पुलवामा में दर्दनाक आतंकी हमले के बाद दिल्ली में गृहमंत्री की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक के बाद मीडिया में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के बाकी नेताओं ने जो बयान दिया, उससे एक बार के लिए सच में अहसास हुआ कि शायद कांग्रेस भी इस हमले को लेकर संजीदा है और पाकिस्तान के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे हर कदम का स्वागत कर साथ चलेगी। लेकिन एक बार फिर कांग्रेस ने देश और सेना की आंखों में धूल झोंक दिया है।

दरअसल, शनिवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में सरकार ने पाकिस्तान और आतंकियों के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया। उस प्रस्ताव के आखिरी पंक्ति में पाकिस्तान के खिलाफ “कारवाई” की बात कही गई थी, जिसका तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया। हालांकि, तेलंगाना राष्ट्र समिति और बीजू जनता दल के नेताओं ने आपत्ति जताने के लिए तृणमूल कांग्रेस की आलोचना की, लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता टीएमसी के पक्ष में खड़े हो गए।

इसके बाद गृहमंत्री ने गृह सचिव राजीव गाबा को विरोध कर रहे पार्टियों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर प्रस्ताव को सुधारने का निर्देश दिया। प्रस्ताव में सुधार कर लिखा गया, “आज हम सभी देश की एकता और अखंडता के लिए अपने सुरक्षा बलों के साथ मजबूती से खड़े हैं।” इसके बाद ही प्रस्ताव पारित हो सका।

पहले प्रस्ताव में लिखा गया था कि “आगे किसी भी कारवाई” के लिए हम सभी दल साथ रहेंगे। इसका मतलब यह कि देश में आपातकाल लगाया या युध्द को देखते हुए चुनाव के समय को भी आगे टाला जा सकता था। तृणमूल कांग्रेस का मानना था कि प्रस्ताव की ये पंक्ति “ब्लैंक चेक” की तरह हो जाएगी। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि यदि प्रस्ताव को हमारे समर्थन देने के बाद सरकार पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दे, देश में आपातकाल लगा दे या आम चुनाव स्थगित कर दे, तो विपक्ष के पास विरोध का आधार ही खत्म हो जाएगा।

मतलब शनिवार को तृणमूल कांग्रेस के साथ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जो किया, उससे तो अब ये स्पष्ट है कि ये लोग गाहे बगाहे पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कारवाई करने की तैयारी कर रही केंद्र सरकार का विरोध करेंगे। इन लोगों के लिए ‘देशहित’ से ऊपर ‘दलहित’ है। इसका असर दिखना भी शुरू हो गया है। रविवार को ही कांग्रेस की पूर्व सासंद नूर बानो ने इस हमले का जिम्मेदार सेना और बीजेपी सरकार को ठहराया। इसके पहले पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिध्दू ने भी पाकिस्तान से बातचीत की वकालत कर दी थी।

चलिए मान लेते हैं कि सरकार पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए आपातकाल लगा देगी, तो इसका आप (प्रस्ताव का विरोध करने वाली पार्टियां) विरोध क्यों करेंगे? सिर्फ इसलिए, क्योंकि ये कार्य मोदी सरकार कर रही है? आपातकाल सरकार लगाएगी तो देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए या खुद के लाभ के लिए? क्या आप लोग नहीं चाहते कि हर हाल में पाकिस्तान को गहरी चोट दी जाए? अगर आप लोगों ने बिना किसी विरोध के इस प्रस्ताव का समर्थन किया होता, तो जनता के बीच ये संदेश जाता कि सभी पार्टियां बिना किसी लाग लपेट के सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलकार खड़ी हैं। लेकिन ऐसा करके आपने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार ली है।

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