अगर आप हिन्दू है और 2019 के लोकसभा चुनावों में वोट देने जा रहे है तो यह आर्टिकल सिर्फ आपके लिए है। मुद्दा है पाकिस्तान में हिन्दुओ को बदहाल स्थिति का, वहाँ बहुसंख्यक मुसलमान समुदाय हिन्दू लड़कियों को जबरदस्ती उठाकर इस्लाम स्वीकार करवाता है और फिर उनकी शादी अधेड़ मुस्लिमो से करवा दी जाती है। यह अत्याचार सिर्फ यही नही रुकता, कुछ दिनों बाद वह लड़कियां गायब होकर एक अंतहीन पीड़ा झेलने के लिए वैश्यालय पहुँच जाती है।

इन हिन्दू लड़कियों के मां बाप अपनी बेबसी और मजबूरी पर आँसू बहते हाथ मलते रह जाते है, इस्लामिक मुल्क में कानून भी मुस्लिमो का साथ देता है (पाकिस्तान का कानून इन जेहादियों का साथ कैसे देता है जानने के लिए यहां क्लिक करे)। इन घटनाओं का सबसे दुखद पक्ष है यह है की इनके लिए न्याय की माँग भी दुनिया के किसी कोने से नही उठती। यहां तक कि भारत का सेकुलर गिरोह जो न्यूजीलैंड में मस्जिद हमले पर भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को मुस्लिमो के साथ रहने का तौर तरीके सीखा रहा था वह भी चुप होकर बैठ जाता है। मलाला यूसुफजई जिन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिला हुआ है, उनसे जब इन घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कहा जाता है तो वह लोगो को अपने सोशल मीडिया एकाउंट से ब्लॉक करने लगती हैं।

जिम्मेदारी किसकी तय की जाए?

गौरतलब है कि हिन्दुओ पर यह अत्याचार सिर्फ पाकिस्तान में ही नही बल्कि पड़ोसी मुल्क बंगलादेश में भी हो रहे है। स्थिति यह है कि बंटवारे के समय पाकिस्तान में कुल आबादी का 23 प्रतिशत हिस्सा गैर मुस्लिम यानि अल्पसंख्यकों का था लेकिन यह आंकड़ा घटकर अब मात्र 4 प्रतिशत रह गया है। जिसमे हिन्दू आबादी 2 प्रतिशत से भी कम मात्र 1.85 प्रतिशत रह गई है। बंगलादेश में भी कमोवेश यही स्थिति हैं।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी हैं कि पाकिस्तानी हिन्दुओ पर हो रहे है इस अत्याचार के लिए जिम्मेदारी किसकी तय की जाए? जाहिर है यह दोनो देश इस्लामिक है उनके कायदे कानून भी इस्लामिक है जिसमे ऐसे धर्म परिवर्तन को जायज ठहराया जाता है तो हम वहाँ वैसे भी कुछ नही कर सकते है। इन्ही सब मजबूरियों को देखते हुए मोदी सरकार ने संसद में एक संशोधित नागरिकता कानुन लेकर आई थी। जिसमे बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यको (जिसमे हिन्दू, सिख, ईसाई समेत बौद्ध जैन भी शामिल है) के लिए भारत का नागरिकता कानून शिथिल और आसान किया गया था।

भारतीय नागरिकता कानुन के क्या थे नए नियम

इस कानून के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर बिना उचित दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता मिल सकती थी। नागरिकता शुल्क को 20 हजार रुपये से घटा कर मात्र 100 रुपये किया गया था। विडम्बना देखिये यह कानुन लोकसभा में तो पास हो गया लेकिन राज्यसभा में पास नही हो सका क्योकि बीजेपी के पास वहाँ प्रर्याप्त बहुमत नही था।

जिसका असर यह हुआ पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मातली जिले में पिछले साल 25 मार्च को 50 हिंदू परिवारों के 500 लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया। धर्म परिवर्तन कराए गए लोगों में से अधिकतर वो लोग थे, जो भारत में शरण लेने आए थे, लेकिन लॉन्ग टर्म वीजा ना मिलने के कारण उन्हें पाकिस्तान लौटना पड़ा था। है ना दुःखद!! सोचिये इसके पीछे कौन लोग जिम्मेदार है? पाकिस्तान की हिन्दू लड़कियों के अपहरण के कौन है असली गुनाहगार?

आज तक के वरिष्ठ पत्रकार रोहित सरदाना ने भी हिन्दुओ की बदहाल स्थिति के लिए सेकुलर गिरोहों के विरोध को ही जिम्मेदार ठहराया हैं।

 खुद को सेकुलर कहने वाली पार्टियो में इस कानून का विरोध किया था, और जरा इन तथाकथित सेकुलर पार्टियो का दोहरा चरित्र तो देखिए। एक तरफ ये म्यांमार और बांग्लादेश से आए मुस्लिमों को यहां बसाने की बात करते हैं, क्योंकि भारत सबको शरण देने वाला राष्ट्र है, इसलिए यहां की सरकार को मानवधिकारों की देखभाल करनी चाहिए। दूसरी तरफ ये कहते हैं कि इस विधेयक से देश की अस्मिता खराब होगा, क्योंकि पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यक यहां के नागरिक माने जाएंगे। तब इनका मानवाधिकार का प्रेम गायब हो जाता है। दरअसल इन्हें मानवाधिकारों की चिंता नहीं, बल्कि अपने वोटबैंक की चिंता है। इसलिए 2019 में जब अपना वोट देने पोलिंग बूथ तक जाए तो यह जरूर याद रखे।