कारवां पत्रिका जो अपनी ब्लैकमेलिंग और फर्जी खबरों के लिए जानी जाती हैं, उनका यह ताजा कारनामा देखकर आप हैरान रह जायेंगे। कारवां ने एक लेख छापा हैं जिसमें वह पुलवामा में मारे गए शहीदों की जाति बता रहा हैं, और आंकड़े दे रहे हैं कि उन शहीदों में कितने प्रतिशत उच्च जाति के थे और कितने प्रतिशत दूसरी जातियों के। बहरहाल यहाँ पर आंकड़े गौड़ हो जाते हैं और मंशा पर सवाल उठता हैं, आखिर ऐसा लेख लिखने के पीछे मंशा क्या हैं, उसको जानना बहुत ज़रूरी हैं। इनकी असली मंशा हैं, देश एक न होने पाए, एक हो कर न चले, एक हो कर न सोचे, एक हो कर न लड़े , एक हो कर अपने अधिकारों के लिए भी बात न करे। यह लोग अब अपने काम में इतने माहिर हो चुके है कि इनसे अब अंग्रेज भी ‘फुट डालो और राज करो ‘ की कोचिंग ले सकते हैं। इनकी मंशा है, देश को धर्म, संप्रदाय, भाषा, जातियों और उपजातियों में इतना बाँट दो कि ये कभी भी एक हो कर किसी भी राजनेता से जवाबदेही न ले पाएं।

दरअसल, बाजपेयी युग तक ये लेफ्ट लिबरल जमात इतनी खतरनाक नहीं हुई थी। बाजपेयी जी एक अच्छे राजनेता थे, देश पर राज करके चले गए। वह लेफ्ट लिबरल की ज़मीन नहीं छीनना चाहते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी का नारा, “सबका साथ सबका विकास” और ‘राष्ट्रीयता’ इनकी सभी दुकाने बंद करा सकता हैं। सबका साथ सबका विकास किसी एक वर्ग की बात नहीं करता, ऐसे ही राष्ट्र सबका हैं, इसपर किसी का कॉपीराइट नहीं हैं, ये चीजे देश को एकता के सूत्र में पिरोती हैं। गौरतलब है कि जब देश एक हो कर सोचने लगेगा तो इन डिजाइनर पत्रकारों और बुद्धिजीवियो की दुकाने उसी दिन बंद हो जाएँगी। इसीलिए नरेंद्र मोदी से इस जमात को विशेष घृणा हैं। यहाँ तक कि ये मोदी विरोध में किसी भी हद तक जा सकते हैं। इनकी गर्त में गिरने की कोई सीमा नहीं हैं। ये हर दिन गर्त की एक नई गहराई तलाश लेंगे।

पुलवामा हमले ने देश को एक साथ ला कर खड़ा कर दिया। भारत के कोने कोने से आक्रोश के स्वर बुलंद होने लगे, सैनिको के खून का बदला लेने की बात होने लगी और पूरा देश एक साथ खड़ा हो गया। भारत के वीर (Bharat Ke Veer) साइट पर 5 दिन में 46 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद जोड़कर ही भारतीयों ने अपनी संवेदना शहीद जवानो के परिवारों के प्रति दिखा दी। जिसकी पढ़ सुन कर एक आम हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जायेगा लेकिन ये डिजाइनर बुद्धिजीवियो की जमात काँप जाएगी।

आपको बता दें, शहीद जवानों के प्रति यह सम्मान जज्बा सिर्फ एलीट या मध्यम वर्ग का ही नही हैं, देश का निम्न वर्ग जो रोज कुंआ खोदता हैं और रोज पानी पीता हैं वह भी अपनी जमा पूँजी इन शहीद सैनिकों के परिवारों पर न्यौछावर कर देना चाहता हैं। ये तमिलनाडु से एक दिहाड़ी मज़दूर हैं इन्होंने कलेक्टर के ऑफिस जा कर अपना योगदान दिया, और सबसे खास बात रही हैं कि इन्होंने यह नही कहा कि उनकी यह सहयोग राशि सिर्फ तमिल बोलने वाले, तमिलनाडु के, उनकी जाति के ही शहीद सैनिक को दीजियेगा। ऐसा शर्मनाक काम तो सिर्फ वह डिजाइनर वामपंथी पत्रकार ही कर सकते हैं।

सोचिये एक दिहाड़ी मज़दूर और एक हीरा व्यापारी साथ खड़े हो जाये, वह भी जाति, भाषा, क्षेत्रीयता को परे रखकर तो ये डिजाइनर बुद्धिजीवी को कैसे बर्दाश्त होगी यह तो इनके लिए बहुत ही डरावनी स्थिति हैं। क्योकि ऐसी एकता इनके ताबूत में आखिरी कील जैसी होंगी, तो लेकर आ गए प्रोपोगंडा समाज को बांटने का, क्योंकि समाज बंटेगा नही तो इनकी ‘वोदका बोटी’ का जुगाड़ कैसे होगा?

बहरहाल हैरानी और मज़े की बात यह हैं कि, कारवां के लेखक ने यहाँ पर किसने किसने डोनेट किया, उनकी जाति नहीं बताई, और यह तो तय हैं, कि गृह मंत्रालय कभी भी दानदाताओं की जाति सार्वजानिक नहीं करेगा। और करनी भी नहीं चाहिए। हम चाहे तो ट्विटर पर दान देने वालो के नाम देखकर जातिगत आंकड़े दे सकते हैं। शहीदों की जाति के बारे में दिए उनके झूठे आंकड़े को सही आंकड़े देकर उनके झूठ का पर्दाफाश कर सकते हैं। पर हम ऐसा नही करेंगे क्योकि हमारे लिए एक जवान सिर्फ और सिर्फ एक जवान हैं। हमसे जितना भी हो सकेगा, हम उनके लिए खड़े रहेंगे। और हमारे साथ कुछ नामी गिरामी नाम भी शामिल हो गए, जैसे, अमिताभ बच्चन, वीरेंदर सहवाग, गोपीचंद, सौरव गांगुली, वाइचुंग भूटिया , खली। इन सभी हस्तियों ने जवानो का साथ दिया और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाने की वकालत की और इस बार तो लेफ्ट लिबरल्स का प्यारा बॉलीवुड भी उनके खिलाफ खड़ा हो गया। उन्होंने एक प्रस्ताव पारित किया की किसी भी पाकिस्तानी कलाकार को काम नहीं देंगे, और आज ही सलमान खान ने, आतिफ असलम का गाना अपनी फिल्म ‘नोटबुक’ से हटा दिया हैं। अब इस गाने को कोई भारतीय गायक गायेगा। ऐसी बाते लेफ्ट लिबरल्स को बहुत परेशान करती हैं और वह असहज हो जाते हैं।

अब देखते हैं कि ऐसा क्यों हैं। क्यों लेफ्ट लिबरल्स को, देश एक हो जाये तो, ये खतरनाक हो उठते हैं? दरअसल इनकी पूरी राजनीति ही रहनुमा बनने पर चलती हैं। इनको रहनुमा बनने का बहुत शौक हैं, कभी ये दलितों के रहनुमा बनते हैं, कभी आदिवासियों के, कभी मुस्लिमों के और कभी इनको शब्दों की कमी पड़ जाती हैं तो ये कहते हैं कि शोषितों, वंचितों, दबे कुचलों की आवाज़ हैं हम। यही सब कह कह कर, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादे N.G.O. हमारे देश में खुल गए, लेकिन दलित, शोषित , वंचित , दबे कुचले वही के वही हैं। N.G.O. की संख्या के हिसाब से विश्व के सबसे ज्यादे लिबरल्स इसी देश में बसते हैं, अब टाइम आ गया हैं उनसे हिसाब लेने का। उनसे पूछा जाना चाहिए कि ये क्या तमाशा लगा रखा हैं? आप के दिल में इतना दर्द हैं तो कुछ करते क्यों नहीं ?

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