कल एग्जिट पोल में चुनाव नतीजे के पूर्वानुमान आये, और ये सभी पूर्वानुमान भारतीय जनता पार्टी की एक बार फिर लैंडस्लाइड विक्ट्री की तरफ इशारा कर रहे है। मगर  पिछले कुछ दिनों से विपक्षी खेमे में चल रही उथलपुथल मुझे चिंतित कर रही है और ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कि कोई बड़ी साजिश रची जा रही है। दरअसल मेरी यह चिंता निराधार भी नही है, मैं पिछले कुछ दिनों से ट्विटर पर एक अजीब सी बातें नोटिस कर रही हूँ।

सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह ने पूछा कि जब कोर्ट गर्मी की छुट्टियों में बंद हो जाएगी तो कौन जज होगा, जो मई 23 के बाद के दिनों में भी उपलब्ध होगा? उन्होंने संकेत दिया कि आने वाली सरकार का निर्माण विवादित हो सकता हैं।  दिमाग  में सबसे पहला सवाल आता हैं कि ऐसा क्या होने वाला हैं जो कि कोर्ट तय करेगा, हमारे माननीय राष्ट्रपति महोदय नहीं कर सकते?

यहाँ पर यह बात ध्यान देने वाली हैं कि इलेक्शन कमीशन की विश्वसनीयता पर सब संदेह कर रहे हैं, लेकिन कोई भी किसी भी प्रकार का कोई तथ्य नहीं रख रहा हैं। बिना किसी तथ्य के ऊँगली उठायी जा रही हैं और इनका तालमेल तो देखते ही बनता हैं। इनकी कोरियोग्राफी इतनी जबरदस्त है की बॉलीवुड का बड़े से बड़ा डांस मास्टर भी इनसे पनाह मांग ले।

एक के बाद एक महानुभाव ट्विटर पर आ कर इलेक्शन कमीशन पर लानत भेजते जा रहें हैं, लेकिन कोई भी यह नहीं बता रहा की कमीशन की विश्वसनीयता इनके हिसाब से सन्देह के घेरे में क्यो है। ज्यादातर लोग तो उदाहरण भी पेश नहीं कर रहे। हालांकि कुछ छुटपुट उदाहरण बताये भी जा रहे हैं जो एक इलेक्शन कमिश्नर के अलग विचार रखने को बढ़ा चढ़ा पर लिखा जा रहा हैं। कांग्रेस नेता पी चिदम्बरम ने कहा

आखिर रहस्य क्या है? क्यों कुछ लोगों के लिए  इलेक्शन कमीशन आँख की किरकिरी बन गया हैं? अचानक ऐसा क्या हुआ की कुछ माननीय एक बड़ी संवैधानिक संस्था को अविश्वनीय बताने लगे? अगर माननीयों की वैचारिक धारा को देखा जाये, तो ये सब के सब एक खास पार्टी के भोपू हैं। उसके सम्मान में जोर शोर से प्रचार करते हैं, आदर्शवाद, सांप्रदायिक सामंजस्य, सर्वहारा वर्ग के रहनुमा बनने की आड़ में ये कुछ खास पार्टियों का जोरदार समर्थन करते हैं। कई तो पत्रकारिता का चोला ओढ़ कर धड़ल्ले से इस कार्य को अंजाम देते हैं।

हालंकि एग्जिट पोल का भरोसा करे तो यही लगता है कि ये जिन पार्टियों का समर्थन करते हैं, 23 मई को वह सत्ता में वापसी नहीं कर रही हैं। इनकी बेचैनी भी इसका मजबूत इशारा कर रही है कि चुनाव परिणाम इनके मनमुताबिक नहीं आ रहें है, और इनका उद्देश्य सम्पूर्ण चुनाव प्रणाली  को ही अविश्वनीय करार देना है। इससे देश की छवि ख़राब होती है, तो होये। एक संविधानिक संस्था पर बेवजह दाग लगता है तो लगे। यह करके थोड़ी भ्रम की स्थिति बन जाये तो बन जाये। देश मे प्रजातंत्र है और सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, उसका जितना हो सके ये फायदा उठाएंगे। परन्तु असली चिंता की वजह है चुनाव परिणामों के बाद ये बौखला कर देश में भयानक दंगो की प्लानिंग तो नही कर रहे है?

जब इन महानुभावों की मनपसंद राजनीतिक पार्टियां एक के बाद एक चुनाव हारती चली जा रही थी, तो ये E.V.M. को ले कर रोना शुरू कर देते थे। तंग आ कर इलेक्शन कमीशन ने सभी को खुला आमंत्रण दिया, कि E.V.M. हैक करके दिखाओ। परन्तु इनकी जमात का कोई भी EVM के पास भी नहीं फटका।  अब लगता हैं कि इन्होने पैतरा बदल लिया हैं। E.V.M. हैक करना मुश्किल है, तो सीधे सीधे इलेक्शन कमीशन को ही लपेटे में ले लिया। अविश्वास का माहौल बनाकर देश मे दंगो की साजिश करने लग गए है।

आज तक इस देश ने 16 लोकसभा चुनाव देखें हैं। अभी तक चुनाव के बाद सब कुछ राष्ट्रपति महोदय सम्भालते आएं है, आखिर 17 लोकसभा चुनाव के बाद ऐसा क्या होने वाला है जिसको राष्ट्रपति भवन नहीं संभाल सकता? इसके साथ ही द वायर में एक आर्टिकल आता हैं कि क्या मोदी ने वही कानून तोड़ा आ है जिसके तहत इंदिरा गाँधी को डिबार कर दिया गया था? जिसके बाद इंदिरा ने इमरजेंसी लगा दी थी?

Did Modi Break the Same Law that Got Indira Gandhi Debarred – and Brought on the Emergency? 

16 मई को  मराठी पत्रकार निखिल वागले का ट्वीट आता है कि क्या 23 मई को हम भारत के इलेक्शन कमीशन पर विश्वास कर सकते हैं?

कांग्रेस नेता जयवीर शेरगिल भी इलेक्शन कमीशन की विश्सनीयता पर सवाल उठाते नज़र आये।

एक टीवी चैनल पर शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित भी इलेक्शन कमीशन पर सवाल कर रहे थे।

कांग्रेस के जॉइंट सेक्रेटरी कृष्णा अल्लावारु ने तो इलेक्शन कमीशन को रेस्ट इन पीस तक का ट्वीट कर डाला, जो कि किसी के मरने के बाद लिखते हैं।

दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाले ‘द हिन्दू’ समाचार पत्र के चेयरमैन, एन राम ने भी ट्वीट किया की इलेक्शन कमीशन अपनी विश्सनीयता खो चुका हैं। वह निखिल डे के ट्वीट पर हाँ में हाँ मिला रहे थे।

निखिल डे दिल्ली में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में लोगों को आने के लिए प्रोत्साहित कर रहे है। आप कार्यक्रम जानना चाहेंगे? वही इलेक्शन कमीशन और भारत में निष्पक्ष चुनाव कैसे हो।

ऐसा आभास होता हैं कि जब 2004 से 2014 तक एक कठपुतली को प्रधानमंत्री बना कर देश के सामने प्रस्तुत किया गया, तो न कभी संविधान खतरे में आया, न ही कोई संवैधानिक संस्था। देश में सब कुछ बेमिसाल था और चारो ओर प्रगति की गंगा बह रही थी। सभी सुख चैन की नींद सो रहे थे। देश की जितनी भी समस्याएं हैं, सब 2014 के बाद जन्मी हैं। बहरहाल यह लेख देश की जनता को सचेत करने के साथ ही साथ, प्रशासन और खुफिया एजेंसीज को भी सचेत करने के लिए है कि वह इन लोगो पर कड़ी निगाह बना कर रखे। अगर चुनाव परिणाम इनके पक्ष में नही आये तो ये लोग देश मे दंगो की भी साजिश रच सकते है।