देश के तमाम न्यायालयों से पिछले 2-3 सालों में ऐसे फैसले आए हैं, जिनको देख-सुनकर एक तरफ तो एक आम इंसान को गुस्सा आएगा या हंसी आएगी, तो वहीं दूसरी तरफ बुद्धिजीवी वर्ग की एक जमात और उसके समर्थक इसका जोर शोर से समर्थन भी करते नजर आते है।

ताजा मामला झारखंड के रांची की रहने वाली स्नातक की छात्रा ऋचा भारती का है। ऋचा ने कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक साधारण पोस्ट किया था, जिसका विरोध करते हुए इस्लामिक संस्था अंजुमन कमेटी ने मुकदमा दर्ज कराया था। मामला कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने ऋचा को जमानत देने के लिए एक अजीबोगरीब शर्त रख दी की उस लड़की को 15 दिनों के भीतर कुरान की 5 प्रतियां बांटनी होंगी और उसकी रसीद न्यायालय में जमा करानी होंगी। हालांकि, लड़की ने ऐसा करने से मना कर दिया और ऊपरी अदालत में जाने की बात कही थी।

सिविल जज मनीष सिंह के इस फैसले के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुआ। आम लोगों सहित तमाम हिंदूवादी संगठनों व वकीलों ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा कि ‘आज कुरान बांटने के लिए कहा जा रहा है, कल इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा जाएगा’। बहरहाल इस विरोध के चलते आज (17 जुलाई 2017)  कोर्ट को कुरान बाँटने की अपनी शर्त वापस लेनी पड़ी।

आपको बता दें कि जिस फेसबुक पोस्ट को लेकर ऋचा को गिरफ्तार किया गया था। वह पोस्ट रोहिंग्या मुसलमानों के ऊपर लिखी गयी थी जिसका स्क्रीन शॉट हम आपको नीचे दे रहे है। आप स्वयं इस पोस्ट को देखिये और बताइये की इस पोस्ट में ऐसा क्या विवादित था जिसके लिए ऋचा भारती को गिरफ्तार करने की जरूरत पड़ गयी? यह मामला तो मात्र अभिव्यक्ति का है, और यह पोस्ट उसने शेयर की थी। हैरान कर देने वाली बात है कि शिकायत दर्ज कराने वाली अंजुमन कमेटी को इसी पोस्ट के कमेंट बॉक्स में ‘तथाकथित’ डरे हुए लोगों के कमेंट में कुछ भी गलत नही लगा।

Pic- Opindia

पोस्ट के इस स्क्रीनशॉट में आप इन तथकथित प्रेम की भाषा फैलाने वालों को देख सकते है, की ये कैसे गन्दी गन्दी गालिया ऋचा को दे रहे है। हैरान कर देने वाली बात यह है कि चलो अंजुमन कमेटी को इन कमेंट्स में कुछ बुरा नही लगा तो क्या जांच करने वाली पुलिस को भी इसमे कुछ बुरा नही लगा?

अंजुमन कमेटी में ऋचा की यह कुछ और पोस्ट पुलिस को दी है, जिसे आप यहाँ पढ़कर इसका गुण दोष समझ सकते है।

सवाल यह उठता है कि क्या अंजुमन कमेटी को भाईचारे की नजीर पेश करते हुए उन मजहबी उन्मादियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं करवाना चाहिए था, जो ऋचा और उसकी बहन को बलात्कार करने की धमकी दे रहे थे, उसकी मां के खिलाफ अश्लीलता भरे शब्दों का प्रयोग कर रहे थे? अंजुमन कमेटी स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य व शिक्षा में सहयोग करती है, लेकिन यहां उसे सबसे पहले अपना मजहब दिखा। ये लोग चिल्ला चिल्लाकर हिंदुस्तान को अपना राष्ट्र तो कहते हैं, लेकिन जब बात रोहिंग्या मुसलमानों को खदेड़ने की आती है, तो इन्हें सबसे पहले अपना मजहब दिखता है और राष्ट्र पीछे हो जाता है।

चलिए छोड़िए मजहबी लोगों को। सबसे ज्यादा आश्चर्य वाली बात ये कि जज साहब को ऋचा की पोस्ट पर किए गए शांतिप्रिय लोगों के कमेंट्स क्यों नहीं दिखे? आखिर ये फेसबुक पोस्ट जज साहब के सामने तो गया ही होगा, फिर उन्होंने इसे क्यों नजरअंदाज किया? कभी कभी देखने सुनने में आता है कि जज भी किसी मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हैं। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ।

अब जरा यहां देखिये, ये महोदय जिनका नाम जाकिर हुसैन है, वह ऋचा से सम्बंधित हर मीडिया रिपोर्ट पर जाकर उसे गाली दे रहे है, क्या इनके लिए कोई सद्भाव की योजना नही है?

यहाँ तक कि इन्होंने एक कमेंट E-Postmortem के भी ट्विटर हैंडल पर किया।

 

फेसबुक पर तो रोज कोई ना कोई किसी धर्म-जाति विशेष को गाली देते हुए उसके खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। फेसबुक सहित हर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर रोजाना, हिंदुओं के देवी देवताओं, स्वतंत्रता सेनानियों, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के खिलाफ अभद्र बातें लिखी जाती हैं। अगर कानून के इसी नियम के अनुसार चलें, तो आने वाले दिनों में एक धर्म विशेष के लोगों के खिलाफ बड़े स्तर पर कार्रवाई हो सकती है। अगर फेसबुक पोस्ट को लेकर ही कार्रवाई करनी है, तो फिर कोर्ट को दोनों पक्षों को देखकर फिर अपना फैसला सुनाना चाहिए, क्योंकि हर मामले के दो पहलू होते हैं।