वंदे मातरम! मित्रों The Telegraph 4 जनवरी, 2019 को तड़के करीब 4 बजे के एम राकेश का लिखा हुआ एक आर्टिकल पब्लिश होता है जिसकी हैडलाइन होती है :

In Kashmir, We shoot them. In Kerala, We call them devotees

Before Modification

इसके बाद जब लोग इसपर आपत्ति जताना शुरु करते हैं तो टेलीग्राफ टीम करीब 11 बजे यानि करीब 7 घण्टे बाद इसको अपडेट कर देती है और हेडलाइन बनती है :

“Parivar plays with kerala fire as it tries to enforce a shutdown”

और जो हेडलाइन पहले थी उसको इसके नीचे सामान्य फोंट्स में डाल दिया जाता है।

 

ये तो था घटनाक्रम जो टेलीग्राफ और उसके लेखक महोदय द्वारा किया गया। अब हम इनके लेख, हेडलाइन और विश्वसनीयता पर विश्लेषण करते हैं :

हेडलाइन : बात अगर हेडलाइन की की जाए तो लेखक महोदय ने बंगलुरू में बैठकर कश्मीर के मुद्दे पर टिप्पणी की है। लेखक महोदय के अनुसार जो प्रदर्शन कारी कश्मीर में हैं उनपर सेना गोलियां चलाती है; देखिए जिन लोगों को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान कम है उनके लिए इधर मैं जरा जोर देकर बताता हूँ कि लेखक महोदय ने “Shoot” शब्द का इस्तेमाल किया है, अंग्रेजी व्याकरण के अनुसार ये तभी इस्तेमाल होता है जब कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर जान से मारने के इरादे से गोली चलाता हो और वो सफल हो जाता हो। चूंकि अतिज्ञानी लेखक महोदय भौकाल मारने के चक्कर में अंग्रेजी की दुर्गति कर गए, यदि गोली चलाने वाले व्यक्ति का इरादा जान से मारने का न हो या फिर उसका निशाना चूक जाए तो अंग्रेजी में ‘Shoot at‘ का इस्तेमाल करते हैं। इधर में अंग्रेजी के बारे में इसलिए बता रहा था ताकि लेखक महोदय बाद में ये न कह सकें कि उनका इदारा गलत नहीं था। चूंकि उन्होंने लिखा ‘In Kashmir, We shoot them‘ इसका मतलब है कि भारतीय सेना कश्मीर में प्रदर्शनकरियों को जान से मार देती है।

अब लेखक महोदय के इस वाक्य को आधार मानकर उनपे न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाना चाहिए कि उन्होंने किस तथ्य के आधार पर ऐसा कहा? क्योंकि शायद ही ऐसा कोई केस होगा जिसमें सेना ने किसी प्रदर्शनकारी को जनाबूझकर जान से मारा हो। चूंकि कश्मीर में जो होता है वो प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता क्योंकि उधर लोग पत्थरबाजी पैसों के लिए करते हैं, सेना-आतंकियों के मुठभेड़ स्थल पर करते हैं ताकि आतंकी जिंदा बच निकल सकें। फिर भी भारतीय सेना पत्थरबाजों को ज़िंदा छोड़ देती है। 2015-16 के समय जब सेना ने पत्थरबाजों पर पेलेट गन का इस्तेमाल करना शुरु किया था तो ये वामपंथी गैंग सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई थी और तब अखबारों की हेडलाइन्स होती थी – ‘शूटिंग पेलेट एट स्टोनपेल्टर्स’ मतलब समझिए ‘Shooting at‘ से समझ में आ जाता है कि जान लेने की कोशिश नहीं की जा रही है। जबकि लेखक महोदय को न तो कश्मीर की जानकारी है न ही अंग्रेजी की, चले हैं पत्रकार बनने।

अब पहली हेडलाइन बदलकर या तो टेलीग्राफ ने तार्किक रूप से अपनी गलती मानी या फिर स्वयं लेखक महोदय ने; क्योंकि दौनों ही स्थितियों में ही हेडलाइन बदली जाती। इसके बाद नई हेडलाइन है :
Parivar plays with kerala fire as it tries to enforce a shutdown”

यानि लेखक महोदय स्वयं अपने आप में त्रिकालदर्शी परमज्ञानी सर्वज्ञ हैं और सुप्रीम कोर्ट से भी उच्च बनकर ये हेडलाइन में ही बता रहे हैं कि संघ परिवार का हाथ है जबकि बड़ी सफाई से ये छुपा लिया कि केरल में पिछले कई दिनों ने वामपंथी सरकार ने कैसे कैसे कारनामे किये हैं।

बात करें लेखक महोदय द्वारा भगवान अयप्पा और कश्मीरी आतंकवादियों के बीच की, इधर मैंने आतंकवादी इसलिए कहा क्योंकि लेखक ने इशारा उनके लिए किया था जिन्हें सेना जान से मारती है और वर्ष 2018 के दौरान जो 270 मारे गए वो सब के सब आतंकवादी थे। अयप्पा भक्तों में न तो किसी के पास ISIS का झंडा है, न ही हैंडग्रेनेड, न ही मशीनगन, न ही किसी भक्त ने बीच बाजार खुद को बम से इसलिए उड़ाया जिससे कि वो ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगों को बेवजह मार सके; फिर लेखक महोदय किस आधार पर ये आरोप लगा रहे हैं कि अयप्पा भक्त ‘आतंकवादियों’ के समकक्ष हैं? केवल पूर्वाग्रह से भरा हुआ लेखक महोदय का लेख और ऐसे लेखक को पोषित करने वाला न्यूजपेपर The Telegraph सार्वजनिक रूप से तब तक बहिष्कार के लायक है जब तक कि ये सार्वजनिक रूप से माफी न मांग ले।

भारतीय लोकतंत्र सबको प्रदर्शन करने का अधिकार देता है और ये प्रदर्शन तो तब हो रहा है जब वामपंथी सरकार के अधीन केरल पुलिस ने एक भक्त की खोपड़ी में जानबूझकर गोली मार दी। क्या इतनी घटना काफी नहीं थी भीड़ को उकसाने के लिए? तूतीकोरिन में स्टरलाइट कॉपर  के विरोध के समय जब प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई थी तब यही न्यूजपेपर्स केंद्र सरकार के खिलाफ लिख रहे थे जबकि अभी एक महीने पहले मद्रास हाईकोर्ट ने इसपर अपना निर्णय सुनाया और तमिलनाडु सरकार को भी लताड़ा, दोषी राज्य सरकार के पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही हुई। इस हिसाब से एक समाचार पत्र का कर्त्तव्य बनता है कि वो सबसे पहले नागरिकों के पक्ष में लिखा करे, प्रशासन के नहीं; लेखक महोदय को अगर पत्रकारिता का आधारभूत सिद्धांत नहीं पता तो कलम किनारे रखकर राजनीति ही करने लग जाएं, आखिर क्यों पत्रकारिता को कलंकित करके जनता के साथ अन्याय कर रहे हैं?

ऐसे लेखकों और समाचारपत्रों को अगर आप नियमित रूप से पढ़ रहे हैं तो धीरे धीरे आपकी मानसिकता बदल जाएगी और आपको अपने ही देश की सेना और देशभक्ति बुरी लगने लगेगी; और यही वामपंथी प्रोपेगैंडा का मुख्य उद्देश्य होता है जिसके लिए योजनाएं बनती हैं, नैरेटिव सेट होते हैं ताकि दुनियाँ को इनके उदारवादी होने का उदाहरण भी दिखे और भारत का मानवता के हनन का। ऐसे छद्म उदारवादी हर जगह मौजूद हैं, पहचानना आपका काम है।

धर्मो रक्षति रक्षतः” यदि अब भी एकजुट न हुए तो न ही सनातन धर्म का वजूद रहेगा न ही मानवता का; क्योंकि न किसी धर्म में “वसुधैव कुटुम्बकम” का सिद्धांत है न ही गहरी आध्यात्मिक मीमांसा”, रक्त बहाकर सियासतें जीती जा सकती हैं मानवता नहीं। इसका उदाहरण भारत स्वयं हैं जो हजार साल की गुलामी के बाद भी सनातन धर्म को भूला नहीं है। इस धरती को पवित्रता और गरिमा बनाये रखने के लिए राष्ट्र में निष्ठा आवश्यक है और यही निष्ठा तोड़ना छद्म बुद्धिजीवियों का एकमात्र लक्ष्य है ताकि प्रोपेगैंडा चलते रहें और जलते हुए देश में उनकी रोटियां सिकती रहें।

जय हिंद!! ????