यदि ये कहा जाये कि विवाह मनुष्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। विशेषकर सनातन हिन्दु धर्म में तो विवाह मनुष्य जीवन के सोलह संस्कारों में से एक है जो मनुष्य को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कराकर उसके पारिवारिक जीवन का प्रारम्भ करवाता है। परिवार ही समाज का आधार होता है। पारिवारिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य श्रम करता है। श्रम करने वाला मनुष्य कर के रूप में जो धन चुकाता है, उसी से शासक पूरी जनता और राष्ट्र के विकास के लिए कार्य करते हैं। श्रम करके धन कमाने वाले मनुष्य की दान-दक्षिणा से ही धर्म-कार्य होते हैं और सन्यासी एवं ब्राह्मण वर्ग का जीवन-यापन होता है। महाभारत में तो ये भी कहा गया है कि धरती पर जितने भी कार्य होते हैं, उन सभी के मूल में गृहस्थ धर्म ही है। सनातन धर्म में मनुष्यों के लिए निर्धारित चार आश्रमों में से केवल गृहस्थ आश्रम ही ऐसा एकमात्र आश्रम है जिसमें मनुष्य धन कमाने के लिए उद्यम करता है। गृहस्थ आश्रम में ही मनुष्य विवाह करके संतान उत्पन्न करता है जो कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति और कार्य को संभालती है। इसीलिए महाभारत में गृहस्थ आश्रम को धर्म का आधार तक कहा गया है।

पुराने समय में हिन्दुओं में विवाह की आयु प्रायः पुरुषों के लिए पच्चीस वर्ष और महिलाओं के अठारह वर्ष हुआ करती थी। हालांकि इस बारे में प्रामाणिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन तुलसी कृत रामचरित मानस और कुछ अन्य धार्मिक पुस्तकों में विवाह की यही आयु दर्शायी गयी है। प्रामाणिक रूप से यह कहना भी मुश्किल है कि हिन्दुओं में बाल-विवाह की प्रथा कब और कैसे प्रचलन में आयी। पर आधुनिक काल में कुछ विद्वान इसके लिए विदेशी आक्रमणकारियों को जिम्मेदार मानते हैं। उनके अनुसार तब हिंदु अपने घर की बच्चियों को उनकी बुरी नज़र से बचाने के लिए बचपन में ही उनका विवाह तय कर देते थे। वर्तमान समय में संविधान द्वारा विवाह करने के लिए निर्धारित आयु पुरुषों के लिए इक्कीस वर्ष और महिलाओं के लिए अठारह वर्ष है। लेकिन वर्तमान समय की परिस्थितियों के अनुसार यह आयु भी मात्र वयस्कता की ही है। इस आयु में स्त्री-पुरुष शारीरिक रूप से तो विवाह करने के लिए योग्य होते हैं पर विवाह के उपरांत बनने वाली जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए परिपक्व नहीं। अठारह वर्ष की उम्र तक तो बच्चों की स्कूली शिक्षा चलती है और इक्कीस वर्ष की उम्र तक स्नातक की।

यही कारण के कि वर्तमान समय में पति-पत्नी के बीच वैमनस्य और तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, फिर चाहे वो प्रेम विवाह हो या व्यवस्था विवाह। विशेषकर प्रेम विवाह में ऐसी स्थितियाँ अधिक बनती हैं क्यों कि कई युवा माता-पिता और परिवार की सहमति प्राप्त ना होने पर कोर्ट मैरिज या भागकर शादी कर लेते हैं। तिस पर भी वर्तमान समय में फोन, मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया इत्यादि का अब मानव जीवन का अभिन्न अंग बन जाने के बाद ऐसे मामलों में वृद्धि हुई है। अक्सर माँ-बाप और परिवार के अन्य सदस्यों को ये पता ही नहीं चलता कि उनके बच्चे कब, किससे क्या बातचीत कर रहे हैं और उसका उनके मन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। और जब पता चलता है, तब तक बहुत देरी हो चुकी होती है। यदि बाद में ये शादियाँ टूट जाती हैं, तो ऐसी स्थिति में महिलाओं पर असुरक्षा का सबसे अधिक खतरा रहता है। और यदि तब तक बच्चे भी हो चुके हों तो उनके जीवन पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कुछ असामाजिक तत्वों का तो काम ही लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाकर और शादी का झांसा देकर उनका शोषण करना होता है। तो कुछ लोग प्रेम का स्वांग केवल संपत्ति हासिल करने के लिए ही करते हैं। खासकर सरकार द्वारा क़ानून में परिवर्तन करके लड़कियों को भी पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार प्रदान करने के बाद से ऐसे मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है। वर्तमान समय में एक समुदाय विशेष के कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों द्वारा दूसरे समुदायों खासकर हिंदू धर्म की लड़कियों को अपनी असली पहचान छिपाकर और उन्हें प्रेम जाल में फँसाकर उनका शोषण करने, धर्म परिवर्तन करने और उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा करने के कई मामले सामने आये हैं। यब सब योजनाबद्ध तरीके से पिछले कई वर्षों से चल रहा है पर पिछले कुछ समय से ही समाज में इस पर खुलकर चर्चा होना चालू हुआ है।

राष्ट्रीय स्तर की महिला निशानेबाज तारा सहदेव का प्रकरण इन मामलों में सबसे चर्चित प्रकरण रहा है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में एक महिला बैंक अधिकारी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। हद तो ये है कि ऐसे विकृत मानसिकता वाले पुरुषों के निशाने पर शादीशुदा महिलाएं भी रहती हैं। अभी महज कुछ महीने पहले केरल में एक विवाहित महिला पुलिस अधिकारी की एक व्यक्ति ने इसीलिए दिन-दहाड़े हत्या कर दी थी कि वो अपने पति और बच्चों को छोड़कर उस व्यक्ति से शादी करने के लिए तैयार नहीं थी। यदि अब कोई भी गूगल सर्च करे तो ऐसे कई मामलों की ख़बरें पढ़ने को मिल जाती हैं। समुदाय विशेष के युवक विवाह के बाद महिलाओं का शोषण करके उनकी संपत्ति हथिया कर उन्हें तलाक भी दे देते हैं। तो कई बार उन्हें बेच भी देते हैं और उनकी हत्या तक कर दी जाती है। ऐसे घृणित मानसिकता वाले अपराधियों की सच्चाई समझ में आने तक उन महिलाओं का जीवन नर्क बन चुका होता है। दुःख की बात तो ये है हमारे देश के कुछ राजनीतिक दल, तथाकथित बुद्धिजीवी और पत्रकार भी अपने निहित स्वार्थों के कारण ऐसे असामाजिक तत्त्वों का समर्थन करते हैं। यहाँ तक की कोर्ट भी ऐसा फैसला दे चुके हैं कि धर्म परिवर्तन के बाद भी महिला का उसके माता-पिता की संपत्ति में अधिकार बना रहेगा। भारतीय कानून की कुछ कमियों का फायदा उठाकर समाज विरोधी तत्त्व अपने कुत्सित कार्य करते रहते हैं। इस तरह की घटनाओं से विभिन्न समुदायों में तनाव फैलता है और कई बार हिंसा भी हो जाती है।

अतः इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ये आवश्यक है की सभी भारतीय नागरिक और खासकर हिन्दु अपने जातिगत और आपसी मतभेद भुलाकर भारत सरकार से शांतिपूर्ण तरीके से आग्रह करके विवाह सम्बन्धी कानूनों में निम्नलिखित सुधार करने की माँग रखें।

1. विवाह करने की कानूनन न्यूनतम आयु को बढ़ाकर महिलाओं के लिए इक्कीस वर्ष और पुरुषों के लिए तेईस वर्ष किया जाये।

2. यदि कोई युवा अपने परिवार के विरोध में जाकर या सहमति से भी यदि किसी दूसरे जाति या धर्म के लड़के या लड़की से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें स्थानीय जिला न्यायालय और थाने में इसकी पूर्व सूचना और लड़का-लड़की का पूरा विवरण जैसे कि नाम, पता, शैक्षणिक योग्यता और आय के साधन आदि सही कागजातों के साथ कम से कम तीन महीने पहले देना अनिवार्य हो। और ये नियम सभी प्रकार के विवाह पर लागू हो फिर चाहे वो कोर्ट मैरिज करें या किसी धार्मिक स्थल से शादी करें।

3. यदि ये विवाह दोनों पक्षों की आपसी सहमति से हो रहा है तो भी उनके विवाह में दो सरकारी अधिकारी और दोनों पक्षों के कम से कम दो-दो व्यक्ति उपस्थित हों।

4. यदि इस विवाह के लिए लड़के के या लड़की के या दोनों के माता-पिता और परिवार वाले सहमत ना हों तो उनको न्यायालय के सामने उनका पक्ष रखने का अवसर दिया जाये। और उनको अपने बच्चों से एक बार किसी परिवार परामर्श केंद्र के अधिकारी की उपस्थिति में बात करने का अवसर भी दिया जाये। यदि इसके बाद भी लड़का या लड़की या दोनों विवाह करने की जिद पर अड़े हुए हों तो और उनके माता-पिता और परिवार इस विवाह के लिए सहमत ना हों तो उनके माता-पिता और परिवार को उनको कानूनन अपनी संपत्ति में से बेदखल करने का और कानूनी रूप से उनसे सभी रिश्ते तोड़ने का अधिकार हो।

5. बिना उपर्युक्त शर्तों को पूरा किया हुए, बिना न्यायलय को पूर्व सूचना और पूरा विवरण दिए हुए किसी भी धार्मिक स्थल से किये गए किसी भी प्रकार के अंतर्जातीय और दूसरे धर्म के लड़के या लड़की से किये गए विवाह को कानूनी रूप से अमान्य माना जाये।

6. कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन को भी कम से कम तीन महीने पहले देना अनिवार्य किया जाये। और कोर्ट मैरिज में भी यदि शादी माँ-बाप और परिवार वालों की असहमति से हो रही हो तो भी दोनों पक्षों के कम से कम दो-दो व्यक्तियों की उपस्थिति अनिवार्य हो और माँ-बाप और परिवार को इस स्थिति में भी अपने लड़के या लड़की या दोनों को संपत्ति में से बेदखल करने और उनसे सारे रिश्ते तोड़ने का कानूनन अधिकार हो।

7. उपर्युक्त कानून केवल अंतर्जातीय और दूसरे धर्म के लड़के या लड़की से विवाह की स्थिति में लागू हों।

8. सभी प्रकार की शादियों का पंजीकरण कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया जाये चाहे वो जातीय, अंतर्जातीय या दूसरे धर्म में हों। एक ही धर्म और एक ही जाति में होने वाली शादियों की पूर्व सूचना भी कम से कम एक महीने पहले देना अनिवार्य हो। यहाँ भी न्यायालय में लड़के और लड़की का पूरा विवरण जैसे कि नाम, पता, शैक्षणिक योग्यता और आय के साधन आदि सही कागजातों के साथ दिए जायें।

9. उपर्युक्त सभी कानून लड़का और लड़की दोनों पर और उनके परिवारों पर समान रूप से लागू हों।

इस लेख से मेरा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति विशेष या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का नहीं है। यहाँ मेरा उद्देश्य केवल विवाह के नाम पर हो रही धोखाधड़ी और अपराधों को रोकने का है। ऐसा नहीं है कि धोखाधड़ी सिर्फ अंतर्जातीय और दूसरे धर्म में विवाह करने पर होती है। समान जाति और समुदाय में भी कुछ लोग लड़के और लड़की और उनके परिवार के सम्बन्ध में गलत जानकारी देकर विवाह कर लेते हैं और बाद में ये शादियाँ टूट जाती हैं। कितनी ही लड़कियों का जीवन इसलिए बर्बाद हो गया कि लड़के वालों ने लड़के की शैक्षणिक योग्यता और आमदनी की गलत जानकारी देकर शादी करा ली। ऐसे ही कुछ महिलाओं ने भी दहेज विरोधी कानून का दुरूपयोग कर कई परिवारों को तबाह कर दिया। पिछले वर्ष मध्य प्रदेश में एक बैंक अधिकारी महिला से धोखे का प्रकरण चर्चा में था। पुलिस के अनुसार युवक उत्तर प्रदेश का रहने वाला था और अपनी प्रेमिका को अपनी बहन बताकर पहले भी कई शादियाँ कर चुका था।

इस तरह के सारे प्रकरणों में कई परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं। पुनः कहूँगा कि परिवार से ही समाज बनता है और समाज से देश। अतः मेरा सभी पाठकों से निवेदन है कि इस लेख में प्रस्तुत सुझावों पर चिंतन करें और यदि आप उनसे सहमत हैं तो समाज की भलाई के लिए इन्हें कानून का रूप देने के लिए सरकार तक पहुँचाने में अवश्य योगदान दें।

लेखक अमित सोनी ब्लॉगर है, यहाँ क्लिक कर आप उन्हें ट्विटर पर फॉलो कर सकते है