अभिनेता आयुष्मान खुराना अभिनीत एक फिल्म आने वाली है, जिसका नाम है- ‘आर्टिकल 15’। इस फिल्म का ट्रेलर आ चुका है। फिल्म कि कहानी गैंगरेप की एक घटना पर आधारित है। यह घटना उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले में 27 मई 2014 को घटित हुई थी। फिल्म में दिखाया गया है कि ऊंची जाति के लोगों ने दलित लड़कियों का बलात्कार करके सिर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि उन्होंने अपनी मजदूरी में तीन रुपए बढ़ाने की बात कही थी।

क्या है ट्रेलर में?

ट्रेलर में कहानी तो ठीक से प्रदर्शित की गई है। लड़कियों का बलात्कार करके उन्हें मारकर पेड़ पर लटका दिया जाता है। फिर जब पीड़ित परिवार पुलिस के पास रिपोर्ट लिखवाने जाता है, तो उन्हें डांटकर भगा दिया जाता है। अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद मुकदमा दर्ज होता है। उसके बाद पुलिस जांच शुरू होती है। आयुष्मान खुराना एक पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे हैं। वो अपने कनिष्ठ अधिकारी से पूछते हैं कि अपराधी कौन है? जवाब मिलता है, “महंत जी के लड़कों ने किया है।” फिर नायक पूछता है कि ऊंची जाति के हैं? जवाब मिलता है, “हां, ब्राह्मण हैं।” आपको ये सारी बातें ट्रेलर में साफ साफ सुनने को मिल जाएंगी।

क्या है वास्तविक घटना?

चूंकि, ये फिल्म वास्तविक घटना पर आधारित है, तो जिस घटना पर आधारित यह फिल्म है, उसके बारे में भी जानना आवश्यक है। 27 मई 2014 को उत्तर प्रदेश के बदायूँ के कटरा सआदतगंज गांव में दो लड़कियों का कथित गैंगरेप होने का मामला सामने आया। उसके बाद उनकी हत्या करके लाश को पेड़ से लटका दिया गया था। इस घटना के बाद तत्कालीन सपा सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ये खबर पहुंची। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी बलात्कार की पुष्टि हुई। फिर हर घटना में जाति धर्म खोजने वाले भी कूद पड़े और पीड़ित परिवार को दलित बताकर रिपोर्टिंग की जाने लगी।

मामले की शुरुआत में तो किसी मीडिया को पीड़ितों की जाति पता नहीं थी, इसलिए वे रायटर्स की रिपोर्ट के आधार पर उसे दलित बताकर ही पेश कर रहे थे। फिर बाद में रायटर्स ने अपनी गलती सुधारते हुए बताया कि पीड़ित दलित नहीं, बल्कि मौर्य (शाक्य) जाति के हैं और आरोपी यादव जाति के। आरोपियों के नाम पप्पू यादव, अवधेश यादव, उर्वेश यादव, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव था। इनमे से दो, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव, पुलिसकर्मी थे। मतलब भारतीय संविधान के अनुसार, पीड़ित पक्ष और आरोपित पक्ष, दोनों ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे। इस बाबत केंद्र सरकार ने जब राज्य सरकार से आरोपियों पर हरिजन एक्ट ना लगाने के सिलसिले में सवाल पूछा, तो सरकार ने कहा कि जिला प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित परिवार दलित नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह केस हाईलाइट होने के बाद इसे सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई की विस्तृत जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि लड़कियों के साथ गैंगरेप नहीं हुआ था, लेकिन जांच टीम ने हत्या से इंकार नहीं किया था। दोनों पक्षों का पॉलिग्राफ टेस्ट भी करवाया गया, जिसमे बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई।

ये है पूरी घटना। इसमे कहीं भी ब्राह्मण जाति के किसी व्यक्ति का नाम नहीं आया, लेकिन फिल्म में ब्राह्मण समुदाय को बलात्कारी के तौर पर दिखाया जा रहा है। हम यहां इस बात से इंकार नहीं कर रहे कि ब्राह्मण समाज में गलत लोग नहीं होते, लेकिन जिस घटना को लेकर ये फिल्म बनाई जा रही है, उसमे किसी भी बलात्कारी/हत्यारे का संबंध ब्राह्मण समाज से नहीं है। तो फिर ये क्यों ना समझा जाए कि ये भी एक तरह की प्रोपेगैंडा फिल्म है और सिर्फ एक जाति के खिलाफ लोगों में नफरत का बीज बोने के लिए किया जा रहा है? माना कि फिल्म में पात्रों के नाम, स्थान, घटना, आदि सब काल्पनिक होते हैं, लेकिन यह फिल्म तो एक सत्य घटना पर आधारित है। अगर आरोपियों के वास्तविक नाम फिल्म में नहीं बता सकते, तो कम से कम उनकी जाति तो बता ही सकते हैं। और अगर जाति भी नहीं बता सकते तो फिर ब्राह्मण जाति कहां से आ गई?

ऐसे अपराध को जातिवादी रंग देने का दुस्साहस फिल्म के निर्माता/निर्देशक अनुभव सिन्हा किसके इशारे पर और गलत फैक्ट के साथ कर रहे है? यह जांच का बिंदु होना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि इस फ़िल्म की फंडिंग कौन कर रहा है? फ़िल्म के ट्रेलर में पुलिस पर भी गम्भीर प्रश्न उठाये गए है, ऐसा दिखाया गया है कि पुलिस ने अपराधियो की जाति देखकर उन्हें बचाने की कोशिश की, जबकि यह पूरा मामला ही राजनीतिक था और तत्कालीन सपा सरकार के प्रभावशाली नेताओ की वजह से पुलिस इस मामले में ढिलाई बरती जा रही थी। यह सभी बातें प्रेस के माध्यम से पब्लिक डोमेन में है, लेकिन अनुभव सिन्हा जैसे लोग यह आपको नही बतायेंगे। क्योंंकि इन्हें अपने आकाओं के पैसे पर प्रोपगंडा करके हिन्दू समाज मे नफरत पैदा करनी है, उन्हें बदनाम करना है।

19 के लोकसभा चुनावों में हिन्दू समाज पहली बार अपने जातिगत भेदभाव से ऊपर उठा जो जातिवाद के ठेकेदारों को बिल्कुल रास नहींं आ रहा है। देश जातिवाद से ऊपर उठकर अब राष्ट्रवाद की बात करने लगा है, जो न तो अनुभव सिन्हा जैसे फिल्मकारों को रास आ रहा है और ना उनकी फिल्मों में पैसा लगाने वाले उनके अंडरवर्ल्ड के दुबई वाले आका को। उनकी आतंक की दुकानें बंद होने के कगार पर है, इसलिए अनुभव सिन्हा जैसे अपने मोहरे के सहारे देश मे आग लगाना चाहते है, ताकि देश मे वैमनस्य बढ़े और उनकी दुकानें चले। ये अनुभव सिन्हा जैसे लोग उनके हाथों की कठपुतली है और यह आरोप हम ऐसे ही नहींं लगा रहे हैं। आप हमारी यह रिपोर्ट पढ़िए, जिसमे खुद सिन्हा ने स्वीकार किया है कि उनकी फिल्मों में पैसे किसके लगे है। अब आप स्वयं सोचिये की फ़िल्म में जिसके पैसे लगे है वह अपना प्रोपोगंडा चलायेगा या नहीं? इस मामले में जातिवाद जैसा कुछ नही था, यह एक यौन विकृत अपराध था।

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