हाल ही में भारतीय सेना को बदनाम करने की साजिश का बहुत बड़ा खुलासा हुआ है। गत 2 फरवरी को संडे गार्डियन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2012 में कांग्रेस के दो शीर्ष नेता इंटेलिजेंस ब्यूरो पर यह दबाव बना रहे थे कि वो ये साबित करें कि भारतीय सेना तख्तापलट करना चाह रही थी और इसी आधार पर सेना को गाली देने के लिए मीडिया में रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।

रिपोर्ट कहा गया है, “संप्रग-2 के दौरान साल 2011 के अंत और 2012 के शुरूआती महीनों में दो शीर्ष नेताओं द्वारा अनौपचारिक रूप से इंटेलिजेंस ब्यूरो को यह साबित करने के लिए कहा गया था कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह तख्तापलट की साजिश कर रहे हैं। जब आईबी ने इन नेताओं की बातों को धता बता दिया, तो उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक फिक्शन था और हमें मीडिया में सहानुभूति बटोरनी थी।” इनमे से एक नेता बाद में संवैधानिक पद पर भी आसीन हो गया।

मामले की जांच में शामिल एक वरिष्ठ आईबी अधिकारी ने बताया, “इस काल्पनिक घटना से चिंतित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी जांच आईबी को सौंपी। जांच करने के बाद आईबी ने अपनी रिपोर्ट यह कहते हुए वापस कर दी कि जब तक सेना प्रमुख को शीर्ष अधिकारियों का समर्थन नहीं हासिल होगा, तब तक सेना प्रमुख तख्तापलट के बारे में सोच भी नहीं सकते। रिपोर्ट मिलने के बाद पीएम मनमोहन सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया कि तख्तापलट करने की संभावना शून्य है। बाद में सब कुछ स्पष्ट होने के बाद मजबूर होकर केंद्रीय मंत्रिमंडल के चार वरिष्ठ मंत्रियों को मीडिया के सामने आकर कहना पड़ा था कि तख्तापलट नहीं होने वाला था।”

पिछले पौने पांच सालों में तो आपने कांग्रेस द्वारा सेना का अपमान खूब देखा होगा। चाहें वो संदीप दीक्षित हों या संजय निरुपम या राहुल गांधी। ये तो उन्होंने विपक्ष में रहते हुए ऐसा किया। लेकिन सत्ता में रहते हुए भी कम अपमान नहीं किया गया। वास्तव में कांग्रेस का इतिहास ही है सेना पर अविश्वास और उसका तिरस्कार करने का। इस मामले में केवल लाल बहादुर शास्त्री को अपवाद कहा जाएगा, जिन्होंने जवान और किसान को सम्मान दिया था। लेकिन नेहरू और इंदिरा गांधी की सोच अलग थी।

आइए बताते हैं कि कांग्रेस द्वारा कब कब सेना का अपमान किया गया-

1. देश आजाद हुआ था और स्वाभाविक रूप से किसी भारतीय को सेना प्रमुख बनाया जाना चाहिए था। तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक अंग्रेज जनरल लोकहार्ट को सेना प्रमुख बनाया और उसके त्यागपत्र के बाद नेहरू ने किसी दूसरे अंग्रेज को आर्मी चीफ बनाना चाहा, इस आधार पर कि हमारे सैनिकों को सेना संचालन का अनुभव नहीं है। देखा जाए तो देश चलाने का अनुभव भी किसी भारतीय को नहीं था तो प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को हाना चाहिए था। अन्ततः उन्हें मेजर जनरल के एम करियप्पा को सेना प्रमुख बनाना पड़ा।

2. पचास के दशक में चीन के साथ रिश्ते खराब होते जा रहे थे तब जनरल करियप्पा ने कहा था कि सरहद तक रसद और अन्य साजो सामान पहुंचाने के लिए सड़कें नहीं हैं। इस पर नेहरू ने क्या कहा था तब के अखबारों में देखा जा सकता है। इसके अलावा वायुसेना का प्रयोग भी नहीं किया गया था। अगर भारत-चीन युद्ध की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तो बहुत कुछ चौंकाने वाला देखने को मिलेगा, ऐसा सोचना है अनेक विचारकों का।

3. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी किन्हीं कारणों से ले. जनरल सिन्हा से अप्रसन्न हो गई थीं तो उन्होंने जनरल सिन्हा को आर्मी चीफ नहीं बनाया, जनरल सिन्हा ने शालीनता से अपना त्यागपत्र दे दिया। जनरल सिन्हा का गुनाह बस इतना था कि वह स्वर्ण मन्दिर पर सेना द्वारा आक्रमण के पक्ष में नहीं थे।

ये तो 20वीं सदी के कांग्रेस की कारस्तानियां थीं। 21वीं सदी में कांग्रेस और बदल गई। हाल के सालों में आपने स्पष्ट रूप से देखा होगा। लेकिन इसके अलावा वर्ष 2004 से 2009 तक कांग्रेस ने ‘कारगिल विजय दिवस’ नहीं मनाया। 15 जुलाई 2009 तत्कालीन कांग्रेस सांसद राशिद अल्वी ने कहा था, ‘कारगिल ऐसी लड़ाई नहीं थी, जिसका जश्न मनाया जाए। वो लड़ाई हमारे क्षेत्र में लड़ी गई थी। हमें तो ये भी नहीं पता चला कि पाकिस्तानी सेना ने कब हमारी सीमा पार की और वहां बंकर स्थापित कर दिए। सिर्फ एनडीए ही इस जीत का जश्न मना सकती है।’ इतना ही नहीं, उन्होंने इस लड़ाई को सिर्फ भाजपा की लड़ाई बताया। क्या कभी केंद्र में सत्तासीन गैर-कांग्रेसी दलों ने 16 दिसंबर के विजय दिवस का यह कहकर विरोध किया कि ये लड़ाई सिर्फ कांग्रेस की थी?

इसके बाद भाजपा सांसद चंद्रशेखर ने 21 जुलाई 2009 को तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी को पत्र लिखकर कड़ा विरोध जताया था। जिसके जवाब में रक्षा मंत्री ने 16 जुलाई 2010 को पत्र का जवाब देते हुए कहा, ‘कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों को सम्मान देने के लिए इस साल भी 26 जुलाई 2010 को अमर जवान ज्योति पर श्रद्धांजलि दी जाएगी।’

इन सब के अलावा आप मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस बम धमाके में राजनीति के लिए फंसाए गये काबिल अफसर कर्नल श्रीकांत पुरोहित का सच जानते ही हैं। 30 अप्रैल 2010 को माछिल एनकाउंटर मामले में कर्नल डीके पठानिया और उनके चार कनिष्ठ अधिकारियों का कोर्ट मार्शल कर दिया गया। एनकाउंटर को फर्जी बताकर मारे गए आतंकियों को मासूम बता दिया गया। इनको सजा मिलने के बाद तमाम तथाकथित मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न आतंकी संगठनों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार की खूब वाहवाही की थी। जब सैन्य अधिकारियों को सजा मिलने पर आतंकी और अलगाववादी खुशियाँ मनाने लगें, तो एक सच्चा देशभक्त आसानी से ये समझ सकता है कि सेना सही है या गलत।

खैर, वर्तमान की मोदी सरकार को ये चाहिए कि इस मामले की फाइल दुबारा खोलकर निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों को कड़ी सजा दिलाए। कांग्रेस के समय जैसे कर्नल पुरोहित को अपराधी मान लिया गया, ठीक वैसे ही कर्नल पठानिया को भी अपराधी मान लिया गया।

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