EVM मामले में भ्रम फैलाने की वजह साफ़ है। एग्ज़िट पोल की बात तो छोड़ दीजिए, इन दलों को अपनी चादर की लम्बाई पता है पहले से.. ये अपनी सम्भावित हार नहीं स्वीकार करना चाहते हैं क्योंकि बिना किसी प्लान के, बिना किसी रणनीति के चंद हवाहवाई आरोपों की सीढ़ियों के सहारे ये सत्ता का सुख पाने का सपना जो देखते रहे हैं। मूल मुद्दों से दूर पूरे चुनाव में दोनों तरह से अपशब्दों का ही इस्तेमाल हुआ तो प्रचार के तरीक़े पर बात करना ही बेकार है।

चुनाव लड़ने की कितनी तैयारी की इन्होंने? इससे सबकुछ स्पष्ट हो जाता है। पिछले ५ सालों में किसानों को भड़काकर सड़क पर लाने के एक दो मौक़ों को छोड़ दीजिए तो ये तमाम नेता कितनी बार जनता के मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरे। एसी में बैठकर ट्वीट करते रहे और गाहे-बगाहे कुछ नेताओं से मिल लिए। लगभग १ एक साल में तीसरा मोर्चा ना बना क्योंकि इसमें सबका स्वार्थ टिका था। अभी EVM पर सवाल उठा रहे और खंडित जनादेश आया तो क्या सरकार बनाने का मोह छोड़ देंगे? कभी नहीं.. फिर EVM अच्छी हो जाएगी न।

परिणाम अभी आया नहीं है तो इसपर कोई बात करना ठीक नहीं लेकिन जो विपक्ष के हाव-भाव हैं, उसे देखकर लगता है कि कुछ गुंजाईश बची नहीं है। चुनाव आयोग के बार-बार सफ़ाई देने के बाद भी नए तरीक़े से भ्रम फैलाकर जनता को सड़क पर उतरने के लिए तैयार किया जा रहा है। इन दलों की भरपूर मदद मीडिया में बैठे वो लोग भी कर रहे हैं जो हर बात के फैक्ट चेक करते हैं, लेकिन इस मामले में किसी अधिकारी से बात तक किए बिना मनमाफ़िक़ ख़बरें परोस रहे हैं, ताकि EVM पर संदेह गहराता रहे और बैलेट वोटिंग हो जहाँ कि इनके ‘कर्मठ’ नेताओं और समर्थकों द्वारा घर में बैठकर और खेत में बक्शा ले जाकर वोट दे दिया जाये, गाँव के गाँव का।

EVM की तकनीकी ख़ामियों से निपटने को लेकर इन नेताओं ने कोई पहल की? इसपर सत्ता पक्ष और बाक़ी सबको साथ लेकर बात करने की कोशिश की? तकनीक काम को आसान बनाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है लेकिन यहाँ तो नाख़ून काटकर शहीद होने का दाँव खेला जा रहा है। कभी EVM हैक तो कभी EVM लूट तो कभी कुछ। जनता के लिए लड़ने की बातें यही कर रहे हैं जो जनता के मत को नकार रहे क्योंकि ये प्रपंच से लड़ाई जीतना चाहते हैं। उपेन्द्र क़ुशवाहा कहते हैं कि ज़रूरत पड़े तो हथियार भी उठाओ। नतीजों से पहले ऐसे बयान कौन सा माहौल बनाने के लिए दिए जा रहा है?

विरोध है EVM पर तो विपक्ष के सभी वर्तमान सांसदों-विधायकों को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। कांग्रेस और सहयोगी दलों के साथ बनाई सरकारों को भंग कर देना चाहिए। लेकिन नही होगा.. अराजकता फैलाने की कोशिश करेंगे, भ्रम पैदा करने की कोशिश करेंगे और एजेंडा सेट करेंगे। अगर विपक्ष इसी पर आमादा है तो सेना के हाथों में कमान सौंप दी जाए कुछ दिन? क्योंकि विपक्ष ना कोर्ट को मानता है, ना क़ानून, ना संविधान और ना किसी संस्था को मानता है। इनके अनर्गल प्रलापों को कब तक एजेंडा और आत्मसंतुष्टि के लिए चलाएँगे आप लोग? आख़िर कब सत्ता की ख़िलाफ़त के नाम पर ‘आत्म-सुख’ के लिए आमलोगों को बलि का बकरा बनाएँगे, इससे बदलाव आएगा या हालात और ख़राब होंगे, विचार करने की ज़रूरत है।

 

युवा पत्रकार कमल तिवारी की फेसबुक वॉल से।