आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व पत्रकार आशुतोष, वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और अरुणोदय मुखर्जी ने शुक्रवार को असिस्टेंट CJM कोर्ट में सरंडर कर दिया। मामला है 2006 में IBN 7 और CNN IBN पर एक फेक न्यूज़ स्टोरी चलाने का। कोर्ट ने पूर्व में अभियुक्त के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया था।

2006 में राघव बहल नामक पत्रकार ने दैनिक जागरण समूह से चैनल 7 खरीदा, जिसका नाम बदल कर बाद में IBN 7 रखा गया। एक अंग्रेजी चैनल CNN भी चालू किया गया। चैनल नए शुरू हुए थे, मार्केट में स्थापित होने के लिए एडिटर कोई सनसनीखेज खबर खोज रहे थे जिससे TRP मिल सके। ऐसे समय  में जमशेद खान ने एक  स्टोरी IBN 7 को दी। मामला था नोएडा के डॉ अजय अग्रवाल का। जिला अस्पताल में पदस्त डॉ अग्रवाल जाने माने अंग प्रत्यर्पण के डॉ थे। एक स्टिंग आपरेशन किया गया जिसमें बताया गया कि डॉ अग्रवाल गरीब और भिखारियों के अंग निकाल कर बेचने का गोरख धंधा करते है। खबर सनसनीखेज थी, CNN IBN और IBN 7 पर स्टिंग आपरेशन लूप में दिखाया जाने लगा। लगभग एक हफ्ते तक लगातार न्यूज चैनल पर ये एक्सक्लूसिव खबर चली।मामले गम्भीर था , 7 से 8 जगह जांच के आदेश सरकार ने दिए। सभी जांच समितियों ने डॉ अग्रवाल को क्लीन चिट दे दी। पर इस पूरे मामले से डॉ अग्रवाल की सामाजिक प्रतिष्ठा,उनका कैरियर और जीवन तबाह हो गया। अपनी सम्मान की लड़ाई के लिए डॉ अग्रवाल के पास कोर्ट में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। उन्होंने लोअर कोर्ट से लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाई। कोर्ट ने चैनल को आदेश दिया कि वह इस फ़र्ज़ी स्टिंग आपरेशन को लेकर 3 दिन तक माफीनामा की पट्टी अपने चैनल पर नॉर्मल स्पीड में चलाए। पर चैनल ने कोर्ट के आदेश की अवमानना करते हुए एक बार भी माफीनामा नहीं चलाया।

डॉ अग्रवाल ने फिर कोर्ट से गुहार लगाई, और फरवरी 2018 में कोर्ट ने राघव बहल , आशुतोष गुप्ता, राजदीप सरदेसाई , अरुणोदय मुखर्जी जमशेद खान और 2 और लोगो के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।
आशुतोष 2014 में पत्रकारिता छोड़ राजनीति में चले गए थे, बाकी राघव बहल और राजदीप सरदेसाई ,CNN IBN को मुकेश अम्बानी द्वारा खरीदे जाने के बाद से चैनल छोड़ कर चले गए। उन्हें आभास हो गया था कि उनकी मोदी विरोधी पत्रकारिता की दाल अब यहां नहीं गलने वाली।
ये मामला सुपारी पत्रकारिता की जीती जागती मिसाल है।
स्टिंग आपरेशन के प्रसारण को लेकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय के 2 सख्त निर्देश है। पहला ये की स्टिंग को जांचे परखे बिना चैनल या अखबार में नहीं दिखाया जाए और दूसरा की किसी फ्री लांस जॉर्नलिस्ट के द्वारा किया गया स्टिंग चैनल पर नहीं चलाया जाए। संपादक राजदीप सरदेसाई ने दोनो ही निर्देशो की धज्जियां उड़ाते हुए एक डॉ का जीवन सिर्फ अपनी TRP के लिए बर्बाद कर दिया।

ये एकलौता मामला नहीं है जब राजदीप सरदेसाई सुपारी पत्रकारिता या प्रेस्टीट्यूट के रोल में नज़र आये हैं। कैश फ़ॉर वोट के मामले में भी उन्होंने यही किया था। ट्विटर के ऊपर आपको तमाम ट्वीट पढ़ने को मिल जाएंगे जहां राजदीप का डबल स्टैण्डर्ड एक्सपोज़ हो जाता है। कायदे से चैनल को अपनी गलती के लिए बाकायदा एक स्टोरी चलानी चाहिए थी, स्टोरी चलाना तो दूर की बात उन्होंने माफिनामा चलाना तक जरूरी नहीं समझा। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष जैसे लोग आज आम आदमी की बात करते है पर अपने पत्रकार जीवन मे उन्होंने अपने पत्रकारिता का फायदा उठा कर जो कार्य किये उस पर चर्चा नहीं करते। सवाल उठता है कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी इसी तरह निरंकुश रहेगी जिससे अपने स्वार्थ को साधने अपने पद का दुरुपयोग करने की छूट मिलेगी ? या ऐसे मामले में सरकार कुछ सख्त कानून बनाएगी ताकि आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कठोर कार्यवाही हो।