सोशल मीडिया के आने के बाद से ही लेफ़्ट, लिबरल, बुद्धिजीवी और दरबारी पत्रकार इन सभी की दुकानें खतरे में रहने लगी हैं। इस बात को पिछले 5 साल में आपने महसूस भी किया होगा। कारण सिर्फ इन लोगों का दोगलापन है। ऐसे ही दोहरेमापदण्ड रखने वाले एक पत्रकार से आपको रूबरू करवाते हैं।

कल चिदंबरम की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज होने के बाद मशहूर पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया, “2010 में चिदंबरम गृहमंत्री थे और अमित शाह को गिरफ्तार किया गया था। 2019 में अमित शाह गृहमंत्री हैं और चिदंबरम गिरफ्तार होने वाले है। चक्र पूरा हुआ। क़ानून है या साजिश ये आप तय करें।”

बड़ी ही चालाकी से प्रश्न पूछने के अंदाज में राजदीप सरदेसाई अपना ओपिनियन भी जनता को बता देते हैं। एक तरफ सरदेसाई इसे साजिश भी बता रहे हैं और दूसरी तरफ तय करने के लिए जनता पर भी डाल रहे हैं कि आप पता करें ये साजिश या कानून। सरदेसाई खुद को ज़रूरत से ज़्यादा समझदार मानते हैं और जनता को हद से ज्यादा बेवकूफ।

राजनैतिक प्रतिद्वंदिता की आड़ में देश की इन्वेस्टिगेशन एजेंसीज का इस्तेमाल हर सरकार के दौरान होता रहा है, जो कि बहुत ही निंदनीय है। लेकिन क्या इस केस में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है?

आइए जानते हैं जवाब। अमित शाह और चिदंबरम के बीच एक सबसे बड़ा अंतर उनके द्वारा दिखाए जा रहे रिएक्शन से पता चलता है। जब अमित शाह के खिलाफ सीबीआई ने सोहराबुद्दीन एन्काऊंटर केस में फर्जी चार्जशीट दाखिल की थी तो अमित शाह खुद सीबीआई के सामने पेश हुए थे, भागे या छुपे नहीं थे क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था कि उन्हें न्याय मिलेगा।

पूरी चार्जशीट फर्जी थी इसलिए सारा सिस्टम बेशर्मी से इस्तेमाल करने के बाद भी काँग्रेस सरकार उन्हें दोषी सिद्ध नहीं कर पायी। अमित शाह ने इस फर्जी केस में 2 साल यातनाएं झेली थी। अमित शाह सच्चे थे इसलिए उन्हें किसी सीबीआई या अदालत का डर नहीं था।

अगर अमित शाह की तरह चिदंबरम भी निर्दोष हैं तो फिर भाग क्यों रहे हैं? चिदंबरम इसीलिए भाग रहे हैं क्योंकि चिदम्बरम जानते हैं कि वो दोषी हैं। वो दोषी है इसीलिए कानून से डर रहे है।

वहीं चिदंबरम के लिए सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक मनु सिंघवी जैसे बड़े वकील खड़े हैं। कांग्रेस पार्टी भी पूरी तरह से चिदंबरम के साथ खड़ी है। स्वयं राहुल गाँधी जो खुद भ्रष्टाचार के मामले में बेल पर हैं। राहुल गाँधी जिन्हें राफेल मामले में जो कोर्ट नहीं भी बोलता वो भी सुनाई दे जाता है और चिदम्बरम मामले में जब हाईकोर्ट के जज कह रहे हैं कि फैक्ट्स देखकर शुरुआती तौर पर लगता है कि चिदम्बरम मुख्य साज़िशकर्ता हैं तो वो भी उन्हें सुनाई नहीं दे रहा।

हम पाठकों को राजदीप सरदेसाई की 10 साल पहले की ट्वीट याद दिलाना चाहते हैं। 2010 में जब सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में अमित शाह को जेल भेजा गया था (जिस केस में बाद में वो निर्दोष साबित हुए थे) तब राजदीप सरदेसाई ने उसे क़ानून की जीत बताया था लेकिन अब जब चिदंबरम को जेल भेजा जा रहा है तो उन्हें साजिश नज़र आ रही है। पता नही इतना ‘डबल स्टैंडर्ड’ ये लोग कहाँ से लाते है?