9 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने महिला जननांग खतना (काटना) पर प्रतिबंध लगाने सम्बंधित याचिका  को स्वीकार कर लिया और इस पर सुनवाई की तिथि 16 जुलाई की निर्धारित की है। यह मांग 8 मई को अदालत की सुनवाई पर शुरू हुआ था, अदालत ने इस मुद्दे पर विचार करने का फैसला करने के साथ ही इसे  “अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील” मुद्दा करार दिया |

अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को सूचित किया कि सरकार इस प्रथा को प्रतिबंधित करना चाहती है, जहां एक लड़की को जननांग उत्परिवर्तन या खतना से गुजरना पड़ता है। अटॉर्नी जनरल ने यह भी बताया कि यह प्रथा मौलिक मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है और महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर विपरीत असर डालता है।

महिला खतना विश्व में धर्म कर्म के नाम पर सिर्फ इस्लाम में पाया जाता है | महिला खतना एक बहुत ही अमानवीय एवं दर्दनाक प्रक्रिया है, जिसमे की इस उद्देश्य से की छोटी बच्चियों में जवान होने के साथ उनकी सेक्स इच्छा प्रबल न हो पाए, उनके जननांग के बाहरी एवं कुछ अंदरूनी हिस्से को काट कर शरीर से अलग कर दिया जाता है |

महिला जननांग खतना या अंग्रेजी में फीमेल जेनिटल मुटीलेशन (FGM) पर प्रतिबंध लगाने की याचिका, वकील सुनीता तिवारी ने दायर की थी, हालांकि वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, जो कि कांग्रेस नेता भी हैं, न्यायालय में दाऊदी बोहरा समुदाय के लिए उपस्थित हुए,  उन्होंने कहा, “यह इस्लाम का एक अनिवार्य पहलू है और यह न्यायिक जांच के अधीन नहीं हो सकता” । सिंघवी ने समुदाय में एफजीएम को एक स्वीकृत धार्मिक प्रक्रिया के रूप का मामला बताया, जिसमें इस्लाम में पुरुष खतना के अभ्यास का जिक्र किया गया और कहा कि यह सभी देशों में इसकी अनुमति है।

वकील और वरिष्ठ  कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी, इस मामले को धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा बताने वाले दाऊदी बोहरा महिला संघ की तरफ से पैरवी कर रहे हैं, ये संगठन इस महिला खतना की अमानवीय प्रथा को धर्म के हिसाब से निहायती जरुरी  मानता है, संगठन का तर्क है की ये प्रक्रिया हानिरहित हैं, एवं महिलाओं की सेक्स इच्छा को कम करने के लिए जरुरी है, कुछ का तो यहां तक कहना है की महिला खतना, महिला को वैश्या बनने से रोकने के लिए बहुत ही जरुरी है | ये संगठन एफजीएम पर प्रतिबंध की मांग के खिलाफ खड़ा हैं एवं संविधान के अनुच्छेद  25 का हवाला देते हुए, इसे अपना धार्मिक अधिकार मानते हुए इसे जारी रखने के अधिकार की मांग कर रहा हैं | इस एसोसिएशन की सचिव समिना कांचवाला ने कहा, ‘सबसे पहले, हम जो अभ्यास करते हैं उसे एफजीएम के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। यह हमारी धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए एक हानिरहित अभ्यास है और पुरुष खतना के समान नहीं है, जो की बहुत ही आक्रामक है। इसलिए हम अपने धार्मिक अभ्यास का पालन करने का अधिकार चाहते हैं और किसी को भी हमें अनुच्छेद 25 के तहत संविधान द्वारा दी गई स्वतंत्रता से इनकार नहीं करना चाहिए। ‘

अदालत ने हालांकि, जवाब दिया कि “किसी व्यक्ति की शारीरिक अखंडता, किसी  धर्म और उसके आवश्यक अभ्यास का हिस्सा क्यों होनी चाहिए,” इसी बात को आगे बढ़ाते हुए  कहा कि इस प्रक्रिया ने एक लड़की के शरीर की “अखंडता” का उल्लंघन किया है । साथ ही अदालत ने कहा की “एक व्यक्ति के जननांगों पर किसी और का नियंत्रण क्यों होना चाहिए” ?

याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में भारत द्वारा हस्ताक्षरित मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौमिक घोषणा पत्र का उल्लंघन है | याचिका में यह भी उल्लेखित है, कि इस प्रक्रिया में लड़की के शरीर में स्थायी रूप से शारीरिक अक्षमता हो जाती है ।  ‘खतना’ या ‘एफजीएम’ या ‘खफ्द’ मानव लिंगों के बीच असमानता पैदा करने वाला और महिलाओं के प्रति भेदभाव करने वाला भी है। चूंकि यह नाबालिगों पर किया जाता है, इसलिए यह बच्चों के अधिकारों का भी गंभीर  उल्लंघन करता है क्योंकि यह एक व्यक्ति की सुरक्षा, गोपनीयता का अधिकार, शारीरिक अखंडता और क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक उपचार के साथ ही स्वतंत्रता के अधिकार का हनन भी है।

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि, कुल 27 अफ्रीकी देशों ने पहले ही एवं  यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी देशों ने इस तरह की किसी भी प्रथा अथवा क्रिया कलाप पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत में भी काफी समय से एक ऐसे लोगो का संगठन जो की इस तरह की अमानवीय प्रक्रिया से गुजर चूका है, ‘वी स्पीक आउट’, इस अमानवीय प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहा है। ‘वी स्पीक आउट’ एफजीएम पर प्रतिबन्ध की मांग करने वाले संगठन के समर्थन में खड़ा है एवं सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल में भी एक पार्टी है। अदालत के अवलोकन करने के फैसले का स्वागत करते हुए, कि कोई धार्मिक अभ्यास मानव शरीर की अखंडता का उल्लंघन नहीं कर सकता, ‘वी स्पीक आउट’ ने सरकार से कानून में आवश्यक परिवर्तन करने और एफजीएम को रोकने के लिए नीति बनाने का आग्रह किया।

इस साल की शुरुआत में फरवरी में, इसी संगठन ने ‘The Clitoris Hood A Contested Site ‘ नामक एक अध्ययन जारी किया, अध्ययन में शामिल 75% लड़कियां एफजीएम की प्रक्रिया से गुजर चुकीं थी, जिनमें से 97% ने इसे एक बहुत ही  दर्दनाक अनुभव के रूप में बताया था। उसी समूह के 33% ने यहां तक कहा कि इसका उनके सामान्य यौन जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।