स्मृति ईरानी की शैक्षिक योग्यता उनके हलफनामा के अनुसार:
2014 लोक सभा – B.Com प्रथम वर्ष
2017 राज्य सभा – B.Com प्रथम वर्ष
2019 लोक सभा –  B.Com प्रथम वर्ष

लेकिन मीडिया प्राइम टाइम डिबेट में यह दिखाने की कोशिश कर रहा है, जैसे उन्होंने कोई बड़ा अपराध किया हो।

स्मृति ईरानी ने जीवन का पहला चुनाव 29 वर्ष की आयु में लड़ा। ज़ाहिर सी बात है उस वक़्त तक उनके पास ना राजनैतिक अनुभव था ना ही परिपक्वता।2004 के उनके हलफ़नामे में उनके उच्च शिक्षा के कॉलम में लिखा था, BA, वर्ष- 1996 (ध्यान दें बस केवल यही ग़लती है)। 2004 का चुनाव स्मृति ईरानी हार भी गयीं। 2011 में वह राज्य सभा से सांसद बनीं। तब हलफ़नामे में शैक्षिक योग्यता थी BCom प्रथम वर्ष। उस समय भी किसी को समस्या नहीं थी। 2014 के लोकसभा में उन्होंने चुनाव लड़ा कांग्रेस के राजकुमार के ख़िलाफ़- हलफ़नामे में शैक्षिक योग्यता थी- BCom प्रथम वर्ष। चुनाव हार गईं, पर अकस्मात् दस वर्ष पूर्व हलफ़नामे में हुई एक प्रिंटिंग मिस्टेक को लेकर तंज कसे जाने लगे। 2017 में राज्यसभा से फिर सांसद बनीं। शैक्षिक योग्यता- BCom प्रथम वर्ष। अब तेरह वर्ष पूर्व की टाइपिंग मिस्टेक थी और महीनों तक मसीहा पत्रकार लगे रहे इस मुद्दे को सुर्खियों में बनाए रखने के लिए। एक मसीहा तो अदालत तक पहुँच गए, जहाँ जज ने कड़ी फटकार लगाते हुए भगा दिया। 2019 में स्मृति फिर से कांग्रेस के युवराज के ख़िलाफ़ लड़ रही हैं, हलफनामा में शैक्षिक योग्यता BCom प्रथम वर्ष। लेकिन मुद्दा यह है कि पंद्रह साल पहले उनके हलफनामा में BA लिखा था। अदालत तक क्लीन चिट दे चुकी है, लेकिन जब पत्रकारिता किसी विशेष परिवार की गुलामी करने लगे तो अदालत के निर्णय को कौन देखता है?

अब बात शैक्षणिक योग्यता की हो रही है तो एक बार कांग्रेस के युवराज की माँ यानी सोनिया गांधी की भी कर लेते हैं। सोनिया गांधी के वर्ष 2004 हलफनामा के अनुसार शैक्षिक योग्यता में उन्होंने एक वर्ष का डिप्लोमा विश्व प्रसिद्ध ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज’ से किया। वर्ष 2009 के हलफनामा के अनुसार, उन्होंने डिप्लोमा यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज से नहीं, बल्कि कैम्ब्रिज शहर के एक छोटे से कॉलेज से किया।

यह वैसे ही हुआ जैसे कोई पहले लिख दे कि उसने IIT कानपुर से इंजीनियरिंग की और बाद में कहे IIT कानपुर से नहीं, बल्कि कानपुर में ITI किया है।

ख़ैर इसमे तर्क यह दिया गया कि टाइपिंग मिस्टेक थी। मान भी लिया सब लोगों ने। यह सोनिया गांधी के साथ हुआ, जो अपनी पार्टी की पूर्व अध्यक्ष हैं। जिनका हलफ़नामा तैयार करने के लिए भारत के सबसे बड़े वक़ील आते हैं। जिनकी सास और पति प्रधानमंत्री रहे हैं और जिनके पास सैंकड़ो काबिल वकीलों की फौज़ है। पर हम सभी जानते हैं कि असल जीवन में टाइपिंग मिस्टेक हो ही जाती हैं। वैसे भी भारतीय लोकतंत्र में चुनाव लड़ने के लिए शैक्षिक योग्यता नहीं देखी जाती। हलफ़नामे का मुख्य उद्देश्य होता है आपराधिक केस घोषित करना और अपनी सम्पत्ति घोषित करना। इसमें चूक नहीं होनी चाहिए। बाक़ी पचास टाइपिंग मिस्टेक होती हैं।

आखिर स्मृति ईरानी लगातार विपक्ष के शाब्दिक हमलों का शिकार क्यों हो रही हैं?

आइए जानने का प्रयास करते हैं-

स्मृति ईरानी बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के राजनीति में आईं। वो राजनीति जहाँ कांग्रेस के राजकुमार अब तक हिंदी बोलना ना सीखे, उस राजनीति में स्मृति ईरानी ने अपने विशुद्ध हिंदी उच्चारण और अपनी आक्रामकता से अपनी जगह बनाई। पार्टी में सांसद विधायक तो किसी को भी बना दिया जाता है, लेकिन पार्टी की एक ही पोस्ट होती है, जहाँ अक़्ल और वाक्पटुता देखी जाती है। वह है प्रवक्ता की पोस्ट। स्मृति जी पार्टी की प्रवक्ता भी बनीं अपनी क़ाबिलियत से। जहाँ छोटे-छोटे से छोटा नेता भी अपने लिए सुरक्षित सीट चाहता है, स्मृति जी पार्टी के आदेश पर एकदम असम्भव मानी जाने वाली सीटों से लड़ीं। भाजपा में महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनीं अपनी क़ाबिलियत से। यह ऐसे पद हैं जो ख़ैरात में नहीं बाँटे जाते।

फिर पार्टी के आदेश पर अमेठी में राहुल गांधी को ज़बरदस्त टक्कर दी। एक तरफ जहाँ राहुल जीतने के बाद पाँच साल शक्ल नहीं दिखाते हैं, वहीं दूसरी तरफ स्मृति ने पाँच साल अमेठी के लिए काम किया। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में राहुल गांधी 17 बार अमेठी गये, तो स्मृति 35 बार अमेठी गयीं। अब 2019 में वह फिर से अमेठी से ही राहुल गांधी को टक्कर दे रही हैं। 2009 के चुनाव में राहुल गांधी को अमेठी में 71% वोट मिले थे, जबकि 2014 में यह प्रतिशत घटकर 46 पर पहुंच गया। यही वजह है कि इस बार उन्हें देश के दक्षिण कोने में एक अल्पसंख्यक बाहुल्य सीट से लड़ना पड़ रहा है।

स्मृति बदलते भारत की सशक्त महिला की निशानी हैं, यानी सेल्फ़ मेड। डिग्री नहीं है, पर यह उनकी क़ाबिलियत के आड़े ना आया। डिग्री तो केजरीवाल के पास भी है, 2014 में वाराणसी हारने के बाद कितनी बार गए?

स्मृति का अपराध बस इतना है कि जिस दिन उन्होंने राहुल के ख़िलाफ़ लड़ने की घोषणा की, लाखों मानसिक गुलामों की दुश्मन नम्बर एक बन गयीं। इसके अतिरिक्त भारत का एक बड़ा वर्ग परेशान है। हम इंटर पास कर चपरासी न बन पाए, यह राजकुमार के ख़िलाफ़ लड़ेंगी। मीडिया को भी पता है कि कांग्रेस से विज्ञापन पाने हैं तो राजघराने के ख़िलाफ़ जो लड़ रहा है, उसके ख़िलाफ़ कुछ एपिसोड तो चलाने ही हैं। ऐसे में पंद्रह साल पहले प्रिंटिंग मिस्टेक, 21 साल पहले बुक क्राफ़्ट के टेस्ट में दफ़्ती टेढ़ी काटी थी, तीस साल पहले पड़ोसी के घर की घंटी बजा कर भाग गई थीं जैसे विषय प्राइम टाइम में आने ही आने हैं।

यदि लोकतंत्र में राजशाही सत्ता वाले राजकुमार को चुनौती देना अपराध है, तो हाँ बस यही अपराध है स्मृति का।