। इसके साथ साथ उन्हें संगीत भी बहुत पसंद था। वे भारतीय तथा पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के कायल थे। इतना ही नहीं, पेड़ों की कटाई भी उन्हें कतई पसंद नहीं था। टीआईएफआर में एक बगीचा है, जिसक नाम है- ‘अमीबा गार्डन’। उसे देखकर उन्होंने बगीचे के पेड़ों को मात्र तीन फीट में शिफ्ट करने का निर्णय लिया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इसके लिए उन्होंने इन पेड़ों की कटाई नहीं की, बल्कि पहले पेड़ लगाए, फिर इमारत तैयार करवाई।

‘मात्र 18 महीनों में बना देते परमाणु बम’

4 जनवरी, 1966 को उन्होंने भारत सरकार को अपने कार्यक्रम के बारे में सूचना दी कि अगर भारत सरकार अनुमति दे, तो वह मात्र 18 महीनों में ही परमाणु बम बनाकर देश को समर्पित कर सकते हैं और तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसके लिए हामी भी भर दी थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। प्रधानमंत्री कार्यालय से किसी गद्दार ने यह सूचना लीक कर दी। दुर्भाग्यवश भारत पाकिस्तान के बीच समझौते के लिए सोवियत संघ गये प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय हालत में मृत्यु हो गई। इनके मृत शरीर का पंचनामा भी नहीं हुआ और ना ही इनकी मृत्यु की जांच के लिए बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट देश को बताई गई।

शास्त्री जी की मृत्यु के ठीक 13 दिन बाद 24 जनवरी, 1966 को मुंबई से न्यूयॉर्क जा रहे बोइंग-707 दुर्घटनाग्रस्त हो गया और विमान में सवार इस महान स्वप्नदृष्टा की फ्रांस के मॉन्ट ब्लां में मृत्यु हो गई। इस दौरान विमान में सवार सभी 117 यात्रियों की मृत्यु हो गई थी। 4 जनवरी को परमाणु कार्यक्रम के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी मिलना, 11 जनवरी को प्रधानमंत्री की रहस्यमय हालत में मृत्यु और इसके 13 दिन बाद सूचना देने वाले इस महान विभूति की मृत्यु बहुत कुछ कहती है।

सीआईए ने मारा भाभा को?

कहते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका को इनके अभियान के बारे में पता चल चुका था। अपने रास्ते से इन्हें हटाने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने योजना बना रखी थी। कहा जाता है कि सीआईए के ही एक अधिकारी ने इनके विमान में बम प्लांट किया था। चूंकि, अमेरिका उनके कदमों से डर गया था, इसलिए उसने हटाने के लिए यह साजिश रची थी। एक न्यूज वेबसाइट ने भी अपनी रिपोर्ट में भाभा की मृत्यु में सीआईए का हाथ होने का दावा किया था।

TBRNews.org नाम की इस न्यूज वेबसाइट के पत्रकार ग्रेगरी डगलस ने सीआईए के अधिकारी रॉबर्ट टी क्राओली से बात की। 11 जुलाई, 2008 को हुई इस बातचीत में क्राओली ने भाभा की मृत्यु में सीआईए का हाथ होने का दावा किया था। क्राओली ने कहा था, “हमारे सामने समस्या थी, आप जानते हैं, भारत ने 60 के दशक में आगे बढ़ते हुए परमाणु बम पर काम शुरू कर दिया था।” आगे भाभा के बारे में बताते हुए उसने कहा, “मुझपर भरोसा करिए, वह खतरनाक थे। वह परेशानी को और अधिक बढ़ाने के लिए वियना की उड़ान में थे, तभी उनके बोइंग 707 के कार्गो में रखा बम विस्फोट हो गया…।” इससे स्पष्ट है कि अमेरिका खुद तो परमाणु बना चुका था, परंतु वह नहीं चाहता था कि भारत एक परमाणु संपन्न राष्ट्र बने।

बड़ी बात यह कि इनकी और शास्त्री जी की मृत्यु के बाद कई सरकारें आईं, लेकिन किसी ने भी इस गुत्थी को सुलझाने का तनिक भी प्रयास नहीं किया। आज इस महान विभूति के स्वर्गवास हुए 53 वर्ष हो गए, लेकिन मृत्यु की वजह अभी भी रहस्यमय बनी हुई है। इस महान आत्मा को श्रध्दांजलि सच्ची उसी दिन मानी जाएगी, जिस दिन भारत सरकार इनकी मृत्यु की गुत्थी को सुलझा दे। भारत सरकार ने इस महान वैज्ञानिक के योगदान को ध्यान में रखते हुए परमाणु अनुसंधान केंद्र का नाम ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ किया।

राष्ट्र नमन करता है ऐसे सपूत को!

भारत माता की जय??
जय हिंद
वंदे मातरम्