झूठ पकड़े जाने पर फर्जी मिथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक सवाल उठाने वाले से करने लगे गाली-गलौज

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सभी आधुनिक भारतीय इतिहासकार, शिक्षाविद, विचारकों मे एक समानता है। वे हिन्दू धर्म को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। इसी विचारधारा के कारण ये लोग बुद्धिजीवी समझे जाते हैं। इसी मानसिकता का एक उदाहरण हैं देवदत्त पटनायक। देवदत्‍त पटनायक पेशे से डॉक्‍टर हैं, मगर धार्मिक विषयों और पौराणिक कथाओं को नए अंदाज में पेश कर उन्‍होंने साहित्‍य जगत में अपनी पहचान बनाई है।

कल देवदत्त पटनायक ने ये ट्वीट किया था जिस पर एक यूज़र ने उनसे आलोचनात्मक लहज़े में एक सवाल पूछ लिया।

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तो वह गाली गलौज पर उतर आए।

जब कोई आपकी आलोचना करता है तभी आपका असली चरित्र सामने आता है कि आप आलोचना को कैसे लेते हैं। लेखक बनना सरल है लेकिन आलोचना सहना थोड़ा मुश्किल है। देवदत्त पटनायक जैसे महान लेखक दूसरों की माँ तक पहुँच गए। यह पतन की सीमा है इससे ज्यादा गिरा नहीं जा सकता है।

भले ही लोग सोशल मीडिया को कोसते हैं लेकिन सच तो यह है कि सोशल मीडिया आपके भीतर की उस कालिख को बाहर लाता है, जिसे छिपाकर आज तक आप छिपते आ रहे थे। हम सभी को इस माध्यम का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो हमारे सामने इन सभी के असली चेहरे ला रहा है, नहीं तो खुद को ऐसे महानुभाव हर प्रश्न से परे समझे बैठे थे। सभी कथित सेलेब्रिटी, दूसरों की माँ माने स्त्री पर सस्ती टिप्पणी करना अपना अधिकार समझते हैं।

देवदत्त पटनायक अक्सर ही अपनी सोच का परिचय देते रहते हैं। महारानी पद्मिनी पर जब फ़िल्म आयी थी तब विवादित टिप्पणी की थी। जिसके लिए आज तक माफी नहीं माँगी है। वो अपनी पीड़ा भी जाहिर कर चुके हैं कि लोग पहले हिंदू देवी-देवताओं के बारे में मजाक कर सकता था लेकिन अब नहीं। देवदत्त पटनायक दूसरों को ट्रोल कहते हैं लेकिन जो वो करते हैं वो शायद ट्रोल की श्रेणी में नहीं आता है।

आइए विस्तार से जानते हैं देवदत्त पटनायक के बारे में..

देवदत्त पटनायक अपने किरदारों को काल्पनिक लोक देते हैं। जिनका भारत के धार्मिक ग्रन्थों से कोई लेना देना नहीं है। ये ऐसे संस्करणों पर आधारित हैं जिनमे न कोई तुक है और न ही कोई ठोस वजह। रवीश कुमार की तर्ज पर देवदत्त पटनायक भी लिख देते हैं कि ये फलां-फलां ग्रंथ पे आधारित है, जिससे पाठक को लगे कि वो सच पर आधारित कथाएँ पढ़ रहा है। पटनायक की पुस्तकों और लेखों का निष्कर्ष असहनीय और दुविधा से परिपूर्ण होता हैं, जिससे प्राचीन आर्यवर्त की एक गलत छवि बनती है।

वास्तव में पटनायक को संस्कृत और बाकी शास्त्रीय भाषाओं का कोई ज्ञान नहीं है। इसलिए जब पटनायक के कार्य में मूलभूत गलतियों की भरमार मिलती है तो सवाल खड़े होते हैं इनके वैदिक विशेषज्ञ होने के दावे पर। फिर जब कोई आलोचना कर देता है तो ये गाली-गलौज पर उतर आते हैं। इसके अलावा पटनायक पर चोरी और नकल के भी आरोप लगते रहते हैं।

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धीरेन्द्र प्रताप सिंह राठौर
News Junkie, भारतीय, Proud Hindu, Writer, Reader, Social Activist
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