कल रविवार (सितम्बर 8, 2019) को फिरोज गाँधी की पुण्यतिथि थी। इस मौके पर उनके पोते राहुल गाँधी और पोती प्रियंका गाँधी समेत किसी कांग्रेसी ने उन्हें याद तक न किया। फिरोज गांधी इंदिरा गांधी के पति थे उसके बावजूद नेहरु-इंदिरा परिवार और कांग्रेसी दोनों फिरोज के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करते। जबकि राहुल गांधी को ‘गांधी’ सरनेम उनके दादा फिरोज से ही मिला है। फिर ऐसी बेरुखी क्यों?

राहुल और प्रियंका कल दिन भर ट्विटर पर मौजूद रहे और विभिन्न मुद्दों पर बात करते रहे लेकिन अपनी दादा की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि नही दी। प्रियंका वाड्रा ने कल मोदी सरकार के विरोध में एक कविता भी शेयर की, अर्थव्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई लेकिन उन्हें अपने दादा को याद करने की फुर्सत नही मिली।

जानकर बताते है कि, फिरोज गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले अग्रणी नेताओं में से एक थे। नेहरू काल के दौरान भी उन्होंने विभिन्न घोटालों के विरोध में आवाज़ उठाई। एलआईसी कम्पनी में हुए घोटाले के खिलाफ फिरोज द्वारा आवाज उठाए जाने के कारण तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ गया था।  दरअसल वह कांग्रेस में रहकर कांग्रेस के लिए ट्रबल मेकर रहे इस वजह से उन्हें कोई कांग्रेसी याद नही करता।

बता दें, प्रयागराज के आबकारी चौराहा स्थित ममफोर्डगंज में पारसी समुदाय के कब्रिस्तान में फिरोज गांधी की कब्र है जो आनन्द भवन से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। गांधी परिवार अकसर प्रयागराज अनन्दभवन जाता रहता है लेकिन वही बगल में स्थित फिरोज गांधी की कब्र पर फूल चढ़ाने नही जाता। कब्रिस्तान के केयरटेकर बृजलाल बताते है की यहां पर इंदिरा गांधी केवल एक बार, सोनिया गांधी दो बार और राहुल गांधी एक बार रात के वक्त आए हैं।

प्रयागराज स्थित फिरोज गाँधी की कब्र

जबकि वही गांधी परिवार और कांग्रेस राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की पुण्य तिथियों पर 12 करोड़ का विज्ञापन देती है। जहां पर इंदिरा गांधी की समाधि 45 एकड़ में बनी है वहीं पर फिरोज गांधी की कब्र पर कोई भी व्यक्ति या बकरियां आसानी से जा सकती हैं, शायद यह फिरोज का दुर्भाग्य ही है। कब्र पर सुरक्षा व्यवस्था तक के कोई इंतजाम नही हैं।

दरअसल नेहरू डायनेस्टी के लेखक के एन.राव के हवाले से दावा किया गया कि इंदिरा और फिरोज ने लंदन में एक मस्जिद में जाकर निकाह कर लिया था और इंदिरा को मुसलमान धर्म स्वीकार करना पड़ा। हालांकि एक वर्ग फिरोज को पारसी बताता है क्योंकि माँ पारसी समुदाय से थीं, जबकि एक धड़ा यह मानता है कि फिरोज के पिता जहांगीर मुसलमान थे। इस लिहाज फिरोज मुसलमान हुए।

बता दें, फिरोज  के पिता का नाम जहांगीर और माता का नाम रति माई था। फिरोज के पिता जहांगीर मुसलमान और माता पारसी थी। फिरोज की मां का इंतकाल हो जाने के बाद फिरोज का लालन-पालन उनकी मौसी ने किया जो तत्कालीन इलाहाबाद और वर्तमान में प्रयागराज में स्थित एक बड़े अस्पताल में नर्स का कार्य करती थी।

रायबरेली से सांसद रहे फिरोज का नाम कांग्रेस के कद्दावर, ईमानदार, जुझारू और संघर्षशील नेताओं में है परंतु शायद ये फिरोज  का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ना तो उनकी कब्र पर कभी उनके पुत्र राजीव गांधी गए और ना ही कभी संजय गांधी गए। पत्नी इंदिरा गई भी तो केवल एक बार।

राजनीति से जुड़े पुराने पत्रकार बताते है कि एक बार जनता पार्टी की सरकार के दौरान जब संजय गांधी को गिरफ्तार किया गया था तो सरकारी वकील के द्वारा संजय गांधी से उनके पिता का नाम पूछा गया तो संजय गांधी ने पिता की जगह पर इंदिरा गांधी का नाम दो बार बताया। सरकारी वकील के द्वारा पूछने पर जब संजय गांधी इंदिरा गांधी का नाम लेते रहे तो तीसरी बार मजिस्ट्रेट ने स्वयं सरकारी वकील से पिता का नाम पूछने के लिए मना कर दिया।

यह घटना फिरोज जहांगीर के अपने ही परिवार में हैसियत के बारे में काफी कुछ बयान करती है, फिलहाल पारिवारिक कारण चाहे जो कुछ भी हो लेकिन इसे फिरोज का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज जो सम्मान गांधी परिवार के द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को मिलता रहा है, वह सम्मान स्वयं उनकी पत्नी और बच्चों के द्वारा फिरोज को नहीं मिल पाया।

राजनीतिक विश्लेषको के मुताबिक इसका कारण यह है कि यदि राहुल गांधी या उनके परिवार का कोई सदस्य वहां पर जाता है तो यह चर्चा का विषय बनेगा और चर्चा में फिरोज के पिता जहांगीर भी आएंगे। उनका चर्चा में आना गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। वह भी तब जब कांग्रेस साफ्ट हिंदुत्व का चेहरा बनने की कोशिश कर रही हो।