दिग्गज भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) को इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) के हॉल ऑफ फेम (Hall Of Fame) में शामिल किया गया है। उनके अलावा दक्षिण अफ्रीका के लेजंड क्रिकेटर एलन डॉनल्ड और ऑस्ट्रेलिया की पूर्व महिला पेसर कैथरीन फिट्जपैट्रिक को भी आईसीसी हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया है।

लंदन में गुरुवार को हुए एक समारोह में इन तीनों दिग्गजों को यह सम्मान दिया गया। सचिन हॉल ऑफ फेम में शामिल होने वाले छठे भारतीय क्रिकेटर हैं। उनसे पहले आईसीसी ने क्रिकेट हॉल ऑफ फेम में पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी, वर्ल्ड कप विजेता कप्तान कपिल देव, दिग्गज सुनील गावस्कर, राहुल द्रविड़ और अनिल कुंबले को शामिल किया था।

सचिन पश्चिम के क्रिकेट जगत के लिए हमेशा एक पहेली बनकर रहे। पश्चिम ने सचिन को हमेशा से सूक्ष्म तरीके से उतारने की कोशिश की है। जैसे, विज़डन की महानतम सौ पारियों में उनकी किसी पारी को स्थान नहीं दिया या हाल आफ फेम में दो अन्य खिलाड़ियों के साथ उन्हें रखा। परंतु यह सब व्यर्थ साबित होने वाला है ।

सचिन के रिटायरमेंट के बाद से ही उनके आलोचक लगातार यह सवाल पूछा करते थे कि सचिन अभी तक hall of fame में क्यों शामिल नहीं किए गए ? अब आलोचकों को कौन समझाए की खेल से विदा होने के न्यूनतम पांच वर्ष बाद ही उसकी पात्रता बनती है। आलोचकों की बात पर आश्चर्य तो यह है कि संसार में बल्लेबाजों की भला वह कौन सी श्रेणी है जिसमें गौरव के साथ खड़े होने के लिए सचिन को जोर लगाना पड़े !!! परंतु पश्चिम के क्रिकेट पंडितों ने सचिन को हमेशा एक शंका, भय और आत्महीनता के घावग्रस्त अहं से देखा है। क्यों?? क्योंकि, साढ़े पांच फुट के इस भारतीय बल्लेबाज ने पुरुषार्थ और प्रभुत्व की हरक्यूलियन मांसलता को ध्वस्त कर के रख दिया था।

आप कह सकते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप से सुनील गावस्कर और जावेद मियांदाद जैसे छोटे कद के बल्लेबाज पहले यह काम कर चुके हैं । मैं कहूंगा संभवतः हां, संभवतः नहीं । क्योंकि सचिन एकदिवसीय क्रिकेट में भारत के कान्तिहीन बल्लेबाज़ी क्रम को तोड़ने वाले पहले बड़े बल्लेबाज थे जिसने ऊंची कद काठी के हट्टे कट्टे पठानों और अंग्रेजों को अपनी लयात्मक विस्फोट से स्तब्ध कर दिया था। वह भी आश्चर्यजनक निरंतरता के साथ।

सचिन में रूढ़ रौद्र नहीं था अपितु वर्षों के तपन से निखरी प्रतिभा की थी। वह पदचाप के साथ अपना सिर स्थिर रखते थे। जैसे कोई धनुर्धर लक्ष्यबेध से पहले समाधिस्थ हो जाता है। बल्ले का फालोथ्रू ऐसा कि कैमरे वाले चमत्कृत होकर क्लिक करते रहते और गेंद बाहर चली जाती। भारतीय दर्शकों ने पहले भी शोर किया था, तालियां बजाईं थीं लेकिन स्टेडियम में वैसा उल्लास पहले कभी नहीं था। सचिन भारत के प्रतिगामी क्रिकेट को अपने पराक्रम से खींचकर बाहर लाने वाले पहले चमत्कारी बल्लेबाज थे। क्रिकेट के मैदान पर उनकी आभा अलग है।

सन 2002 में ईएसपीएन ने विश्व के पच्चीस महानतम क्रिकेटरों की एक श्रृंखला बनाई थी जिसमें बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों ही शामिल थे। उस श्रृंखला में सचिन को सर डॉन के बाद दूसरा स्थान दिया गया था। रिचर्ड्स और सोबर्स जैसे दिग्गजों से ऊपर।

सचिन एक चैंपियन बल्लेबाज थे और पूरी लय में उन्हें खेलते हुए देखने का अनुभव अलौकिक था। शाट्स खेलते हुए वैसा शारीरिक संतुलन उस दौर के किसी बल्लेबाज के पास नहीं था। समय बीत जाने पर या एक नए दौर के सितारों के साथ लोग पुराने दिग्गज को भूलने की चेष्टा करते हैं। यह सहज मानवीय स्वभाव है। भारत में इसकी सघनता है। परंतु ऐसा कोई भारतीय स्वभाव या पश्चिमी कुंठा सचिन को छोटा नहीं कर पाती। स्वयं पोंटिंग, लारा और कैलिस संयुक्त रूप से कहते पाए गए हैं कि उनमें से कोई भी सचिन नहीं बन सका।