आज रवीश कुमार को रेमॉन मैग्सेसे अवार्ड मिलने की घोषणा हुई है। इसके लिए हम उन्हें बधाई देते हैं। उनकी पत्रकारिता, प्रस्तुति और भाषा के, विरोधी और समर्थक, एक समान रूप से क़ायल हैं। पिछले कुछ सालों से भले ही वो कई बार पत्रकारिता के बजाए कुछ और ही करते पाए जाते रहें हैं, लेकिन इस बात से उनकी पत्रकारिता के करियर पर ही सवाल करना अनुचित है।

अब कुछ सवालों पर चर्चा करते हैं

पहली बात, भारत के किसी पत्रकार को 12 साल बाद पत्रकारिता में ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार मिलने जा रहा है। इस दरमियान 1984 के बाद की जो सबसे भ्रष्ट सरकार थी उसका कार्यकाल 2009 से लेकर 2014 तक रहा। आये दिन भ्रष्टाचार के एक के बाद एक नये ख़ुलासे होते रहे। कई पत्रकारों और मीडिया घरानों ने बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफ़ाश किया। उस दौरान अवॉर्ड पाने वाले पत्रकार रवीश कुमार ने कितने ख़ुलासे किये?

दूसरी बात, घोटालों के ख़ुलासे की बात छोड़िये। मनमोहन सरकार जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थी उसी दौरान अवार्ड पाने वाले रवीश कुमार की महिला सहयोगी बरखा दत्त चैनल पर (नीरा राडिया टेप के ख़ुलासे के बाद) ख़ास मंत्री पद दिलवाने में दलाली का आरोप लगा। क्या रवीश कुमार ने अपनी महिला सहयोगी पर कोई प्राइम टाइम किया?

तीसरी बात, रवीश कुमार पिछले कुछ सालों से अलग-अलग चैनलों और उनके पत्रकारों को आये दिन ‘मोदी का गोदी पत्रकार’ का सर्टिफ़िकेट बाँटते रहते हैं। क्या कोई बता सकता है कि 2008 में जब राजदीप सरदेसाई ने मनमोहन सरकार के खिलाफ किये गए स्टिंग ऑपरेशन को ऐन मौक़े पर दिखाने से रोक दिया उस समय अवार्ड हासिल करने वाले इस पत्रकार ने उस बेईमानी के खिलाफ कोई आवाज उठायी थी?

चौथी बात सत्ता में केवल नरेंद्र मोदी ही नही हैं केजरीवाल, ममता बनर्जी जैसे अलोकतांत्रिक नेता भी हैं। क्या आपने कभी रवीश को इन नेताओं, इनकी आराजक व्यवस्था के ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग करते देखा? प्राइम टाइम पर आपने कभी रविश कुमार को बंगाल पर चिंता व्यक्त करते हुए देखा है ?

ये रमन मैग्सेसे अवार्ड मिलता कैसे है

इस अवार्ड को हासिल करने में अरविंद केजरीवाल जैसे पूर्व विजेताओं की “सिफारिश” का “परसेंटेज” क्या है? जब रेमन मैग्सेसे कमेटी भारत के दौरे पर आई थी तो उसकी अगवानी किन किन लोगों ने की? आगवानी करने वाले लोगों ने उस कमेटी को क्या-क्या फीडबैक दिए? इन सवालों के जवाब जानने के लिए जब तह तक जाएँगे तब आप जान पाएँगे की रवीश कुमार पांडे को अचानक ही रेमन मैग्सेसे अवार्ड क्यों मिला है।

क्या अवार्ड पाना इतना आसान है? 

जी, नहीं! इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। रवीश कुमार इसके हक़दार थे। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता है। लोकसभा चुनाव (2019) में मतदान के दौरान हर रोज़ सुबह से लेकर रात तक ईवीएम से जुड़ी ख़बरों को तोड़ मरोड़कर उसे एजेंडा बनाते हुए दर्शकों के ज़ेहन में ये बात डालने की कोशिश की कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। राफेल और जस्टिस लोया पर महीनों फेक न्यूज़ चलाया। तपती धूप में राहुल गांधी का बेहद कठिन इंटरव्यू लिया। कन्हैया कुमार को हर रोज़ किसी न किसी विशेषज्ञ के तौर पर आमंत्रित किया। कन्हैया और उमर खालिद के लिए स्क्रीन तक काली की। एक नाबालिग दलित से रेप करने वाले अपने भाई को वकीलों की फौज लगाकर बचाया। चुनाव में राजनेताओं की रैली में मंच साझा किया। लिस्ट तो बहुत लंबी है…

वैसे पुरस्कार लौटाने के लिए ज़रूरी है कि पहले पुरस्कार प्राप्त किया जाये। अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ कि वो सही को सही, और गलत को गलत कहते रहें (जिसकी अपेक्षा तो बिल्कुल भी नहीं है)। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ रवीश जी, आपको लम्बी आयु मिले, स्वास्थ्य मिले।