उत्तर प्रदेश के मथुरा में मजहबी उन्मादियों द्वारा की गई लस्सी विक्रेता भरत यादव की हत्या के बाद राज्य सरकार ने भरत यादव के परिजनों को 2 लाख रुपए का चेक सौंपा है। राज्य सरकार के इस कदम के बाद यह सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या भरत यादव के जान की कीमत मात्र 2 लाख रुपए ही है?

दरअसल, 25 मई 2019 की रात को मथुरा के चौक बाजार पर शाहरुख और हनीफ ने अपने मजहबी दोस्तों संग मिलकर लस्सी के पैसे मांगने पर विक्रेता भरत यादव और पंकज यादव पर धारदार हथियार से हमला कर दिया था, जिसमे पंकज यादव को गंभीर चोटें आई थीं और भरत यादव की मौके पर ही मौत हो गई थी। अब राज्य सरकार ने भरत यादव के परिजनों को 2 लाख रुपए का चेक सौंपा है। मथुरा के विधायक व ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने भरत यादव के घर पहुंचकर परिजनों को यह राशि सौंपी।

अखलाक को 45 लाख रुपए+फ्लैट+नौकरी और भरत यादव को मात्र 2 लाख रुपए?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यहां धर्म और जाति देखकर आर्थिक या अन्य प्रकार की कोई सहायता क्यों की जाती है? ज्ञात हो कि वर्ष 2015 में नोएडा के दादरी में घर में गाय का मांस रखने के आरोप में मारे गए अखलाक के परिजनों को राज्य की तत्कालीन सपा सरकार ने 45 लाख रुपए दिए थे। इसके अतिरिक्त अखिलेश सरकार ने अखलाक के परिवार के एक सदस्य को नौकरी और चार फ्लैट्स भी दिया था।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यूं तो हमेशा अपनी राजनीति चमकाने के लिए ओबीसी, दलित और मुस्लिमों के लिए बोलते हैं, लेकिन यहां यादव बिरादरी के ही युवक की हत्या हो गई और अखिलेश यादव अभी तक उस पीड़ित परिवार की मदद नहीं कर पाए। सिर्फ इसलिए क्योंकि अपराधी मुस्लिम हैं और मदद करने से कहीं वोटबैंक ना खिसक जाए। वर्तमान की बीजेपी सरकार ने मात्र 2 लाख रुपए की सहायता प्रदान की। चूंकि, ये मदद बढ़कर 5 या 10 लाख रुपए भी हो सकती थी, लेकिन ‘सबका विश्वास’ योजना पर कहीं धब्बा ना लग जाए, शायद इसलिए यह राशि 2 लाख रुपए ही रखी गई।

इसके अलावा अभी हाल ही में झारखंड में तबरेज अंसारी नाम के एक चोर की लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। तबरेज के परिवार को अभी तक 27 लाख रुपए मिल चुके हैं और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल धर्म देखकर वक्फ बोर्ड में नौकरी देने का भी वादा कर चुके हैं, जबकि मजहबी उन्मादियों की नफरत का शिकार हुए डॉ. नारंग, अंकित सक्सेना, ध्रुव त्यागी का परिवार अभी भी दिल्ली सरकार की तरफ से आर्थिक सहायता की राह देख रहा है। तबरेज अंसारी की हत्या से पहले की हैं।

बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव अपने हर ट्वीट में एससी, एसटी और ओबीसी का जिक्र करते हैं, लेकिन इस मामले में ना उनका कोई ट्वीट आया और ना ही मीडिया के माध्यम से कोई बयान। क्योंकि अपराधी विशेष समुदाय से हैं। मथुरा और दिल्ली के ध्रुव त्यागी जैसे मामलों पर अगर इन लोगों की राय पूछो, तो ये लोग तुरंत उसे कानून व्यवस्था का मामला बताते हुए इससे किनारा कर लेंगे, लेकिन अगर पीड़ित मुस्लिम हो तो यही लोग तुरंत ‘असिहष्णुता’ और ‘मुसलमानों पर अत्याचार’ का राग अलापने लगते हैं।

हमेशा से ही इस देश में खुद को सेक्यूलर कहने वाले नेताओं के द्वारा हिंदुओं के साथ भेदभाव क्यों होता रहा है? क्या इन नेताओं को हिंदू वोट नहीं देते हैं? हमारे इन प्रश्नों के जवाब में आप कह देंगे कि पैसों से किसी की जान वापस नहीं आती है, तो फिर एक बात बताइए। जब पैसों से किसी की जान वापस नहीं आती, तो आखिर क्यों मुस्लिमों की हत्या पर उनके परिवार वालों पर पैसों की बारिश कर दी जाती है? इसे हम भेदभाव ना कहें तो क्या कहें?

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