अयोध्या भूमि विवाद (Ayodhya Land dispute) पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शुक्रवार को बड़ा फैसला लेते हुए इसे मध्यस्थता के लिए भेज दिया। जिसे लेकर न्याय की उम्मीद लगाए बहुत से लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। न्यायपालिका, न्यायालय और न्यायधीश! एक समय था जब ये नाम सुनते ही जेहन में जो पहला ख्याल आता था वो था न्याय। लेकिन पिछले कुछ समय से न्यायपालिका में जो कुछ चल रहा है, जिस प्रकार से न्यायपालिका वामपंथी विचारधारा के लोगों से प्रभावित दिख रही है। उसके बाद से लोगो का न्यायपालिका से विश्वास डगमगा सा गया है।

राम मंदिर मसले पर भी यही हुआ है। 8 साल पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा के दावों को खारिज करते हुए जमीन पर मालिकाना हक का फैसला तो रामलला के पक्ष में सुनाया लेकिन बड़े अजीब और विडम्बना पूर्ण तरीके से फैसला सुनाते हुए मालिकाना हक वाले केस को बंटवारे का केस बना दिया। इस फैसले का सीधा-सीधा मतलब था कि अब से न्यायालयों में न्याय नहीं बल्कि लॉलीपाप मिलेगा। क्योंकि ASI की रिपोर्ट के अनुसार ये साफ हो चुका था कि मन्दिर तोड़कर उसके ऊपर मस्जिद बनाई गई और इससे पहले मुस्लिम पक्ष भी ये हलफनामा दे चुका था कि अगर ASI की रिपोर्ट में ढांचे के नीचे मन्दिर के अवशेष पाए जाते हैं तो हम अपना दावा छोड़ देंगे।

हालांकि इसके बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया जिसे कुछ भी कहें लेकिन न्याय तो कतई नहीं कहा जा सकता। अब कुछ वैसा ही काम मध्यस्थता के नाम पर सुप्रीम कोर्ट भी कर रही है। वो भी तब जब मुस्लिम पक्ष के वकील मामले की सुनवाई कर रहे जजों को लगातार डरा-धमका रहे हैं और उनका चरित्र हनन कर रहे हैं। सबसे पहले मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने CJI जस्टिस मिश्रा को डराया-धमकाया और फिर जब उन्हें उनके घटिया और निम्न स्तर के आचरण के लिए लताड़ा गया तो वकालत छोड़ने का स्वांग रचने लगे और फिर बेशर्मों की तरह अपनी बात से पलट कर वापिस फिर इसी केस में पेश हो गए।

धवन के बाद मुस्लिम पक्ष की ही तरफ से कपिल सिब्बल ने मोर्चा सम्भालते हुए CJI जस्टिस मिश्रा से मामले को 2019 चुनाव तक स्थगित करने की मांग की गई और ना मानने पर उनके खिलाफ जो अभियान चलाया गया वैसा इस देश के इतिहास में कभी नहीं हुआ था। उनके खिलाफ एक वाहियात मुद्दे पर उनके जूनियर जजों से विद्रोह कराया गया और फिर महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। उसके बाद राजीव धवन ने ही मामले की सुनवाई कर रहे एक जज यू यू ललित को मामले की सुनवाई से हटने को कहा क्योंकि वो अपनी वकालत के कैरियर के दौरान एक कोर्ट की अवमानना के मामले में कल्याण सिंह के वकील थे। अब इससे बेतुकी बात और क्या हो सकती है कि एक जज की निष्पक्षता पर सिर्फ इस आधार पर सवाल उठा दिया गया कि वो आज से 25-30 साल पहले कल्याण सिंह के वकील थे।

यहां मैं आपको बता दूं कि सुप्रीम कोर्ट के सभी जज हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकीलों में से ही चुनकर बनाए जाते हैं और ये भी साफ सी बात है कि अपने 30-40 साल के कैरियर में वो न जाने कितने लोगों के वकील रहे होंगे। तो इस प्रकार का लॉजिक दिया जाए तो फिर कोर्ट में सुनवाई कम और जजों के recusal ज्यादा होंगे। इन सब ड्रामों के पीछे मुस्लिम पक्षकारों और उनकी समर्थक पार्टियों का मकसद सिर्फ इस फैसले को 2019 चुनाव के बाद तक टालना है ताकि अगर 2019 में उनकी सरकार बन जाए तो फिर न्यायपालिका को फिर से अपनी उंगली पर नचा सकें और अपनी मनमर्जी का फैसला कर सकें।

ये मध्यस्थता वाला पैंतरा भी और कुछ नहीं बल्कि न्यायपालिका को बंधुआ बनाकर अपने हक में फैसला कराने के षड्यंत्र की एक कड़ी है और इस मामले को और लम्बा लटकाने की कोशिश भर है, जो कि कांग्रेस के नेता और मुस्लिम पक्षकारों के वकील कपिल सिब्बल ने बड़ी ही बेशर्मी और ढीठता से इसकी मांग सुप्रीम कोर्ट में की भी थी। वरना इस देश का बच्चा बच्चा जानता है कि इस मामले में मध्यस्थता जैसा कुछ अब हो ही नहीं सकता और वो भी तब जब पहले कई बार ये मध्यस्थता की कोशिशें बुरी। तरह विफल हो चुकी हैं। मध्यस्थता वहाँ होती है जहां सबकी कोशिश मामले को सुलझाने की हो लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है। इस मामले को तो उलझाने के लिए ही बहुत ही सुनियोजित तरीके से षड्यंत्र रचे गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का ये मध्यस्थता वाला निर्णय भी उन षडयंत्रो में से ही एक है वर्ना जब सबरीमाला और शनि शिंगणापुर पर फैसला देते वक्त सुप्रीम कोर्ट को लोगों की धार्मिक भावनाओं की चिंता नहीं हुई तो अब इस मामले में ऐसा क्या अलग है। ये तो सीधा-सीधा एक छोटे से जमीन के टुकड़े के मालिकाना हक का विवाद है और इसका इसी आधार पर फैसला किया जाना चाहिए था। कोर्ट को बस ये देखना है कि विवादित स्थान पर पहले क्या बना था और अगर मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी तो क्या मुस्लिमों का कब्जा इस स्थान पर कानून के अनुसार (शांतिपूर्ण और लगातार) रहा या नहीं। इसमें इन सब चीजों को देखने का क्या औचित्य है कि जो मन्दिर तोड़ा गया वो मन्दिर शिव का था या राम का था, मुस्लिमों को नमाज के लिए मस्जिद जरूरी है या नहीं। क्योंकि ये सब तो इस केस में मुद्दे ही नहीं है।

अगर जमीन हिंदुओं की है तो हिंदुओं को दो, इसमें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि इस्लाम मे मस्जिद जरूरी है या नहीं। इसलिए चाहे इस्लाम मे मस्जिद के महत्त्व वाले कमाल फारुखी केस को कब्र से खोदकर वापिस लाना हो या फिर मस्जिद के नीचे मिले अवशेषों के शिव मंदिर होने वाली बात हो, सबका मकसद बस इस मामले को उस समय तक लटकाना है जब तक कि मुस्लिम पक्षकार इस बात के प्रति आश्वस्त न हो जाएं कि सुप्रीम कोर्ट की फैसला करने वाली बेंच उनकी गैंग के इशारों पर नाचने वाली है और निश्चित तौर पर उनके पक्ष में फैसला करेगी।

लेखक संजीत सिंह भालोठिया हरियाणा के जाने-माने क्रिमनल वकील है, यहाँ क्लिक कर ट्विटर पर उन्हें फॉलो करे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं, इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Epostmortem उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।

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