हमारे देश के बहुत ही निर्भीक, यशस्वी और बिलकुल भी पक्षपातपूर्ण रवैया न अपनाने वाले बुद्धिजीवी, पत्रकार और कलाकार हैं। जैसे- सागरिका, बरखा, राजदीप, शेखर गुप्ता, राम गुहा, नसीरुद्दीन शाह, राणा अय्यूब, सबा नक़वी, रवीश कुमार, तीस्ता सीतलवाड़, अरुंधति राय, सलिल त्रिपाठी, विनोद दुआ आदि। जो किसी सजग प्रहरी की तरह पूरे दुनिया भर में नज़र रखते हैं। जहाँ कही भी अन्याय होता है, तो ये सभी तुरंत लानत भेजते हैं और गलत को गलत कहने में जरा भी डरते नहीं हैं। अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं।

अभी कुछ दिन पहले न्यूज़ीलैण्ड में आतंकी हमला हो गया था, एक बंदूकधारी ने क्राइस्टचर्च शहर के दो मस्जिदों में घुसकर कुछ लोगों को मार दिया था। वहां ठीक वैसे ही बंदूक ने मारा था। जैसे- बीबीसी और CNN बताते हैं कि, “ट्रक ने मारा”, “लारी ने कुचला”, इत्यादि। लोकतंत्र के ये सभी सजग प्रहरी तुरंत हरकत में आ गए। लानत भेजी, इस बार तो आतंकवाद का धर्म भी पता कर लिया। बंदूक जिसके हाथ में थी उसका भी पता कर लिया। तफ्तीश में यह भी पता लगा लिया कि वह भटका हुआ नौजवान नहीं था।

हालांकि उसकी क्या हॉबी थी, कौन से गाने सुनता था, हल्दीराम में खाता था या नहीं, कुछ भी पता नहीं कर पाए। उसके पिता जी स्कूल में पढ़ाते थे या नहीं, यह भी पता नहीं चला। उसको सेना या किसी आम आदमी ने कभी पकड़ के पीटा था या नहीं, यह भी पता नहीं चल सका हमारे बुद्धिजीवियों को। ना जाने क्यों?

न्यूज़ीलैण्ड में जिसके हाथ में बन्दूक थी, उसको इंसान बनाने वाला कोई भी बिंदु हमारे बुद्धिजीवी पकड़ नहीं पाए। पता नहीं क्यों? लेकिन गत 14 फरवरी को पुलवामा हमले को अंजाम देने वाले आतंकी का इन बुद्धिजीवियों ने इंसानी बिंदु तुरंत खोज निकाले थे। इसके लिए इन्हें भारत रत्न नही दे सकते है तो कम से कम पदम पुरस्कार ही दे, और अगर यह भी ना दे सकते तो कम से कम नोयडा लखनऊ में फ्लैट तो देना बनता है।

बहरहाल, आगे बढ़ते हैं। होली की पूर्व संध्या पर पाकिस्तान में दो हिंदू लड़कियों, 13 वर्षीय रवीना और 15 वर्षीय रीना का अपहरण करके उन्हें सिंध प्रांत में जबरन इस्लाम स्वीकार कराया गया और अपने उम्र से बहुत बड़े मुस्लिम पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया गया। इतना घोर अन्याय होने पर सब लोग बड़ी आशा भरी नज़रों से इन बुद्धिजीवियों , पत्रकारों और कलाकारों की तरफ देख रहे थे कि शायद ये पाक पीएम इमरान खान के कान खीचेंगे। शायद अभी मानवाधिकार वाले पाकिस्तान के शासकों का जीना हराम कर देंगे। हो सकता है कि हमारे बेहतरीन कलाकारों का दिल पसीजने वाला ट्वीट आता ही होगा। लेकिन नहीं आया। पर क्यों?

न्यूज़ीलैण्ड में जब बंदूक से हमला हुआ, तब एक बहुत ही बेहतरीन पत्रकार और लेखक सलिल त्रिपाठी बता रहे थे कि हम लोग उनके साथ, जिनका नाम भर लेने से हम सांप्रदायिक हो जाते हैं, कैसे एकजुटता दिखाएँ? जैसे कि हम उनके साथ बैठे हैं तो सुवर का मांस न खाएं, अगर वह शराब नहीं पी रहे तो हम भी न पिएं, वह अभिवादन करें तो हम कैसे जवाब दें। खैर, ये सुझाव वास्तव में बेहतरीन हैं। पकिस्तान के सिंध की घटना के बाद भी हमें लगा की पाकिस्तान की दो हिन्दू बच्चियों को अगवा कर लेने पर तो वह बहुत ही व्यथित हो गए होंगे। शायद कुछ बोलेंगे या लिखेंगे। इतना नहीं तो, ट्वीट तो पक्का करेंगे। शायद हमारा इंतज़ार थोड़ा लम्बा हो गया है। लेकिन वह पाकिस्तान की उस जमात को भी कुछ बोलेंगे ज़रूर, जिसका नाम नहीं लेना है। नाम लेने से हम सांप्रदायिक हो जायेंगे।

कहा जाता है कि एक कलाकार का मन बहुत की भावुक होता है। बात बात पे डर जाता है, आक्रोशित हो जाता है, दुखी और चिंतित हो जाता है। जैसे- आमिर खान, नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर, महेश भट्ट, आदि का समय समय पर होता रहता है। उनका कलाकार मन तो इस समय भी बहुत ही व्यथित होगा और वह लोग शायद अपने आप को दुख के मारे संभाल नहीं पा रहे होंगे। इनमे से तो कितनों के बड़ी की बच्चियां हैं। जब ये बोलेंगे तो इमरान खान की खैर नहीं और महेश भट्ट तो पक्का एक फिल्म फटाफट बना डालेंगे। जब तक वह ऐसा नहीं कर पाएंगे उनका कलाकार अंतर्मन उन्हें कचोटता रहेगा। लेकिन शायद बेचारे अभी सब के सब बहुत ही डरे हुए हैं।

अब आते हैं हमारे स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकारों पर। वह तो पूरी दुनिया के पत्रकारों से ज्यादे निर्भीक, निडर और निष्पक्ष होने का दावा करते हैं। बात बात पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का झंडा बुलंद करते हैं। इन दोनों बच्चियों की आजादी पर भी कुछ दिनों में लेखों की झड़ी लगा देंगे देखना आप। भला इन बच्चियों के साथ ऐसा अन्याय हो जाये और हमारे पत्रकार और नारीवादी का राग अलापने वाले चुप बैठे रहें? हो ही नहीं सकता। हो सकता थोड़ा अभी लोक सभा चुनाव में उलझे हों या लोकतंत्र पर खतरा है, तो उसको बचाने में लगे हों। बस एक बार लोकतंत्र बच जाए तो यह इमरान खान की अच्छे से क्लास लेंगे।

अब सबसे बड़े प्रबुद्ध वर्ग पर आते हैं। वो हैं- मानवाधिकार संगठन। दर्दनाक घटना पर सिर्फ भारत ही नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, जैसे- एमनेस्टी इंटरनेशनल, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग, संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन, फेमिनिस्म इंटरनेशनल, आदि सब शांत हैं। यूनीसेफ वाले भी अपनी जुबान पर ताला लगाए हैं। महिला अधिकार संगठन भी। ये सभी चुप्पी साधे हुए हैं, इसका मतलब इस आरोप में ये भी बराबर के हकदार हैं और कहीं न कहीं इस घिनौने कृत्य से अपनी सहमति रखते हैं।

रविवार (24 मार्च) को भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त से जाँच करके रिपोर्ट देने को कहा है। इसके बाद पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री का तुरंत ट्वीट आता है और वो कहते हैं कि ये हमारा आंतरिक मामला है, इसलिए आप इसमें दखल मत दीजिये। फवाद खान के इस ट्वीट का सुषमा स्वराज ने जवाब तो दिया ही। इसके साथ ही एक और करारा जवाब उन्हीं के देश की एक पत्रकार और लेखिका की तरफ से आया।

बस आखिर में हमारे और भारत के हर हिंदू के मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं, जिसका जवाब मिलना ज़रूरी है। लोग कब कुछ लिखेंगे? कब बोलेंगे? कब विरोध करेंगे? कब धर्म-जाति देखकर अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे? कब एक होंगे? तब, जब भागने के लिए कोई जमीन ही नहीं बचेगी? भारत सरकार ने पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों, हिंदुओं, सिक्खों, जैनों, आदि के लिए नागरिकता कानून में बदलाव करके नागरिकता शुल्क मात्र 100 रुपए कर दिया है और साथ ही में ये भी कहा है कि ये सभी भारत के नागरिक माने जाएंगे। ऐसे में भारत सरकार को इस मामले को संज्ञान लेकर त्वरित कुछ आवश्यक कदम उठाने चाहिए, जिससे पाकिस्तान में हिंदूओं और सिक्खों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।