काफ़ी समय के अंतराल के बाद आज भारतीय रेल से सफ़र करने का मौक़ा मिला था। पुणे से हज़रत निज़ामुद्दीन जाने के लिए काफ़ी उत्साहित था, आख़िर 3 साल के बाद हमारा पूरा परिवार परिवार दिवाली और छठ पूजा साथ में मनाने जा रहे थे।

जब रिजर्वेशन करवाया था तो दर्शन एक्सप्रेस के नाम और पूर्ण वातानुकलित होने से ख़ास प्रभावित था और यक़ीन था की यह ट्रेन अवश्य ही अच्छी और रेलवे द्वारा दी जानकारी के मुताबिक प्रीमियम होगी, लेकिन आज इस ट्रेन और भारतीय रेल की दुर्दशा देखकर काफ़ी निराशा हुई। पुणे स्टेशन से चलने के लिए ट्रेन निर्धारित समय से क़रीब 45 मिनट पूर्व आकर लग गयी थी। मैं अपनी पत्नी के साथ आरक्षित द्वितीय श्रेणी वातानुकूल के डब्बे में पहुँचा तो एक सुखद यात्रा के सारे सपने चौपट होते दिखाई दिए।

 

बर्थ के ऊपर तेल और पूरियाँ बिखरी हुई थी और सीट के बीच का काउंटर तेल से सराबोर था। ऊपर के बर्थ पर चाय पीकर फेंके हुए डिस्पोज़बल कप दिख रहे थे। मैंने अपना फ़ोन निकाला और तैश में ट्वीट कर दिया और रेल मंत्री के साथ सेंट्रल रेलवे के अधिकारिक हैंडल को टैग कर दिया। देश के प्रधानमंत्री स्वयं मुझे फ़ॉलो करते हैं ट्विटर पर मज़ाक़ है क्या, कुछ तो आला अधिकारियों पर असर होगा।

थोड़ी देर में एक परिवार अपने दो बच्चियों के साथ आए, वो भी हमारी ही तरह इस तरह पसरी गंदगी से परेशान दिखे। सुबह के 5 भी नहीं बजे थे और हमारे सहयात्री के बच्चे नींद से बहाल दिख रहे थे, उन्होंने प्रदान की गयी बेडशीट के पैकेट से काग़ज निकाला और बर्थ की सफ़ाई में जुट गए। मैंने भी बर्थ को साफ़ करके उसे बैठने और सोने योग्य बनाया। इस बीच हमारे सहयात्री भी फ़ोन से रेलवे सुविधा में बार-बार फ़ोन कर रहे थे ताकि कहीं से कोई सुविधा मिल जाए।

इधर मेरा ट्वीट रेलवे सेवा के ज़रिए DRM मुंबई से होता हुआ DRM पुणे तक पहुँच चुका था, और इस बात को क़रीब 4 घंटे होने जा रहे थे लेकिन हाय रे भारतीय रेल और इसके आला अधिकारी, इनसे ज़्यादा टशन में तो इनके बाबू लोग हैं। मजाल है अपना काम सही से और समय पर कर दे। बरहहाल हमने और हमारे सहयात्री ने मिलकर गाँधी जी के स्वच्छता और मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनने का ठाना और स्वयं ही कम्पार्ट्मेंट की ठीक ठाक सफ़ाई कर दी।

 

अगर यहाँ देखा जाए तो रेलवे कर्मियों की लापरवाही के अलावा सफ़र करने वाले यात्रियों की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि वो साफ़ सफ़ाई का ख़याल रखे और इस बात को समझे कि रेलवे आपकी आपकी सम्पत्ति है ऐसा कहने का मतलब ये नहीं होता कि रेलवे आपके बाप की सम्पत्ति है और आप इसे जैसे मन वैसे गंदा करेंगे। बहरहाल ट्रेन विरार स्टेशन पर रुकी तो बाहर उतरा, धूप में हर डब्बे के बाहर लगा बापू का पोस्टर पर स्वच्छ भारत अभियान लिखा हुआ था जो एक तरह से व्यंग्य की तरह प्रतीत हो रहे थे।

दूसरी तरफ़ एक और मामले में रेलवे ने एक रिजर्वेशन में लापरवाही दिखाते हुए एक परिवार के सदस्य को अलग अलग डब्बे में भेज दिए। जबकि रिजर्वेशन करते समय इसके लिए रिक्वेस्ट डाली गयी थी। 2 साल के बच्चे को लिए माँ अलग डब्बे में और पिता को अलग डब्बे में भेज कान में रुई डाल सो गए। बार बार रिक्वेस्ट करने के बाद भी उन्हें किसी तरह से कोई मदद नही मिल पा रही है।

हालांकि सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाए तो यह भी उचित नही होगा, सरकार यात्रियों के लिए बेहतर व्यवस्थाएं बनाती हैं लेकिन सवाल यह हैं कि क्या वह व्यवस्थाएं आम रेल यात्री तक पहुंच रही हैं? यह सारी सरकारी व्यवस्था को लागू करने वाले कर्मचारी कितने मुस्तैद हैं, फर्क इस बात का पड़ेगा। वरना आप दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनाते रहिये और खुद को खुदा से कम नही समझने वाले ये सरकारी कर्मचारी आपकी योजनाओ को पलीता लगाते रहेंगे।