यह लेख उनके लिए नहीं है जो हमेशा बातचीत के पक्षधर रहे हैं। बातचीत तो दशकों से होती भी रही है। कोई सकारात्मक नतीजा सामने इसलिए नहीं आता क्योंकि पाकिस्तान कश्मीर को हमसे छीनने के अलावा और कुछ नहीं चाहता। क्या हमारे लिए यह संभव है ? कत्तई नहीं। इसलिए जो भी होना है, कश्मीर के आसपास ही हो जाए। युद्ध कोई अच्छी चीज नहीं पर यदि थोपा जाए तो उससे भागना भी ठीक नहीं। अन्यथा, हजार साल तक हजार घाव झेलने पड़ सकते हैं।

पूर्ववर्ती सरकारें क्यों खामोश हुआ करती थी?

पाकिस्तान के खिलाफ भारत की ताजा कार्रवाई दरअसल इस देश की एकता-अखंडता को बनाए रखने की जंग है। ऐसी कार्रवाई 2001 में हुए भारतीय संसद पर हमले के बाद ही होनी चाहिए थी।या फिर 2008 में मुम्बई पर आतंकी हमले के तत्काल बाद होनी चाहिए थी। इस बीच भारत को हजार घाव देने की पूर्व निर्धारित योजना के तहत पाकिस्तान लगातार काम करता रहा है। उसकी योजना कश्मीर को हमसे छीनने की रही है। वहां नारा जेहाद का है। यदि वह उसमें सफल हो जाएगा तो इस देश के अन्य हिस्सों को भी ‘कश्मीर’ बनाने की वह कोशिश रहेगा। क्योंकि नारा जेहाद का है।खासकर पश्चिम बंगाल, केरल और असम के कुछ जिलों में बाहरी-भीतरी तत्व वैसी स्थिति तैयार करने में लगे भी हुए हैं।

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जैश के आतंकी ठिकानों पर वायु सेना के हमले के साथ पाकिस्तान के मंसूबे को चकनाचूर करने की शुरूआत हो चुकी है। लोग चाहते हैं कि चाहे इस हमले का अंतिम नतीजा जो भी हो। इसे तार्किक परिणति तक पहुंचाया ही जाना चाहिए। क्योंकि टुकड़ों में घाव झेलने के बदले एकमुश्त ‘इलाज’ बेहतर होता है, सस्ता पड़ता है। दरअसल आप यदि कश्मीर में हारता हुआ दिखाई पड़ेंगे तो बाहर-भीतर की ‘पाकिस्तानी शक्तियां’ उपर्युक्त तीन प्रदेशों में भी और अधिक सक्रिय हो सकती है।

याद रहे कि 1965 की हार के बाद जुल्फीकार अली भुट्टो ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कहा था कि हम भारत के साथ हजार साल तक युद्ध करेंगे। 1971 की हार के बाद में भारत को ‘हजार घाव’ देने का नारा उधर से आया।
अब सवाल है कि कोई स्वाभिमानी देश कब तक ऐसा चलने देगा ? सन सैंतालिस के बाद से पाकिस्तान जिस तरह से छद्म युद्ध लड़ रहा है उसका जवाब अब जाकर मिलना शुरु हुआ है। पाकिस्तान कश्मीर से लेकर दिल्ली तक इस्लामिक जिहादियों का इस्तेमाल करके हमले करवाता रहा और हर हमले के बाद उसका सबूत मांगता रहा। उसे सबूत मिलते भी रहे लेकिन कार्रवाई के नाम पर जीरो। लेकिन शायद सबूत देना ही सबसे बड़ी गलती थी। इसी तरह कार्रवाई अगर अस्सी के दशक में हो गयी होती तो कश्मीर में कभी इतनी समस्या ही पैदा नहीं हो पाती। याद रखिए, कश्मीर की धरती पर पाकिस्तान से लड़ना ही पाकिस्तान की जीत है। हमें लड़ाई का जमीन बदलनी होगी।

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