अवंतिपोरा में जिस फिदायीन आतंकी आदिल अहमद डार ने देश के 40 वीर जवानों की जानें ले लीं, उसके समर्थन में देश के कुछ बुध्दिजीवी खड़े हो गए हैं और कह रहे हैं कि वो आतंकी क्यों बना? इस पर सरकार को सोचना चाहिए।

श्रीनगर के रहने वाले पत्रकार सफ़वत ज़रगर ने न्यूज पोर्टल Scroll.In में एक बहुत ही लंबा चौड़ा लेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने थोड़े में हमले और उसके बाद की स्थिति का वर्णन किया है। आपको बता दें कि हमले के बाद आतंकी संगठन ‘जैश-ए-मोहम्मद’ ने आदिल अहमद डार का एक 9 मिनट का वीडियो जारी किया था, जिसमें वह यह कहते हुए नज़र आ रहा था- “जब तक ये वीडियो संदेश आप लोगों को तक पहुंचेगा, तब तक मुझे जन्नत नसीब हो चुकी होगी।” इस वीडियो में उसने आगे कहा है कि वो इस्लाम की लड़ाई लड़ रहा है, उस पर अत्याचार हुआ है। वही लड़ाई, जो इराक, सीरिया, फिलिस्तीन आदि देशों में चल रही है। ये सभी तो इस्लामिक देश हैं। क्या इन सब देशों में भी उनके साथ अत्याचार हुआ?

अब इसके बाद नौवें पैरा से पत्रकार महोदय ने शहीदों कि चिंता छोड़ ‘वो आतंकी कैसे और क्यों बना?’ इस पर उसके सम्मान में कसीदे गढ़ने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने लिखा कि हमले के कुछ देर बाद स्थानीय निवासी पुलवामा के गुंडीबाग स्थित आदिल के घर पर इकट्ठा होने लगे और सभी ने आतंकी के समर्थन में अपने अपने विचार रखे।

इसके बाद लेख में सफ़वत ने आदिल के पिता के बयान का जिक्र किया है। उसके पिता के अनुसार, “वह पढ़ने में बहुत होनहार था। उसने 12वीं तक पढ़ाई की थी, उसके बाद वह मौलवी बनना चाहता था।” इसके बाद सफ़वत ने उसके आतंकी बनने कारण लिखा है। उसने लिखा है- “2016 में एक बार वह विद्यालय से पढ़कर घर लौट रहा था। रास्ते में उसे एसटीएफ वालों ने रोक लिया और उसकी नाक को जमीन पर रगड़वाया। उसके बाद सुरक्षाबलों ने उस पर दबाव बनाया कि वो अपनी नाक से उनकी जीप के चारों तरफ गोला बनाए।” इस लेख में आगे लिखा है- “वह अपने साथ हो रही इस घटना को ध्यानपूर्वक देख रहा था।”

वेबसाइट के अनुसार, आतंकी आदिल डार 8 जुलाई 2016 को मारे गए हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के जनाजे में भी शामिल हुआ था, जहां सेना की फायरिंग में उसके पैर में गोली लगी थी। अब इन लोगों का कहना है कि सेना ने उस पर इतना अत्याचार किया कि वो आतंकी बन गया। मतलब इनकी बातों पर गुस्सा तो आता ही है, साथ ही हंसी भी आती है।

हमेशा राष्ट्रविरोधी तत्वों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले वकील प्रशांत भूषण ने भी उस आतंकी के समर्थन में ट्वीट कर कहा कि सोचने वाली बात है कि इतने बड़े पैमाने पर युवा आतंकी क्यों बन रहे हैं? भूषण के ऐसे घटिया स्तर के ट्वीट पर सेना के सेवानिवृत्त मेजर डॉ. सुरेंद्र पुनिया ने उन्हें आड़े हाथों ले लिया। मेजर पुनिया ने कहा, ‘शकुनि मामा, अपने भांजों को सेना के खिलाफ मत भड़काओ।’

इनके अलावा Scroll.In की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा ने उपरोक्त लेख को अपने ट्विटर हैंडल से शेयर कर इशारों इशारों में आदिल के आतंकी बनने पर सेना और सरकार को दोषी ठहराया है। इन सब के अलावा आपको इस समय सोशल मीडिया पर तमाम तरह के ऐसे अकाउंट्स मिल जाएंगे, जिनसे आदिल डार के आतंकी बनने पर दुख जताया जा रहा है और जवानों की शहादत पर जश्न।

इन सभी लोगों के तर्कों के अनुसार चलें, तो सबसे पहले आतंकी तो उन कश्मीरी पंडितों को बन जाना चाहिए, जिनके साथ भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा और दर्दनाक नरसंहार और दुष्कर्म हुआ। उनकी औरतों को नोचा गया। साढ़े चार लाख कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया गया। मस्जिदों से उनकी महिलाओं के खिलाफ भद्दे भद्दे नारे लगाए जाने लगे। रातों रात सभी पंडितों को कश्मीर छोड़ अपनी जान बचाकर दिल्ली आकर रहना पड़ा। आज भी वे शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं, उनका सबकुछ छिन गया। तत्कालीन सरकार ने उनकी खोज खबर तक नहीं ली। शरणार्थी शिविरों में उनकी दो-दो पीढ़ियाँ गुजर गयीं। आज भी वो अपने हक़ पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे आतंकी क्यों नहीं बने?

आतंकी तो उन युवाओं को भी बन जाना चाहिए, जो सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि उनको भी पुलिस निर्ममता से मारती है। ये लोग आतंकी क्यों नहीं बनते? क्या इसका जवाब है इन लोगों के पास? ये लोग मोदी विरोध में अपना होश खो बैठे हैं। कुछ भी हो, बस आंख बंद करके मोदी विरोध में सेना को गाली देना है।

बुध्दिजीवियों की तर्कों पर आगे ग़ौर करें, तो क्या यहुदियों को आतंकी नहीं बनना चाहिए? जर्मनी ने उन पर लगभग एक हजार साल तक अत्यचार किया। यातना शिविरों में उन्हें असंख्य असहनीय यातनाएं दी गई। फिर भी वे आतंकी नहीं बने, बल्कि आज उनकी गिनती दुनिया के समृद्धशाली समुदायों में होती है। क्यों? क्या इसका जवाब है आतंकियों के हमदर्दों के पास?

आज देश 40 जवानों की शहादत से गमजदा है, लेकिन हमारे देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें जवानों के बलिदान से ज्यादा चिंता इस बात की है कि कश्मीर के युवा आतंकी क्यों बन रहे हैं। इसका जिम्मेदार वे लोग कश्मीरियों को ना बताकर सेना और सरकार को ठहरा रहे हैं। ये सभी लोग बुध्दिजीवी वर्ग से हैं, बड़े बड़े सेमिनार में सम्मिलित होते हैं। इन्हें ये बात अवश्य मालूम होगी कि सबसे ज्यादा बजट जम्मू कश्मीर को ही आवंटित किया जाता है। हालांकि, आबादी के हिसाब से सबसे ज्यादा बजट उत्तर प्रदेश को मिलना चाहिए। जब सरकार इन पर 10 रुपए की बजाय 100 रुपए खर्च करती है, फिर भी ये लोग आतंक का रास्ता चुन रहे हैं, तो दिक्कत सरकार और सेना में नहीं, दिक्कत आतंकी बनने वालों में ही है।

1 COMMENT

  1. गोली खाने वाला रामभक्त नहीं भटका
    मालदा से पलायन करने वाला नहीं भटका
    कैराना से पलायन करने वाला नहीं भटका
    आसाम से पलायन करने वाला नहीं भटका
    कश्मीर से पलायन करने वाला नहीं भटका
    फिर
    पढ़ा-लिखा खाता-पीता अहमद क्यों भटका?

    मूल कारण जानना चाहते हैं तो मात्र एक दिन गुजारिये किसी मदरसे में. . . . .

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