पंजाब में जब आतंकवाद को बढ़ावा मिल रहा था तब एक पंजाबी ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए खुद ही हथियार उठा लिए और पंजाब पुलिस व केंद्र सरकार का साथ लेकर 500 से अधिक आतंकवादियों की इंफोमेशन देकर आतंकवाद का सफाया करवाया लेकिन सरकारों की अनदेखी का नतीजा उसे भुगतना पड़ रहा है। हम बात कर रहे है सुखविंदर सिंह उर्फ जनरल दयाल सिंह की जिनकी सुरक्षा पंजाब सरकार ने सिर्फ इसलिए कम कर दी कि वह कट्टरपंथी खालिस्तानियों के समर्थकों को नाराज नही करना चाहती।

कौन है सुखविंदर सिंह

पंजाब में चरमपंथ के उभार ने सैकड़ों जानें लीं और हजारों जख्म दिए। इसका अंजाम ऑपरेशन ब्लू स्टार और फिर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में देश के सामने आया। खालिस्तान के समर्थन के नाम पर जो आग लगी उसे बुझाने में सरकार, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी लेकिन इस दौरान कुछ ऐसे भी लोग थे जिनका दावा है कि उन्होंने चोला तो आतंकियों का पहना था लेकिन मदद वो सरकार और पुलिस की ही कर रहे थे।

इन्हीं में से एक हैं इंडियन लायंस के मुखिया सुखविंदर सिंह काका उर्फ मेजर दयाल सिंह। दयाल सिंह ने कई आतंकियों का सफाया किया तो कइयों को वो मुख्य धारा में लाने में कामयाब रहे, यही वजह है कि दयाल सिंह पर खालिस्तान समर्थक आतंकियों ने करोड़ों के इनाम का ऐलान कर रखा है।

कैसे बदली जिंदगी

सुखविंदर सिंह काका बताते हैं कि 18 साल की उम्र में दो साल दुबई में बिताने के बाद जब 1980 में वापस वे अपने घर पंजाब के कपूरथला आए तो ये वो वक्त था जब पंजाब में चरमपंथ पैर पसार चुका था। उनके एक दोस्त की वजह से पुलिस उनके पीछे भी लग गई। पुलिस से बचने के लिए वे स्वर्ण मंदिर में छुपने लगे। ऑपरेशन ब्लू स्टार से एक दिन पहले वो वहां से निकलकर दिल्ली पहुंचे जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।  करीब दो साल बाद जब बाहर आए तो एनएसए लगाकर एक बार फिर करीब एक साल के लिए जेल में डाल दिया गया।

1987 में सुखविंदर जेल से बाहर आए और अपनी नई जिंदगी शुरू की। फरवरी 1987 में शादी हुई लेकिन दो महीने बाद ही उन पर टाडा लगाकर फिर जेल में ठूंस दिया गया। जेल में रहकर सुखविंदर ने धर्म को जाना, कई धर्मग्रंथों को पढ़ा, गुरुवाणी पढ़ी। सुखविंदर के मुताबिक जेल से छूटने के बाद वे अपनी पत्नी और नवजात बेटी के साथ दिल्ली आ गए।

क्यों शुरू की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई

यह 1988 का साल था, पंजाब से उनके एक पुराने मित्र मुकेश की शादी का न्यौता आया। वो शादी में शामिल हुए लेकिन रात में आतंकियों ने मुकेश के घर पर हमला कर दिया जिसमें मुकेश  सहित 7 लोगों की जान चली गई। खुद उनकी बहन को आठ गोलियां लगीं। इस घटना से उनका खून खौल उठा।

सुखविंदर ने बताया कि उनका एकमात्र उद्देश्य बेगुनाहों की जिंदगी से खेलने वालों को खत्म करना था। यहां वो अपने पुराने दोस्तों से मिले और कुछ दिन बाद ही सुखविंदर की मुलाकात हरमिंदर सिंह संधू से हुई। ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISSF) का जनरल सेक्रेटरी हरमिंदर सिंह संधू उन 21 लोगों में से था जिन्हें ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद स्वर्ण मंदिर से जीवित पकड़ा गया था।

5 साल जोधपुर जेल में सजा काट चुके हरमिंदर ने उनको एक अहम जिम्मेदारी दी। उनको बॉलीवुड की एक प्रसिद्ध गायिका का अपहरण करना था ताकि जेल में बंद सभी खालिस्तानी समर्थकों को छुड़वाया जा सके। उन्होंने इस बड़े प्लान की सूचना सीआरपीएफ को दे दी जिसके बाद आतंकियों का बड़ा प्लान नाकाम हुआ।

फिर बना आतंक के खिलाफ इंडियन लायन्स संगठन

सुखविंदर के मुताबिक अब उनको गुरु का सिपाही बन आतंकियों को खत्म करना था। ये 1990 का समय था, सुखविंदर ने कई आतंकवादियों को पकड़वाया, कई आतंकियों तो मुख्य धारा में लाने में मदद की और पुलिस के मुखबिर बनाए। जो नहीं माना अगले दिन उसकी लाश मिलती।

धीरे-धीरे यह चलता रहा। तभी अचानक से एक संगठन सामने आ गया जिसने इन लोगों को मारने का जिम्मा अपने सिर ले लिया। एक सफेद कागज पर स्केच से तिरंगा झंडा बना था जिसके ऊपर संगठन का नाम था ‘इंडियन लॉयंस’। कागज पर खालिस्तानी आतंकियों को मारने की जिम्मेदारी लेते हुऐ नीचे एक नाम था ‘दयाल सिंह’।

आतंकियो ने कर दी दोस्त की हत्या

सुखविंदर कहते हैं कि आतंकवादियों ने दयाल सिंह होने के शक में उनके दोस्त परगट सिंह को गोली मार दी। आतंकवादी दो दिन तक दयाल सिंह की मौत का जश्न जालंधर में मनाते रहे। दोस्त की हत्या से व्यथित होकर वो खुलकर सामने आए और ऐलान किया कि मैं ही दयाल सिंह हूं। इस खुले ऐलान के बाद उनके पीछे सभी खालिस्तान समर्थक संगठन पड़ गए।

आतंकी संगठनों ने रखा है 2.5 करोड़ तथा दो किलो सोने का पुरस्कार

1992 में सुखविंदर के घर पर हमला हुआ जिसमें उनकी मां और बहन की मौत हो गई। खालिस्तान कमांडो फोर्स तथा भिंडरांवाला लिबरेशन आर्मी उन्हें मारने के लिए 2.5 करोड़ रुपये तथा दो किलो सोने का पुरस्कार रखा है। पंजाब में आतंक खत्म होने के बाद 1994 में सुखविंदर ने सरेंडर कर दिया, कुछ समय के लिए उन्हें जेल हुई और सभी मामले निपटाकर वे जेल से बाहर आ गए।

इसके बाद उन्होंने सरकार से सुरक्षा मांग की, काफी लंबी लड़ाई लड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में सरकार को उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार को निर्देश दिया। हालांकि राज्य सरकार ने इसके बाद उन्हें गनमैन दिए लेकिन यह सुरक्षा नाकाफी है। इसके साथ ही राज्य सरकार यह सुरक्षा समय-समय पर फोर्स की कमी बताकर वापस भी ले लेती है। जनवरी 2019 में पंचायत चुनाव के दौरान भी सुरक्षा वापस ले ली गयी थी। फिर बाद में बार बार रिक्वेस्ट करने के बाद वापस दी गयी।

सुखविंदर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें अपनी जान की फिक्र नहीं है लेकिन उनका परिवार निडरता और शांति से जी सके इसके लिए केंद्र सरकार से उन्होंने सुरक्षा की गुहार लगाई है क्योंकि पंजाब की सरकार को वोट बैंक पॉलीटिक्स के चलते उन्हें सुरक्षा देकर कट्टरपंथियों को नाखुश नहीं करना चाहती। उन्होंने कहा कि उन पर कई बार हमला हो चुका है और उन्हें उन्हें जेड प्लस सुरक्षा मिलनी चाहिए।

वही इस मामले में पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुखविंदर सिंह को 3 गनमैन दिए गए हुए हैं और वह उनकी सुरक्षा के लिए उपयुक्त हैं। उनके मुताबिक सुखविंदर की जेड प्लस सुरक्षा की मांग पॉसिबल नहीं है फिर भी उन्होंने उनकी मांग को उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया है।

 दी है आत्महत्या की धमकी 

वहीं, सरकार के रवैये से दुखी होकर सुखविंदर सिंह आत्महत्या की भी धमकी चुके है। वह कहते है कि उन्हें खालिस्तानी आतंकियों द्वारा मारे जाने का खतरा है वह आतंकियों के हाथों मरने से बेहतर खुद फांसी लेना सही समझते हैं।

अगर ऐसे लोगो को मदद नही की गई तो यह हमारे देश के उस आम आदमी का हौसला तोड़ने जैसे होगा जो आतंक के खिलाफ लड़ने का हौसला रखता है। यही लोग है जो पूरे देश मे खुफिया तंत्र और पुलिस के साथ कंधे से कंधे मिलाकर सिर्फ देशभक्ति और इंसानियत के जज्बे में आतंक के खिलाफ लड़ रहे है। इनको अनदेखा करके आतंक के खिलाफ कोई युद्ध नही जीता जा सकेगा।