भारत मे एक वर्ग है जो खुद को ‘बुद्धिजीवी’ कहता है लेकिन इनसे बड़ा कन्फ्यूज्ड कोई नहीं होगा। जब पुलवामा में हम पर अटैक हुआ तब इन्होंने एक सुर में कहा कि कहाँ गया 56 इंच का सीना? इसके बाद भारत ने एयर स्ट्राइक की तो सरकार को कोई बधाई नहीं दी। आज जब भारत के एक जाँबाज़ विंग कमांडर को पाकिस्तान ने पकड़ा लिया है तो फिर से शुरू हो गए- युद्ध समाधान नहीं है, सब राजनीति है। अमन की आशा करते हैं। भारत पाकिस्तान की रगों में एक ही लहू है।

हम कौन सा युद्ध चाहते हैं? दस दिन पहले जिन चालीस जवानों के शरीर का एक अंग तक ना मिला, वो क्या युद्ध लड़ने जा रहे थे? वह भी शांति ही चाहते थे। अभी जम्मू के DSP अमन ठाकुर जो वीर गति को प्राप्त हुए वह भी युद्ध लड़ने नहीं गए थे, अपने देश में अपनी पुलिस की सेवा ही कर रहे थे। ये जो रोज़ रोज़ भारत की सेना के रणबाकुरे शहीद होते हैं और जिनकी मौतों पर तुम पाखंडी मोदी का सीना नापते घूमते हो, वह भी युद्ध नहीं चाहते हैं। वो जो 26 नवंबर को ताज होटेल में बैठे हुए लोग थे वह युद्ध तो दूर अधिसंख्य ने जीवन में एक सजीव गोली ना देखी होगी।

यह सब शहीद हो रहे हैं, हर साल हमारे हज़ारों सिपाही शहीद हो रहे हैं बग़ैर किसी युद्ध की चाहत के। हम तो सदियों से शांति पसंद क़ौम रहे हैं। इतिहास साक्षी है भारत ने तो मुहम्मद गौरी को 21 बार माफ़ कर दिया था।

लेकिन हाँ जब अपनी पर बन आए तो प्रतिकार करना ही होता है। लेकिन ऐसे हर प्रतिकार में देश के अंदर बसी एक ऐसी आबादी है जो कभी राजनैतिक तो कभी बेवक़ूफ़ी वाली भावनाओं में बह कर आतंकवादियों को रिहा करने की माँग करती है। फिर जब वही आतंकवादी उसे मार रहे होते हैं तो सरकार को चैलेंज करती है। फिर जब सरकार दुबारा उन आतंकियों के पीछे पड़ती है तो यह फिर चालू हो जाते हैं, वार इस नोट द सालूशन।

विंग कमांडर अभिनंदन और उनको लड़ाकू विमान थमाने वाले वायुसेना अफसर यहां सोशल मीडिया पर शांति और युद्ध की विभीषिका का बेसमय और बेसुरा राग अलापने वालों से कहीं ज्यादा पढ़े-लिखे और बुद्धिमान है। वो चाहते तो पाकिस्तानी विमानों को सीमा पार खदेड़ कर रुक जाते, उनके पीछे उस पार नहीं जाते। अगर उनकी शहादत होती है तो उसके बाद उनके परिवार पर क्या बीतेगी, युद्ध के क्या परिणाम होते हैं और शांति कैसे स्थापित होगी इस बात का उनको सबसे बेहतर पता है क्योंकि जान हथेली पर लेकर सीमा पर वो खड़े हैं। इसलिए ये war mongering, युद्ध की विभीक्षिका और शांति की बातें तुम मत बताओ, क्योंकि बॉर्डर पर जो करना है हमारी फौजों को करना है, चुपचाप उनको सपोर्ट करो वर्ना अपना गन्दा मुंह बंद रखो, यूँ भी तुम्हारे उपदेशों से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

पाकिस्तान के साथ शांति ही समाधान है तो जाओ और समझाओ पाकिस्तान को कि वह भारत में आतंकी भेजना बंद करे। बंद करे वह अवैध घुसपैठ। बंद करे हमारे सिपाहियों पर बम चलना। बंद करे हमारे सिपाहियों पर पत्थर फेंकना।

We are at war since last twenty years.

किस शांति और किस युद्ध की विभीक्षिका की बात कर रहे हो। हमारे जितने जवान तुम्हारे इस कथित शांतिकाल में शहीद हुए हैं उतने आजादी से लेकर अब तक के सब युद्धों में शहीद नही हुए। क्या इस कथित शांतिकाल में शहीद हुए जवानों की जान का कोई महत्व नहीं, क्या वो किसी के बेटे, भाई, पति, पिता नहीं थे।

अच्छी तरह से कान खोलकर सुन लो, अब भारत ने कुत्तों के आगे हड्डी डालना बंद कर दिया है। अब जो हाथ भारतमाता के गौरव को चोट पहुंचाता है उस हाथ को तोड़ना सीख लिया है। लेकिन दुर्भाग्य यह कि जब अपने ही शरीर का एक अंग ज़हरीला हो जाए कोई उससे कैसे निपटे।

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