जिनके दिलों में नफरत कूट कूट कर भरी हो उन्हें प्रेम की भाषा भी नफरत भरी लगती है। ऐसा ही एक वाकया ट्विटर पर हुआ जब देश के प्रधानमंत्री को सांप कहकर सिर्फ  इसलिए सम्बोधित किया गया की उन्होंने भगवा वस्त्र धारण कर रखे हैं।

जॉय दास नाम के ट्विटर हैंडल ये शख्स बंगाल की उस धरती से है जिस पर सुभाष चंद्र बोस जैसे देशभक्त और स्वामी विवेकानंद जैसे सनातन धर्म के ध्वजावाहक जन्मे थे।

ये शख्स अपनी नफरत की आग में इतना अंधा हो गया कि इसने प्रयागराज कुंभ के दौरान सफाई कर्मचारियों के चरण धोकर उनके काम को सम्मान देने का प्रयास करने वाले भारत के प्रधानमंत्री की तुलना केरल के मुख्यमंत्री पिन्नरीविजयन के द्वारा लांच मेनहोल साफ करने वाले रोबोट से कर दी। ये सब पढ़कर लगता है काफी लोग इस इंसान से सहमत या असहमत हो सकते हैं इसलिए मैं आपको अपने तर्कों के माध्यम से इसका विश्लेषण करवाना चाहता हूँ।

क्या सफाईकर्मियों के पैर धोकर दिखावा कर रहे थे मोदी?
हम सबने महाभारत देखी है और ये भी जानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान होते हुए भी स्वयं शस्त्र न उठाकर गीता का उपदेश देकर अर्जुन का मार्गदर्शन करते हैं जबकि यदि वे स्वयं शस्त्र उठा लेते तो महाभारत युद्ध एक दिन भी न चल पाता। इंद्रप्रस्थ में जब पांडवों ने यज्ञ आरंभ किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने साधु-संतों की जूठी पत्तलें उठाने का काम किया था। लोगों को क्या संदेश देना चाहते थे भगवान? क्या दिखावा कर रहे थे क्योंकि कुछ ही दिनों बाद महाभारत का युद्ध होने वाला था? क्या पांडवों के लिए सहानुभूति बटोर रहे थे?

जी नहीं! जॉय दास जैसे वामपंथियों के दिमाग में ऐसे सवाल जरूर आएंगे क्योंकि इन्हें सनातन धर्म का ज्ञान नहीं है। लोगों तक नीतिगत संदेश वही व्यक्ति पहुंचा सकता है जो उनमें श्रेष्ठ हो, भगवान श्रीकृष्ण ने भी समाज को यही नैतिक शिक्षा दी कि सफाई का काम पुण्य अर्जित करवाता है जबकि समाज में सफाईकर्मी निकृष्ट नजरिये से देखे जाते रहे हैं। आप स्वयं विचार कीजिये, समाज का वो वर्ग जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी सर पर मैला धोया हो, क्या उन्हें सम्मान दिया नहीं जाना चाहिए? बिल्कुल दिया जाना चाहिये। यही सम्मान भगवान श्रीकृष्ण के संदेश में निहित था और यही सम्मान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सेवाभाव में भी निहित है। यदि मजदूर, कर्मचारी और शोषकों के लिए लड़ने वाले वामपंथी इसे समझ नहीं पा रहे तो उन्हें मार्क्स और लेनिन को फिर पढ़ना शुरू कर देना चाहिए।

क्या पैर धोना बुरी बात है?

देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये॥

ये पंक्तियां हैं नरोत्तम दास जी द्वारा रचित ‘सुदामा चरित’ की, प्रसंग है जब गरीब बालसखा सुदामा द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण के महलों में पहुंचते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अपने सिंहासन पर बिठाकर उनकी करुण दशा देखकर फ़ूट फ़ूट कर रोते हैं, उनके पैरों से कांटे निकालकर पैर परात में रखकर धोते हैं।

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का इधर भी समाज के लिए सन्देश है कि कोई गरीब मलिन दीन हीन व्यक्ति भी उचित सम्मान का हकदार है। सबका एक आत्मसम्मान होता है, यदि ये बात कोई वामपंथी समझ नहीं पा रहा है तो उसे फिर वामपंथ का नजरिया ही नहीं पता।

पूरे प्रकरण को सनातन धर्म से जोड़कर देखा जाए तो ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है लेकिन जॉय दास आंखें बंद करके अपनी ही पहचान छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। ये सब बात तो आध्यात्मिक नजरिये से थी लेकिन अगर बात आधुनिक विज्ञान के नजरिये से की जाए तो इसका विश्लेषण करके देखते हैं।

जॉय दास कह रहे हैं केरल के मुख्यमंत्री ने सफाई करने के लिए रोबोट लांच किया है और सफाईकर्मियों के पैर धोकर मोदी मानव द्वारा सफाई को बढ़ावा दे रहे हैं। महोदय की जानकारी के लिए बता दूं कि वो रोबोट मेनहोल की सफाई के लिए है। महोदय ने यदि विज्ञान से अपनी पढ़ाई की हो तो समझ आएगा कि रोबोट अपनी फीड प्रोग्रामिंग के अनुसार काम करता है उसमें इंसानों जैसी बुद्धि नहीं होती कि स्वयं से सोच समझकर कुछ कर सके। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले रोबोट हालांकि आने लगे हैं लेकिन भारत में वे अब तक बैंकिंग सेक्टर तक ही हैं। कुंभ में अस्थायी टेंट और घाट बनाये जाते हैं जिनकी सफाई कोई इंसान ही कर सकता है। अभी तकनीकी इतनी विकसित नहीं हुई है भारत की कि ये सब काम रोबोट कर सकें।

जॉय दास जी की जानकारी के लिए बता दें, पीएम नरेंद्र मोदी ने जो किया उसका समाजिक सन्देश तो मैंने विस्तार से बता ही दिया है। इसके अलावा जॉय दास जी के तर्क की बात की जाए तो रोबोट द्वारा साफ-सफाई अस्थायी कुंभ के दौरान संभव नहीं है। अब बात करते हैं केरल सरकार की, कुंभ के दौरान देश विदेश से लोग प्रयाग आ रहे हैं ऐसे में यदि केरल सरकार के पास कोई विशेष तकनीकी थी तो वे उत्तर प्रदेश सरकार तक वह पहुंचाकर देश का नाम ऊंचा कर सकते थे। भारत में भले ही हमारे बीच मतभेद हों लेकिन वैश्विक स्तर पर तो हम भारतीय ही हैं ऐसे में क्या जानबूझकर केरल सरकार ने सफाई करने की ऑटोमैटिक टेक्नोलॉजी कुंभ के दौरान उत्तरप्रदेश तक न पहुँचाकर घटिया राजनीति की है? प्रधानमंत्री और केरल मुख्यमंत्री के बीच ऐसी तुलना करने वाले जॉय दास या उनसे समर्थन रखने वालों को इसका उत्तर अवश्य देना चाहिए।

देश की संस्कृति की शून्य जानकारी, विज्ञान-तकनीकी की शून्य जानकारी, मार्क्सवाद की शून्य जानकारी और बेसिरपैर तर्क रखने वाले जॉय दास जी हम आपकी सद्बुद्धि के लिए भगवान से कामना करेंगे कि आप जिस भी विचारधारा से सम्बंधित हों कम से कम आपको उसकी तो जानकारी कायदे की हो। अब बात की जाए दिखावे की तो जॉय दास जी तो स्वयं ही एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री से सम्बंधित हैं उन्हें भलीभांति पता है कि ट्विटर या असली दुनिया में कैसे लोगों का ध्यान आकर्षित किया जाए भले ही बौद्धिक स्तर पर कितना भी हद तक गिरना पड़े। प्रचण्ड बुद्धि प्रदर्शित करने के लिए अनेकानेक धन्यवाद जॉय दास जी।

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