पिछले 12-13 वर्षों में आपने भारतीय राजनीति में राजनेताओं की भाषा गिरते हुए देखा होगा। तत्कालीन सत्ताधारी दल या वर्तमान सत्ताधारी दल या इनके सहयोगी दल। चाहे वो राष्ट्रीय पार्टी हो या क्षेत्रीय पार्टी। सभी दलों के नेताओं ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपनी विपक्षी पार्टियों पर एक से एक आरोप तो लगाए ही, लेकिन इन्हीं दलों में ऐसे नेता भी हैं, जिन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में अपने विपक्षियों पर व्यक्तिगत ओछी टिप्पणी की।

ताजा मामला समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आज़म खान से जुड़ा है। अपनी बेशर्मी के लिए कुख्यात आज़म खान वर्तमान समय में रामपुर से विधानसभा सदस्य हैं और आगामी लोकसभा के लिए ताल भी ठोक रहे हैं। रविवार को पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उनके समर्थन में सभा की। इस सभा में जब इस बेशर्म व्यक्ति की बोलने की बारी आई, तो ये लंपट दास हमेशा की तरह अपने जहरीले बोल बोलना शुरू कर दिए। इन्होंने तुरंत ही वर्तमान में रामपुर से उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहीं बीजेपी प्रत्याशी जया प्रदा (पूर्व अभिनेत्री) पर हमला बोलना शुरू कर दिया। खैर, शब्दों से हमला तो आजकल सभी नेता एक दूसरे पर कर रहे हैं, लेकिन इस टुच्चे आज़म खान ने तो अपने शब्दों से जयाप्रदा का दुष्कर्म ही कर दिया। महिलाओं के प्रति अपनी शरई सोच दिखाते हुए आजम ने कहा, “जिसे आप लोगों ने अपना 10 सालों तक प्रतिनिधि बनाया। उसे आप लोग 17 सालों में नहीं पहचान पाए और मैं 17 दिन पहचान गया कि उसके अंडरवियर का रंग खाकी है।” आपको बता दें कि जयाप्रदा पहले सपा की नेत्री रह चुकी हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से दोनों एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए हैं।

अब तो जैसी पार्टी, वैसे समर्थक। फिर क्या था, मंच के सामने जुटे सैकडों समर्थकों ने जबरदस्त ताली और सिटी बजाई। ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय मंच पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मौजूद थे। ये वही अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने अपनी पार्टी की सांसद जया बच्चन के खिलाफ वर्तमान बीजेपी नेता नरेश अग्रवाल (पूर्व में सपा सांसद) के अभद्र बयान को देश की हर महिला का अपमान बताया था। आज खुद का सबसे बड़ा समाजवादी और लोहियावादी कहने वाले के मुंह में मानो दही जम गया हो। आज़म खान के अभद्र बयान बहुत से हैं, जिसमे उन्होंने जयाप्रदा के अलावा प्रधानमंत्री मोदी और सनातन धर्म तथा हिंदू देवी देवताओं के खिलाफ भी अभद्र टिप्पणी की है। कुछ दिन पहले उन्होंने हिंदूओं के आराध्य बजरंग बली को “बजरंग अली” कहकर संबोधित किया था।

अपने घटिया के बयान के बाद जब मामला तूल पकड़ा, तो उन्होंने सफाई देनी शुरू कर दी। उन्होंने अपनी सफाई में कहा, “मैं किसी का नाम नहीं लिया। अगर मुझ पर आरोप साबित हुए तो राजनीति छोड़ दूंगा।” लेकिन डॉ. राममनोहर लोहिया का नाम लेकर महिलाओं पर लिंगात्मक टिप्पणी करने वाले आजम को लगता है कि जनता मूर्ख है। उन्होंने अपनी भाषण में खुद कहा कि ‘जिन्होंने 10 सालों तक प्रतिनिधित्व किया’। यह बात किसे नहीं मालूम कि 2004 से 2014 तक रामपुर का सांसद कौन रहा है? इसके बाद बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने ट्वीट करते हुए कहा, “मुलयाम सिंह जी आप पार्टी के पितामह हैं। आपकी आंखों के सामने द्रौपदी का चीरहरण हो रहा है और भीष्म की तरह मौन हैं।” अपने ट्वीट में सुषमा स्वराज ने अखिलेश यादव, जया बच्चन और अखिलेश यादव की पत्नी तथा कन्नौज की सांसद डिंपल यादव को भी टैग किया।

इन सब के अलावा तत्काल राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस बयान को अपने संज्ञान में लिया और आज़म खान को नोटिस भी भेज दिया। आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा कि वो चुनाव आयोग से निवेदन करेंगी कि ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कारवाई हो, क्योंकि यह व्यक्ति बार बार घटिया बयान देता रहता है। यह व्यक्ति महिलाओं को उपभोग की वस्तु समझता है, इसलिए ऐसे व्यक्ति को सबक सिखाना जरूरी है।

बहरहाल, अब आज़म खान के खिलाफ रामपुर के जिलाधिकारी ने मुकदमा भी दर्ज करा दिया, तो अभद्र भाषा के चैंपियन आज़म, जिलाधिकारी पर ही हमलावर हो गए। जिलाधिकारी के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणी करते उन्होंने कहा, “जिलाधिकारी से मायावती की जूती साफ करवाऊंगा।”

आज़म के इस घटिया बयान पर महिला अधिकारवादी शांत क्यों हैं?

आपको मालूम होगा कि भारत में राजनीति से लेकर सामाजिक, फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया, अकादमिक, आदि हर क्षेत्रों में महिला अधिकारों पर लंबा चौड़ा लेख लिखने वाले और इसकी आड़ में एक धर्म तथा जाति विशेष पर टिप्पणी करने वालों की कमी नहीं है। इनमें कुछ नाम- स्वरा भास्कर, हुमा कुरैशी, ट्विंकल खन्ना, शेहला राशिद, बरखा दत्त, आरफा खानम शेरवानी, सोनी राजदान, आदि। इसके अलावा ‘फेमिनिस्म इन इंडिया’ के नाम से एक संगठन है, जो फेमिनिस्म की आड़ में बुर्के को महिलाओं का श्रृंगार और घूंघट को पितृसत्तात्मक सोच और गुलामी का प्रतीक बताता है। लेकिन अफसोस की बात ये कि इस निहायती बेशर्म व्यक्ति के बयान पर इनमे से किसी ने आवाज उठानी तो दूर, एक शब्द तक नहीं बोला। ये ऐसे लोग हैं कि अगर आप किसी भी महिला, मुस्लिम (पुरुष या महिला) या सवर्ण होकर दलित के खिलाफ कुछ भी बोल दें, तो आपको सांस लेना मुश्किल हो जाएगा। आपको जलील करके इतना बदनाम किया जाएगा कि एक सभ्य इंसान के रूप में आपको खुद पर शर्म आएगी। लेकिन आजम खान के खिलाफ इन्होंने सांस तक नहीं लिया।

क्या आपको पता है कि ये लोग कब अपनी आवाज बुलंद करते हैं? नहीं! चलिए हम बताते हैं। मान लीजिए कि अगर कोई महिला मुस्लिम है या हिंदू भी है, लेकिन किसी विपक्षी दल की नेत्री है और यदि उसके खिलाफ बीजेपी के किसी नेता ने आपत्तिजनक बयान दिया, तो ये लोग बिना देर किए अगले दिन से सड़कों पर आ जाएंगे, हाथों में तख्ती लेकर गिरफ्तारी की मांग करेंगे। लेकिन अगर ठीक उपर्युक्त वाक्य (अगर कोई महिला मुस्लिम है या हिंदू भी है, लेकिन किसी विपक्षी दल की नेत्री है और यदि उसके खिलाफ बीजेपी के किसी नेता ने आपत्तिजनक बयान दिया) का विपरीत होता है, तो इनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलेगा, उल्टे उस कुख्यात व्यक्ति का समर्थन करना शुरू कर देंगे।

हर पार्टी  एवं सगंठन आदि में हैं ऐसे लोग-

अब कुछ लोग कहेंगे कि क्या बीजेपी में ऐसे लोग नहीं, जो महिलाओं के खिलाफ भी गलतबयानी करते हैं? जी, बिल्कुल हैं। बीजेपी में दयाशंकर सिंह और नरेश अग्रवाल जैसे उदाहरण हैं, जो महिलाओं के खिलाफ अपनी सोच दिखा चुके हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि मायावती के खिलाफ जब दयाशंकर सिंह ने अभद्र भाषा का प्रयोग किया था, तो बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया था और तत्कालीन सपा सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया था? लेकिन इसके उलट बसपा के गुंडे समर्थक तो दयाशंकर सिंह की बेटी और पत्नी के खिलाफ घटिया शब्दों का प्रयोग करने लगे। तब उन बसपाइयों के खिलाफ कौन सी कारवाई हुई? नरेश अग्रवाल भी जिस दिन सपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए, उसी दिन उन्होंने जया बच्चन पर गलतबयानी की, तत्परता दिखाते हुए बीजेपी की वरिष्ठ महिला नेताओं सुषमा स्वराज, मेनका गांधी, स्मृति ईरानी ने उनका कड़ा विरोध किया। हालांकि, उनके खिलाफ कोई कानूनी कारवाई नहीं हुई।

ये तो हुई पार्टी की बात। अब सगंठनों पर आएं, तो खुद का शांतिप्रिय समुदाय का पुरस्कार देने वालों ने हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर जो बात कही, उसे सुनकर किसी का भी खून खौल उठेगा। हाजी अली दरगाह के ट्रस्टी ने सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में कहा था कि जब महिलाएं दरगाह में आती हैं, तो उनके स्तन दिखते हैं, इसलिए उन्होंने दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाई है। ये बात और है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि दरगाह पर जो मर्द जाते हैं, वो औरतों के स्तन को क्यों देखते हैं? ट्रस्टी साहब ने यह भी नहीं बताया कि ये उनके निजी विचार थे या ट्रस्ट के बाकी सदस्य भी स्तनखोजी प्रवृति के थे। लेकिन तब भी महिला अधिकारों की बात करने वालों ने कुछ नहीं बोला।

इतने उदाहरण हैं, जिन पर कोई हो-हल्ला नहीं हुआ। आखिर क्यों? क्या सिर्फ इसलिए, क्योंकि यह बयान एक मुस्लिम ने हिंदू महिला के खिलाफ दिया है? अक्सर देखा यही जाता है कि मुसलमान कुछ भी बोलता है, उस पर मीडिया में आउटरेज नहीं होता। मुसलमान दूसरी सबसे बड़ी आबादी होकर भी अल्पसंख्यक है, मुसलमान बाय डिफ़ॉल्ट सेक्युलर है, मुसलमान बाय डिफ़ॉल्ट द्वितीय श्रेणी का नागरिक है, मुसलमान बाय डिफ़ॉल्ट बहुसंख्यक आबादी का सताया हुआ है, मुसलमान मोदी राज में डर कर जीता है और मुसलमान यह कह कर बच निकलता है कि जया प्रदा की पैंटी का रंग क्या है।

महिला सुरक्षा और सम्मान पर हर पार्टियां तो लंबे चौड़े भाषण देती हैं, लेकिन अफसोस कि जब खुद के नेता आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं, तो उनसे ये नहीं कह पातीं कि ‘प्रभु महिलाओं पर थोड़ा संभलकर’। एक और बात- जब इन्हीं आज़म खान ने ‘भारत माता’ पर अशोभनीय टिप्पणी की थी, तब भी किसी नारीवादी और खुद पर सबसे बड़े देशभक्ति होने का ठप्पा लगाने वालों ने कुछ नहीं बोला, तो ऐसी उम्मीद करना कि वो इस मसले पर बोलेंगे, ये बेमानी होगी।