हम युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं, ऐसे में ये प्रश्न सबके मन में कि युद्ध करना चाहिए या नहीं? भारत वर्ष ने अनेक वर्षों तक युद्धों को देखा है, पराधीनता को भी देखा है लेकिन युद्ध की आहट मात्र से कायरता का विलाप करती हुई कायरों की इतनी बड़ी संख्या शायद ही कभी देखी हो। युद्ध अकारण आक्रमण है या फिर धर्मयुद्ध इसमें अंतर जाने बिना ही शांति की दुहाई दी जा रही है। #SayNoToWar ट्रेंड चलाये जा रहे हैं। इन सबका सिलसिलेवार तरीके से विश्लेषण करते हैं।

भारत वर्ष सनातन धर्म की भूमि है और सत्य, तप, यज्ञ और धर्म सनातन हैं। आज भी यहां की बहुसंख्यक जनसंख्या सनातन धर्म के आदर्शों का पालन करती है। हम सर्वधर्म समभाव और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘ में विश्वास करते हैं फिर भी हमारे ऊपर आक्रमण किये जाते रहे हैं। हमारी हर पूजा पद्धति में विश्व में शांति स्थापित रखने हेतु “शांति पाठ” अवश्य होता है और हर पूजा/हवन के उपरांत ‘विश्व का कल्याण हो’ के सम्बोधन अवश्य होते हैं। पशु-पक्षियों और प्रकृति से अपार प्रेम रखने के वावजूद हजार वर्ष तक हमें गुलाम इसलिए बनाया जा सका क्योंकि हमने प्रतिकार और शांति के समय को चुनने में गलती कर दी थी।

यदि कोई आक्रांता बार बार समझाने के वावजूद भी अपने पाप छोड़ने को तैयार न हो, फिर भी हमें बार बार समझाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा निर्दोष युद्ध जैसी आपदा से बच सकें और विश्व में शांति स्थापित हो सके; यही शांति की सीमा है। इसके बाद शांति के प्रयास अपने अस्तित्व को अंधकार में झोंकने वाली मूर्खता ही है। भारत की संवैधानिक अखंडता तोड़ने के लिए देश की संसद पर हमला होता है और अपराधी होता है पाकिस्तान समर्थित अफजल गुरु। देश में 26/11 जैसा वीभत्स राक्षसी हमला होता है और अपराधी होता है पाकिस्तान का अजमल कसाब। उरी में हमारे जवानों को सोते हुए आतंकी मार देते हैं लेकिन जब भारत सरकार सर्जिकल स्ट्राइक करती है तो उदारवादी हमें सिखाते हैं ‘अमन’। शांति स्थापित करने के लिए हम पाकिस्तान की टीम को अपने मिलिट्री कैम्प में भेज देते हैं, पाकिस्तान को सारे सबूत दिए जाते हैं और हमें शांति के इस प्रयास का जबाब मिलता है कि भारत के सबूत पर्याप्त नहीं हैं। अजमल कसाब को पाकिस्तान अपना नागरिक मानने से अस्वीकार कर देता है। दरअसल शांति के सारे प्रयासों का यही अंत होना चाहिए था लेकिन हमारे शांति के प्रयास एक बार फिर कुचले जाते हैं जब पुलवामा में आतंकी हमले में भारतवर्ष अपने 42 से अधिक जवान खो देता है। देश एक मत से उचित करवाई का दबाब सरकार पर डालने लगता है। भारतीय वायुसेना अपने 12 मिराज 2000 विमानों ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकाने नष्ट करती है तब भी देश वायुसेना के साथ था लेकिन जैसे ही अगले दिन पाकिस्तानी वायुसेना में जब भारतीय सैन्य ठिकानों पर हमला किया और बदले की करवाई में जब हमारे विंग कमांडर अभिनन्दन पाकिस्तान की पकड़ में आ गए तो देश के अधिकतर कायर शांति-शांति चिल्लाने लगे। ऐसा क्यों? क्या ये सही समय था शांति शांति की गुहार लगाने के लिए ? नहीं!

यही भ्रम कुरुक्षेत्र में खड़े हुए अर्जुन को हुआ था जब भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता का ज्ञान अर्जुन को दिया था। हम तो खुशनसीब हैं कि हमारे पास वो ज्ञान मौजूद है। परिस्थिति आज भी कुरुक्षेत्र जैसी हैं; अर्जुन आज भी किंकर्तव्यविमूढ़ है, उसे नहीं पता ये युद्ध है या धर्मयुद्ध? लड़ाई आज भी पुण्य-पाप के बीच है, सत्य-असत्य के बीच है; ये लड़ाई उस लड़ाई से भिन्न नहीं है। अर्जुन को आज भी सरहद के उस पार भी अपने जैसे लोग नजर आते हैं, अर्जुन आज भी अपनों पर शस्त्र नहीं उठाना चाहता, अर्जुन आज भी हजारों सैनिकों की मृत्यु एवं उनकी भार्याओं को विधवा बनाने का कारण नहीं बनना चाहता। अर्जुन को आज भी शांति चाहिए लेकिन अर्जुन के पास आज श्रीमद्भगवतगीता तो है लेकिन केशव नहीं जो पल पल मार्गदर्शन करें। आज के अर्जुन को स्वयं इसका हल ढूंढना पड़ेगा। कश्मीर को भारत का मुकुट ऐसे ही नहीं कहते, ये लड़ाई भी इसी राजसिंहासन और मुकुट के लिये है? एक बलपूर्वक लेना चाहता और एक अधिकारस्वरूप उसकी रक्षा करता है। धर्मयुद्ध है ये, ये युद्ध उन निर्दोष लोगों के अधिकार के लिए हैं जो जेहादी आतंकियों द्वारा हर वर्ष मार दिए जाते हैं, ये युद्ध उन शहीदों के लिए है जो आतंकियों द्वारा छद्म युद्ध में काल के ग्रास बन गए हैं। श्रीमद्भगवतगीता का प्रथम श्लोक ही यही बताने के लिए है ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः’। पाकिस्तान के F-16 विमान देखकर कुछ अभिनन्दन जैसे शूरवीर MIG-21 बाईसन से ही इसको नष्ट कर देते हैं तो भारत में चैन से बैठे कुछ अर्जुन मोहवश अपने गांडीव का भार नहीं उठाकर नपुंसकता को प्राप्त हो रहे हैं ‘गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते’।

इस अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की ये बात याद ही नहीं :

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

दुष्टों का संहार तो अवश्य होता है कभी भगवान स्वयं करते हैं तो कभी ये पुनीत कार्य किसी के भाग्य में लिखा होता है और इस बार दुष्ट को दण्ड अवश्य मिलना ही चाहिए, बस ये बात आज के अर्जुन को समझाना है। इस अर्जुन को ये लगता है कि युद्ध में बहुत से विनाशकारी आयुध उपयोग होंगे, बहुत से निर्दोष नागरिकों का वध होगा और बहुत से वीर योद्धा हुतात्मा होंगे। ये अर्जुन गीता के इस श्लोक से अनभिज्ञ है :

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

जब युद्ध शुरू ही हो चुका है तो अब सुख-दुख, लाभ-हानि से परे होकर युद्ध ही धर्म है और इसे करने से कोई पाप नहीं होगा :

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

यदि आप आज शत्रु का दमन करने सक्षम हैं तो इस काम को यथाशीघ्र कर देना चाहिए अन्यथा भविष्य में ऐसे मौके बार-बार नहीं मिलते। एक कठोड दण्ड ही विनती न समझने वाले कुटिल के लिए उपयुक्त होता है। समय पर जो कार्य करना होता है यदि वो नहीं किया जाता तो इससे आने वाली पीढियां में आपकी अपकीर्ति व्याप्त होती है। कश्मीर और चीन ये दो मुद्दे आज भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए अपयश का कारण बनते हैं। गीता में भी इसी अपकीर्ति की बात कही गई है –

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-र्मरणादतिरिच्यते॥
और ये अपकीर्ति मृत्यु तुल्य होती है।

इतिहास पर गौर करें तो पाकिस्तान की हरकतें जड़बुद्धि जैसी लगती हैं, ऐसे कुटिलों के दंड के प्रावधान गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी श्रीरामचरितमानस में लिखा है। जब भगवान राम तीन तक समुद्र से विनती करते हैं उसके बाद भी समुद्र पर जूं तक नहीं रेंगती तब भगवान समुद्र का जल सुखाने के लिए धनुष पर चाप चढाते हैं ताकि उचित दण्ड दे सकें :

बिनय न मानत जलधि जड़ , गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब , भय बिनु होइ न प्रीति॥

देखा जाए तो पाकिस्तान आतंकियों का पोषण करता है एवं हमारे लाख मनाने के बावजूद नहीं मानता; नैतिकता के हिसाब से इस हिसाब से आतंकियों को दंड देना सर्वथा उचित है और यदि इसमें पाकिस्तान हमसे युद्ध करेगा तो उसका प्रतिकार करने में भी कोई अधर्म नहीं है। रावण के अधर्म का भोगी उसका राज्य बना था इसी प्रकार अपने नागरिकों की सुरक्षा पाकिस्तान का धर्म होना चाहिए। वहीं दुष्टों का दमन करना भारत का धर्म होना चाहिए, सन्देश स्पष्ट है। यदि आज के अर्जुन अब भी अज्ञानता में डूबकर क्षुब्ध रहेंगे तो कभी प्रतिकार नहीं कर पाएंगे और अपने राष्ट्र को विनाश की ओर धकेल देंगे।

हे अर्जुन! भावी पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखकर शस्त्र उठाओ, नपुंसकता त्यागकर अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए उठ खड़े हो। तुम्हारे न करने पर भी ये युद्ध अब रुक नहीं सकता, कायर इस छद्म युद्ध को वर्षों से शुरू किए हैं अब हमें इसे धर्मयुद्ध में बदलने का मौका मिला है तो इससे पीछे मत हटो। धर्मयुद्ध में सदैव सत्य की विजय होती है, सत्य तुम्हारे साथ है तो विजयश्री भी तुम्हारी ही होगी।

नोट :

अज्ञानी प्राणी इस धर्मयुद्ध को किसी धर्म से न जोड़ें, श्रीमद्भगवद्गीता में धर्म के व्यापक अर्थ है, सत्य-असत्य और पुण्य-पाप को ध्यान में रखकर व्यक्ति का कर्त्तव्य उसका धर्म निर्धारित करते हैं। उसे जो करना चाहिए वही उसका धर्म है। कृपया इसे हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई से न जोड़ें, आज की परिस्थितियों में हमारा देश के हित में कर्तव्य ही हमारा राष्ट्रधर्म है।

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