स्कूलों में संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना के निर्देश को धार्मिक निर्देश मानते हुए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इसकी जांच कराने की बात कही है। इसके साथ ही इसे मौलिक महत्व का मामला बताया है। न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ नरीमन की अगुवाई वाली दो-न्यायाधीश वाली संवैधानिक पीठ ने केंद्रीय विद्यालय की सुबह की सभा में संस्कृत और हिंदी भजनों के अनिवार्य पाठ करने से संबंधित याचिका पर सुनवाई करने के दौरान यह फैसला दिया है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश रोहिंटन एफ नरीमन ने कहा कि ‘असतो मा सद्गमय’ सीधे संस्कृत उपनिषद से लिया गया है। उनके इस सवाल पर भारत सरकार की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सिर्फ अकेले इसे धार्मिक निर्देश नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस अदालत के प्रत्येक न्यायाधीश के पीछे जो लोगो लगा है उसमें लिखा है ‘यतो धर्म ततो जया’। और यह भगवद्गीता से लिया गया है।

इस मामले में तुषार मेहता ने कहा कि इस श्लोक में जो लिखा गया है वह सार्वकालिक सत्य है जिसे हर पंथ के लोग मानते हैं। यह महज इसलिए धार्मिक नहीं हो जाता क्योंकि यह संस्कृत में लिखा है। उन्होंने कहा कि क्रिश्चयन स्कूलों में ‘ईमानदारी सबसे अच्छी नीति होती है ‘ लिखा होता है। क्या इसका मतलब यह माना जाना चाहिए कि यह उक्ति धार्मिक है?

गौरतलब है कि अगर भाषा और लिपि को साम्प्रदायिक नजरिये से देखा जाएगा तो फिर उर्दू अंग्रेजी को पूरी तरह से बैन करना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट के लोगो में गीता का श्लोक ‘यतो धर्म ततो जय’ लिखा हुआ है। अब सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने लोगो से गीता का वह श्लोक हटाने पर भी विचार कर रहा है?

असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

(हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली यह प्रार्थना क्या सच में सांप्रदायिक और हिन्दू धर्म का प्रचार करने वाली है?

चलो एक पल के लिए मान लेते ऐसा ही है। लेकिन उससे पहले याचिकाकर्ता और जज साहब इस बात पर सहमति दे दें कि अन्य धर्म असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की सीख नहीं देते हैं। अगर संस्कृत और हिन्दी हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करती है तो सेक्युलर प्रार्थना ऐसी होनी चाहिए जिसमें फारसी, अंग्रेजी, हिन्दू, हिब्रू, पाली सारी भाषा के शब्द हो। क्या ऐसी भाषा दुनिया के किसी देश में है? क्या ऐसी भाषा इस दुनिया में कहीं पर अस्तित्व में भी है?

हम किस दिशा में जा रहे हैं? भारत माता की जय, वन्दे मातरम, राष्ट्रगान, असतो मा सदगमय इन सबके उद्घोष से धर्मनिरपेक्षता खतरे में आयी जा रही है? ये कैसी धर्मनिरपेक्षता है? क्या धर्मनिरपेक्षता तभी रहेगी जब स्कूलों, मंदिरों, घरों, हर जगह से दिन में 3 बार “अल्लाह हो अकबर” और 1 बार ‘यीशु इस ग्रेट’ बोला जाएगा? एक बात ध्यान रहे दुनिया का कोई पेड़ अपनी जड़ों से नफरत करके नहीं पनप सकता।

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